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खबरों से आगे: जम्मू-कश्मीर में विवादित किताबों के मामले में 3 प्रकाशक गिरफ्तार; पर कई सवालों के जवाब अब भी बाकी

तीन पब्लिशर को गिरफ्तार किया गया है। लेकिन समझ में यह नहीं आता कि ‘समग्र शिक्षा’ के उन अधिकारियों में से किसी को भी क्यों गिरफ्तार नहीं किया गया है, जो इन किताबों को चुनने के लिए जिम्मेदार थे।

Jammu Kashmir controversial books case
प्रतीकात्मक तस्वीर

जम्मू में काउंटर इंटेलिजेंस (CI) इकाई की टीम रविवार को जम्मू-कश्मीर में कुछ किताबों को लेकर चल रहे विवाद की जांच के सिलसिले में तीन प्रकाशकों को गिरफ्तार करने की कार्रवाई में जुटी रही। अधिकारियों के अनुसार, इन गिरफ्तारियों से पहले जम्मू और दिल्ली में अभियान चलाए गए।

गिरफ्तार किए गए लोगों में ओबेरॉय बुक सर्विस से इंदरपाल, नोएडा स्थित डॉमिनेंट पब्लिशर्स से अमरदीप सिंह और गिरीश अरोड़ा शामिल हैं। इससे पहले ओबेरॉय बुक सर्विस और डॉमिनेंट पब्लिशर्स दोनों को सरकार द्वारा ब्लैकलिस्ट किया जा चुका था। काउंटर इंटेलिजेंस की टीमों ने 6 जुलाई को इन दोनों संस्थानों के परिसरों में छापेमारी भी की थी।

अधिकारियों के अनुसार, ये गिरफ्तारियां उन पुस्तकों के प्रकाशन और वितरण से जुड़े व्यापक जांच अभियान का हिस्सा हैं, जिन्हें ‘बेहद आपत्तिजनक सामग्री’ वाला माना गया है। जांचकर्ता इस बात की पड़ताल कर रहे हैं कि इन पुस्तकों की छपाई और वितरण में संबंधित प्रकाशकों की क्या भूमिका रही।

किताब चुनने वाले क्यों नहीं हुए गिरफ्तार?

फिलहाल समझ में यह नहीं आता कि ‘समग्र शिक्षा’ के उन अधिकारियों में से किसी को भी क्यों गिरफ्तार नहीं किया गया है, जो इन किताबों को चुनने के लिए जिम्मेदार थे। ऐसी किताबें जिन्हें अलगाववादियों और आतंकवादियों का महिमामंडन करने वाला और अनुचित माना गया। मामले में आठ अधिकारियों को सस्पेंड किया गया है। इनमें से कुछ ‘समग्र शिक्षा’ से और कुछ स्कूल शिक्षा विभाग से है। इन किताबों को चुनने और अलग-अलग पब्लिशर्स को इनके लिए ऑर्डर देने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति फजिल इमरान सिद्दीकी हैं, जो एक पूर्व प्रिंसिपल हैं और अभी ‘समग्र शिक्षा’ के साथ काम कर रहे हैं।

आठ लोगों की एक टीम ने उन किताबों को चुना जिनमें आतंकवादियों का महिमामंडन किया गया था। ये सभी पोस्ट-ग्रेजुएट हैं और अभी सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूलों में लेक्चरर और प्रिंसिपल के तौर पर काम कर रहे हैं। इन आठ लोगों की जिम्मेदारी किताबों के कंटेंट की जांच करना था, लेकिन जाहिर है कि उन्होंने या तो उन्हें पढ़ा नहीं, या अगर पढ़ा भी, तो उन्हें दिवंगत एसएएस गिलानी और जेल में बंद आतंकवादियों जैसे यासीन मलिक, मसरत आलम और शब्बीर भट वगैरह का महिमामंडन करने में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा।

किश्तवाड़ के रहने वाले फाजिल इमरान सिद्दीकी सुपरवाइजर की भूमिका में वह आखिरी व्यक्ति थे जिनसे गुजरे बिना कोई भी संदिग्ध चीज आगे नहीं बढ़ सकती थी। सूत्रों के अनुसार, जम्मू के एक सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल में प्रिंसिपल के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान डोडा, किश्तवाड़, पुंछ और राजौरी के दर्जनों बच्चों ने उस स्कूल में दाखिला लिया। अचानक इन इलाकों से स्कूल में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई। उनके उस स्कूल से हटने के बाद, इन छात्रों ने जम्मू के स्कूल से अपना नाम कटवा लिया और वापस अपने-अपने जिलों में चले गए जहाँ से वे आए थे।

इन बेहद दूर-दराज इलाकों के छात्रों को जम्मू आने के लिए प्रोत्साहित करने के पीछे क्या वजह थी? दूसरी जगह पोस्टिंग होने पर उनके (फाजिल इमरान सिद्दीकी) चले जाने पर ये छात्र वापस क्यों चले गए? यह एक ऐसी पहेली है जिस पर अभी तक किसी अधिकारी ने ध्यान नहीं दिया है, लेकिन इस मामले में उनके रिकॉर्ड की जांच-पड़ताल की जानी चाहिए।

