Home विचार-विमर्श राज की बातः जब हर रात गोलाबारी होती थी और ‘राजा रामचंद्र...

राज की बातः जब हर रात गोलाबारी होती थी और ‘राजा रामचंद्र जी की जय’ के साथ जवान बढ़ते थे आगे

शाम ढलते ही पूरा इलाका दीपावली जैसा दिखाई देता था। दोनों ओर से लगातार दागे जा रहे गोले, विस्फोटों की गूंज और आसमान में उठती आग की लपटें रात के अंधेरे को चीर देती थीं। वह दृश्य जितना रोमांचकारी था, उतना ही भयावह भी।

Indian soldiers advance across a rugged, snowy mountain battlefield with the national flag flying as artillery fires and smoke rises.
प्रतिकात्मक एआई इमेज।

कारगिल युद्ध की रिपोर्टिंग करना मेरे पत्रकारिता जीवन का सबसे रोमांचकारी, चुनौतीपूर्ण और अविस्मरणीय अनुभव रहा। भारतीय सेना की 15वीं कोर से युद्ध क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति मिलने के बाद मुझे उस रणभूमि को बेहद करीब से देखने का अवसर मिला, जहां भारतीय सैनिक मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा रहे थे।

सोनमर्ग स्थित सेना के शिविर में नाश्ता करने के बाद हमें झुमरा मोड़ से आगे बढ़ने की अनुमति मिली। जोजिला दर्रे को पार करते हुए लगभग दोपहर में हम द्रास पहुंचे। करीब 12,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस मार्ग पर पहली बार राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-1ए के किनारे युद्ध के लिए तैनात सैकड़ों बोफोर्स तोपें दिखाई दीं। खेतों में हजारों खाली गोले बिखरे पड़े थे, जो भीषण संघर्ष की गवाही दे रहे थे। 8 माउंटेन डिवीजन और 8 ग्रेनेडियर्स के जवान पूरे उत्साह और अदम्य साहस के साथ मोर्चे पर डटे थे। उनका बुलंद युद्धघोष “राजा रामचंद्र की जय” पहाड़ों में गूंज रहा था।

सूर्यास्त होते ही दुश्मन की ओर से भीषण गोलाबारी शुरू हो गई और हमें बंकरों में शरण लेनी पड़ी। द्रास नगर में पाकिस्तानी सेना द्वारा बिछाई गई समानांतर दूरसंचार व्यवस्था स्पष्ट दिखाई दे रही थी, जो स्थानीय स्तर पर उन्हें मिले सहयोग की ओर संकेत करती थी। द्रास सर्किट हाउस दुश्मन की गोलाबारी का शिकार हो चुका था। राष्ट्रीय राजमार्ग पर पाकिस्तानी गोलाबारी से जले हुए दो तेल टैंकर युद्ध की विभीषिका के मौन गवाह बने खड़े थे।

कारगिल सर्किट हाउस में स्थानीय विधायक और तत्कालीन पर्यटन मंत्री ने हमारे साथ चाय पी। उन्होंने कारगिल नगर के सामने की पहाड़ियों पर बर्फीले स्कूटरों से पाकिस्तानी सैनिकों की गतिविधियां भी दिखाईं। उस समय युद्ध अपने चरम पर था। बस स्टैंड के सभी होटल और रेस्तरां बंद थे। केवल होटल जोजिला खुला था, जहां हम ठहरे। होटल कारगिल गोलाबारी में क्षतिग्रस्त हो चुका था। पुलिस अधीक्षक का सरकारी आवास भी गोलाबारी की चपेट में आ गया था, जबकि उपायुक्त को अपना सरकारी आवास छोड़कर अतिथि गृह में रहना पड़ रहा था।

