नई दिल्लीः अयोध्या के राम मंदिर से जुड़े कथित चंदा चोरी मामले और मंदिर प्रबंधन को लेकर निर्मोही अखाड़ा एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। अखाड़े ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पुनर्गठन, ट्रस्ट के वित्तीय लेनदेन की फोरेंसिक ऑडिट और मंदिर प्रबंधन से जुड़े कई मुद्दों पर अदालत से हस्तक्षेप की मांग की है। इस मामले से जुड़ी कुछ याचिकाओं पर विशेष जांच दल (एसआईटी) से जांच कराने की मांग पर 20 जुलाई को सुनवाई होनी है।
याचिका में निर्मोही अखाड़े ने कहा है कि नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अयोध्या भूमि विवाद पर फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया था। अखाड़े का दावा है कि ट्रस्ट का गठन और उसका संचालन अदालत के फैसले की भावना के अनुरूप नहीं हुआ। उसने मांग की है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पुनर्गठन किया जाए और उसके सभी वित्तीय तथा संपत्ति संबंधी लेनदेन की स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट कराई जाए, ताकि किसी भी संभावित अनियमितता की निष्पक्ष जांच हो सके।
याचिका में और क्या मुद्दे उठाए गए हैं?
निर्मोही अखाड़े ने हाल में सामने आए उन आरोपों का भी हवाला दिया है, जिनमें राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए दान और बहुमूल्य वस्तुओं के कथित गबन की बात कही गई है। अखाड़े का कहना है कि इन आरोपों की जांच के लिए राज्य सरकार ने एसआईटी बनाई है। ऐसे में ट्रस्ट के वित्तीय रिकॉर्ड और संपत्तियों की भी विस्तृत जांच जरूरी है।
याचिका में ट्रस्ट में प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी उठाया गया है। अखाड़े का कहना है कि उसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं मिला। महंत दिनेंद्र दास के नामांकन पर भी सवाल उठाते हुए अखाड़े ने कहा है कि उनका चयन तय प्रक्रिया के अनुसार नहीं किया गया।
निर्मोही अखाड़े ने रामलला की मूर्ति को लेकर भी आपत्ति जताई है। याचिका में कहा गया है कि गर्भगृह में नई मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा से मूल विवाद की स्थिति बदल गई है। इसलिए साल 1950 और 1982 से स्थापित मूल विग्रहों को दोबारा गर्भगृह में स्थापित करने का निर्देश दिया जाए।
हालांकि, निर्मोही अखाड़े ने साफ किया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के 2019 के ऐतिहासिक फैसले को चुनौती नहीं दे रहा है। उसका कहना है कि याचिका का उद्देश्य केवल उस फैसले के सही क्रियान्वयन, ट्रस्ट में पारदर्शिता, जवाबदेही और मंदिर प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर अदालत से आवश्यक निर्देश प्राप्त करना है।
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