विवादित किताबें, एफआईआर….पूरी कहानी समझिए

4 जुलाई को काउंटर इंटेलिजेंस इकाई ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 49 (उकसावा/सहायता), धारा 61(2) (आपराधिक साजिश), धारा 152 (भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालना), धारा 196 (वैमनस्य को बढ़ावा देना) तथा धारा 353 (झूठे बयान, अफवाह या रिपोर्ट प्रकाशित या प्रसारित करना) के तहत, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 13 के साथ एफआईआर दर्ज की थी।

यह कार्रवाई सरकारी पुस्तकालयों में मिली दो पुस्तकों के संबंध में सामने आई उन रिपोर्टों के बाद की गई, जिनमें अलगाववादी नेताओं का महिमामंडन किए जाने का आरोप लगाया गया था।

इन पुस्तकों में जिन अलगाववादी नेताओं का उल्लेख किया गया है, उनमें हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के कट्टरपंथी धड़े के दिवंगत प्रमुख एसएएस गिलानी के अलावा जेल में बंद अलगाववादी नेता शब्बीर शाह, मसर्रत आलम और यासीन मलिक शामिल हैं। शाह, आलम और मलिक आतंकवाद से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए जा चुके हैं। उन्हें आगजनी, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और अन्य गंभीर गतिविधियों में शामिल होने के मामलों में कसूरवार ठहराया गया था।

कागजों पर देखें तो समग्र शिक्षा द्वारा खरीदी जाने वाली पुस्तकों की जांच-परख की एक मजबूत व्यवस्था मौजूद है। हालांकि, व्यवहार में कई बार प्रकाशक अपनी किताबों के चयन से जुड़े अधिकारियों को कमीशन की पेशकश कर एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने की कोशिश करते हैं।

कुछ प्रकाशकों की एक आम रणनीति अपनी पुस्तकों का कवर मूल्य अधिक रखना और पीछे से कथित तौर पर पैसे ऑफर करना होता है। इस तरीके से बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के किताबों को स्कूलों तक पहुंचाने में सफलता मिल जाती है। अपना नाम गोपनीय रखने की शर्त पर एक प्रकाशक ने बताया कि इनमें से अधिकांश पुस्तकें स्कूलों के पुस्तकालयों में बंद अलमारियों की शेल्फ तक ही सीमित रह जाती हैं। उन्होंने कहा कि न तो छात्र और न ही शिक्षक आमतौर पर इन पुस्तकों को निकालकर पढ़ने या उनके पन्ने पलटने की जहमत उठाते हैं।

कुछ और भी ऐसी किताबें स्कूल-कॉलेजों में फैली हुई हैं?

पुलिस का ध्यान जिन पुस्तकों की ओर गया, उनमें पहली पुस्तक ‘पर्सनैलिटीज एंड लेजेंड्स ऑफ जे-के’ है। इसके लेखक हिलाल अहमद और संतोष मीणा हैं, जबकि इसका प्रकाशन जम्मू स्थित ओबेरॉय बुक सर्विस ने किया है।

दूसरी पुस्तक ‘ग्रेट पर्सनैलिटीज ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ है, जिसके लेखक सुशांत गिरी हैं और इसे दिल्ली स्थित अनुराग प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। पहली पुस्तक के सह-लेखक हिलाल अहमद की पहचान और पृष्ठभूमि को लेकर अब भी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। अधिकारियों ने बताया कि जांच चल रही है और आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां होने की उम्मीद है।

अधिकारियों के अनुसार एक पुस्तक की 123 प्रतियां जम्मू, रामबन और उधमपुर जिलों में वितरित की गई थीं, जबकि दूसरी पुस्तक की 128 प्रतियां जम्मू और बारामूला जिलों में भेजी गई थीं।

अधिकारियों ने बताया कि इनमें से अधिकांश पुस्तकों को निर्धारित कार्यालयों में एकत्र करा लिया गया है। हालांकि अब भी कुछ प्रतियों का पता नहीं चल सका है।

इन पुस्तकों को लेकर पैदा हुए विवाद ने जम्मू और कश्मीर दोनों क्षेत्रों में बड़ी हलचल पैदा कर दी है। अधिकारियों के अनुसार, वरिष्ठ अधिकारी अब अन्य पुस्तकों में भी इसी तरह की सामग्री की तलाश में जुटे हैं।

स्कूल स्तर पर इन प्रकाशकों की पुस्तकालयों में मौजूद सभी पुस्तकों की पहचान की जा रही है। इस प्रक्रिया के तहत शिक्षक और लाइब्रेरियन भी लगातार सतर्क रहते हुए संबंधित पुस्तकों की जांच कर रहे हैं।

कुछ विश्वविद्यालयों में भी यह पता लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं कि क्या इस तरह की सामग्री उनके ऑनलाइन रिपॉजिटरी या पुस्तकालयों में उपलब्ध पुस्तकों में मौजूद है। अधिकारियों के अनुसार यह कार्रवाई उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के निर्देश के बाद लगभग एक सप्ताह पहले शुरू की गई थी।

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सन्त कुमार शर्मा

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