तत्कालीन पुलिस अधीक्षक दीपक कुमार, जो बिहार के भभुआ के रहने वाले थे, अपनी मां से फोन पर भोजपुरी में कह रहे थे, “घबराए के बात नइखे। टेलीविजन पर जे खबर चल रहल बा, ऊ पुरान एसपी बंगला पर हमला भइल रहे। हमनी ठीक बानी।” युद्ध के बीच मां को दिलासा देने की उनकी यह कोशिश आज भी मेरे जेहन में ताजा है।

सड़क किनारे केवल एक सिख द्वारा संचालित छोटा-सा ढाबा खुला था, जहां दाल, चावल और प्याज ही मिलते थे। संचार का एकमात्र माध्यम एक एसटीडी बूथ था, जो प्रतिदिन कुछ घंटों के लिए खुलता था। वहीं से पत्रकार अपनी खबरें फैक्स करते थे और सेना के जवान अपने घर-परिवार से बात करने के लिए लंबी कतार में खड़े रहते थे।

जैसे ही पाकिस्तान की ओर से गोलाबारी शुरू होती, एसटीडी बूथ भी बंद कर दिया जाता और पत्रकारों तथा सैनिकों को सुरक्षित स्थानों पर रहने के निर्देश दिए जाते।

एक शाम मेरी मुलाकात बिहार के बक्सर जिले के एक जवान से हुई। अगली सुबह उसे अग्रिम मोर्चे पर रवाना होना था। फोन न लग पाने के कारण उसने अपने एक परिजन का नंबर मुझे दिया और आग्रह किया कि यदि अवसर मिले तो उन्हें यह संदेश पहुंचा दूं कि वह सकुशल है। उस जवान की आंखों में कर्तव्य के प्रति अटूट निष्ठा थी, लेकिन परिवार से बात न कर पाने की पीड़ा भी साफ झलक रही थी।

शाम ढलते ही पूरा इलाका दीपावली जैसा दिखाई देता था। दोनों ओर से लगातार दागे जा रहे गोले, विस्फोटों की गूंज और आसमान में उठती आग की लपटें रात के अंधेरे को चीर देती थीं। वह दृश्य जितना रोमांचकारी था, उतना ही भयावह भी।

युद्ध क्षेत्र में पहुंच जाने के बाद बाहर निकलना लगभग असंभव था, क्योंकि श्रीनगर और लेह जाने वाले मार्ग बंद कर दिए गए थे। द्रास में सेना की नियमित ब्रीफिंग होती थी, जबकि कारगिल में हमें स्थानीय सेना और प्रशासनिक अधिकारियों से ही युद्ध की जानकारी मिलती थी। इसी दौरान बटालिक सेक्टर में भारतीय अधिकारियों और जवानों के साथ हुई बर्बरता की खबरें भी मिलीं, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया।

युद्धविराम के बाद जब हम लौट रहे थे, तब द्रास में पता चला कि जिन भारतीय अधिकारियों ने कुछ दिन पहले हमें युद्ध की स्थिति से अवगत कराया था और आत्मीयता से बातचीत की थी, उनमें से कई मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। यह समाचार सुनकर मन भारी हो गया। उसी क्षण युद्ध का वास्तविक मूल्य समझ में आया। विजय केवल रणभूमि में नहीं मिलती, बल्कि उन अनगिनत बलिदानों में निहित होती है, जिन्हें हमारे वीर सैनिक राष्ट्र की रक्षा के लिए हंसते-हंसते स्वीकार कर लेते हैं।

ये भी पढ़ेंः राज की बात: जब डीजीपी का फोन आता, डिप्टी आईजी भी टोपी पहन कर सलामी ठोकते थे

author avatar
लव कुमार मिश्र
लव कुमार मिश्र, 1973 से पत्रकारिता कर रहे हैं,टाइम्स ऑफ इंडिया के विशेष संवाददाता के रूप में देश के दस राज्यों में पदस्थापित रह। ,कारगिल युद्ध के दौरान डेढ़ महीने कारगिल और द्रास में रहे। आतंकवाद के कठिन काल में कश्मीर में काम किए।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version