रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह रविवार (26 जुलाई) को कारगिल में थे। यहां उन्होंने देश की ओर से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले भारतीय सेना के वीर जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की। कारगिल विजय दिवस हर साल उस दिन की याद में मनाया जाता है, जब भारतीय सेना ने 1999 में कारगिल जिले में भारतीय चौकियों पर कब्जा करने वाली पाकिस्तानी सेना को हराते हुए उन्हें पीछे हटने पर मजबूर किया था।
यूपीए सरकार के दौर यानी 2004 से 2014 तक, इस दिन को अपेक्षाकृत शांत तरीके से मनाया गया और पाकिस्तान की विश्वासघातपूर्ण हरकतों को उस तरह प्रमुखता से नहीं उठाया गया, जैसा आज किया जाता है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के समय और अब भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौरान इस खास दिन को मनाने के तरीके में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
राजनाथ सिंह ने सभा को संबोधित करते हुए साफ कहा कि पाकिस्तान के साथ उसके द्वारा उठाए जाने वाले अलग-अलग मुद्दों पर बातचीत फिर से शुरू होने की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि भविष्य में पाकिस्तान के साथ कोई बातचीत होती है, तो वह केवल पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) पर ही होगी।
सिर्फ पीओजेके पर पाकिस्तान से बातचीत का क्या अर्थ और क्या संकेत है? दरअसल, समय-समय पर, हर स्तर पर, यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र में भी यह कहा गया है कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर राज्य के बड़े हिस्से पर अवैध रूप से कब्जा किए हुए है। रक्षा मंत्री के रूप में राजनाथ सिंह पहले भी पीओजेके और पाकिस्तान को लेकर ऐसे बयान दे चुके हैं, जिन पर पाकिस्तान की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई थी।
पाकिस्तान की ओर से आई क्या प्रतिक्रिया?
पीओजेके को लेकर रविवार को की गई उनकी टिप्पणी के बाद एक बार फिर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली पाकिस्तान की सरकार की ओर से प्रतिक्रिया सामने आई। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने कश्मीर विवाद को लेकर राजनाथ सिंह के बयान को ‘बेहद भड़काऊ और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी’ करार दिया है। उसकी ओर से कहा गया कि पड़ोसी देश (भारत) को पाकिस्तान के इस संकल्प को कमतर नहीं आंकना चाहिए कि वह ‘भारत के किसी भी दुस्साहस का जवाब देगा।’
पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने कहा, ‘उनका बयान न केवल संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त जम्मू-कश्मीर विवाद के तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारतीय सरकार क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को खतरे में डालने की सोची-समझी नीति अपना रही है।’
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने आगे कहा, ‘ऐसे संकेत भारत द्वारा अवैध रूप से कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर पर उसके निरंतर कब्जे, पूरे क्षेत्र में आतंकवाद को संरक्षण देने और उसकी घरेलू अस्थिरता से ध्यान भटकाने की कोशिश हैं।’
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी राजनाथ सिंह के पीओजेके संबंधी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत की ‘अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कानूनी वास्तविकताओं को आक्रामक बयानबाजी के जरिए बदलने की लगातार कोशिशें तथ्यों को नहीं बदल सकतीं।’
उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘इस तरह के बयान न तो भारत के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर की स्थिति बदल सकते हैं और न ही क्षेत्रीय शांति, स्थिरता या सार्थक संवाद में कोई योगदान दे सकते हैं।’
आसिफ ने आगे कहा, ‘भारत द्वारा बार-बार पाकिस्तान को बदनाम करने की कोशिशों की कोई विश्वसनीयता नहीं है। वास्तव में, दक्षिण एशिया में भारत ही आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रायोजक और अस्थिरता फैलाने वाला देश है, जिसने अपनी आक्रामक नीतियों के जरिए पूरे क्षेत्र को बंधक बना रखा है।’
उन्होंने यह भी कहा, ‘भारत की गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी क्षेत्र में देशों के बीच संघर्ष की आशंका को और बढ़ाने का जोखिम पैदा करती है।’
गौरतलब है कि पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय हर सप्ताह शुक्रवार को नियमित प्रेस ब्रीफिंग करता है, जिसमें वहां के प्रवक्ता विभिन्न मुद्दों पर जानकारी देते हैं। लेकिन इस बार राजनाथ सिंह के बयान पर अलग से विदेश मंत्रालय को सक्रिय होकर बयान जारी करना पड़ा, जो यह दर्शाता है कि भारत से जुड़े इस मुद्दे को पाकिस्तान कितनी गंभीरता से ले रहा है।
1994 में भारत की संसद ने पारित किया था प्रस्ताव
भारत के संदर्भ में पीछे मुड़कर देखें तो यह जानना जरूरी है कि पीओजेके पर भारत की स्थिति कब स्पष्ट रूप से तय और स्थापित हुई। यदि हम कुछ दशक पीछे जाएं तो पाएंगे कि 1994 में, जब पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी, तब संसद ने 22 फरवरी 1994 को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें पीओजेके पर भारत का रुख स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया। पीओजेके को लेकर भारत की नीति का सबसे स्पष्ट रुख राव के कार्यकाल में सामने आया और वही आज तक लागू है।
ये भी है कि दिवंगत पीवी नरसिम्हा राव ऐसे प्रधानमंत्री रहे हैं, जिन पर इस देश में सबसे कम बातें होती हैं। उन्हें गलत तरीके से आंका गया। उनके नेतृत्व में काम करते हुए और उनकी नीतियों का अनुसरण करते हुए डॉ. मनमोहन सिंह को उस अर्थशास्त्री के रूप में पहचान मिली, जिसने देश को आर्थिक संकट की गहराई में जाने से बचाया।
डॉ. सिंह ने भले ही वित्त मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में कई आर्थिक सुधारों की शुरुआत की हो, लेकिन इन सुधारों की नींव प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के समर्थन से ही रखी गई थी। राव ने ही उन्हें जरूरी आर्थिक सुधार लागू करने और अर्थव्यवस्था को उदार बनाने की अनुमति दी थी। यदि राव का पूरा समर्थन न होता, तो डॉ. सिंह को वैसे आर्थिक विशेषज्ञ की पहचान शायद नहीं मिलती, जो बाद में उनसे जुड़ गई।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस उस नेता का सम्मान नहीं करती, जिसने कभी पार्टी का नेतृत्व किया और अपना पूरा राजनीतिक जीवन उसी पार्टी में बिताया। ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि वह नेहरू-गांधी परिवार से नहीं थे। जाहिर तौर पर कांग्रेस का प्रथम परिवार शायद यह मानता है कि नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का कोई भी व्यक्ति यदि शीर्ष पद तक पहुंचता है, तो वह केवल सत्ता पर काबिज होने वाला व्यक्ति है। वहीं, चूंकि राव भाजपा से नहीं थे, इसलिए केंद्र की मौजूदा सरकार भी उनके नेतृत्व और प्रतिभा की खुलकर सराहना करने का कोई विशेष कारण नहीं देखती, जबकि उन्होंने देश को बेहद कठिन दौर में नेतृत्व दिया था।
राव ही वह नेता थे, जिन्होंने एक अलग राजनीतिक दल के अपने प्रतिद्वंद्वी अटल बिहारी वाजपेयी से अनुरोध किया था कि वे संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करें। यह तब था जब जम्मू-कश्मीर का मुद्दा काफी जोर पकड़ रहा था। आज पीओजेके को लेकर भाजपा के नेताओं की ओर से जो बातें कही जाती हैं, उनकी मूल नीति और स्वरूप को राव के कार्यकाल में ही तय किया गया था।
दिवंगत कैप्टन विक्रम बत्रा और कैप्टन मनोज पांडेय जैसे वीर सैनिकों को याद करना हर कृतज्ञ भारतीय का कर्तव्य है और यह हमेशा किया जाना चाहिए। लेकिन हमें पीवी नरसिम्हा राव को भी याद रखना चाहिए, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर राष्ट्रीय सहमति बनाकर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. फारूक अब्दुल्ला जैसे नेताओं को भी देशहित में एक साथ खड़ा किया।
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