Home कला-संस्कृति स्मरण: राजकमल चौधरी, भारतीय आधुनिकता को बिना भ्रम के देखने वाला लेखक

स्मरण: राजकमल चौधरी, भारतीय आधुनिकता को बिना भ्रम के देखने वाला लेखक

राजकमल चौधरी का विकास ऐसे समय में हुआ, जब भारतीय समाज तीव्र परिवर्तन से गुजर रहा था. औपनिवेशिक सत्ता का अंत हो रहा था, लोकतंत्र अपनी संस्थाएँ बना रहा था, शहरों का विस्तार हो रहा था, और पारंपरिक सामाजिक संरचनाएँ धीरे-धीरे बदल रही थीं. लेकिन स्वतंत्रता के साथ जो आदर्शवाद आया था, उसके समानांतर जाति, वर्ग और पितृसत्ता की जड़ें भी बनी हुई थीं. उनकी रचनात्मकता इसी विरोधाभास से जन्म लेती है.

आज राजकमल चौधरी की पुण्यतिथि है। इस मौके पर उनकी रचनाशीलता का विश्लेषण कर रहे हैं आशुतोष कुमार ठाकुर.

Rajkamal Chaudhary

स्वतंत्रता के बाद भारत में अनेक महत्वपूर्ण लेखक हुए, पर राजकमल चौधरी आज भी जिस तीव्रता से हमारे समय में उपस्थित दिखाई देते हैं, वह दुर्लभ है. कवि, कथाकार, उपन्यासकार, निबंधकार, अनुवादक और सांस्कृतिक हस्तक्षेपकारी के रूप में उन्होंने हिन्दी और मैथिली, दोनों भाषाओं में एक साथ काम किया. उनकी रचनाएँ पढ़ते हुए बार-बार यह एहसास होता है कि वे अपने समय से केवल संवाद नहीं कर रहे थे, उससे असहमति भी दर्ज कर रहे थे. वे मिथिला की मिट्टी से निकले लेखक थे, स्वतंत्रता-प्राप्त भारत की पहली पीढ़ी के बौद्धिक थे और हर प्रकार की सामाजिक, राजनीतिक तथा साहित्यिक रूढ़ि के प्रति संशय से भरे हुए रचनाकार थे.

13 दिसंबर 1929 को बिहार के सहरसा जिले के महिषी गाँव में जन्मे राजकमल चौधरी का निधन 19 जून 1967 को मात्र सैंतीस वर्ष की आयु में हो गया. परिवार और गाँव में उन्हें स्नेह से ‘फूल बाबू’ कहा जाता था. उनके जीवन को याद करने वाले उनके ग्रामीण प्रायः महिषी स्थित प्राचीन उग्रतारा मंदिर के प्रति उनके गहरे लगाव का भी उल्लेख करते हैं.
उनका जीवन छोटा था, पर साहित्यिक संसार असाधारण रूप से व्यापक. उपन्यास, कहानियाँ, कविताएँ, नाटक, निबंध, अनुवाद और पत्रकारिता, उन्होंने लगभग हर विधा में लिखा. हिन्दी और मैथिली साहित्य में उनका स्थान ऐसा है जिसे किसी एक खाँचे में नहीं रखा जा सकता. लेखकों ने उन्हें हमेशा सम्मान दिया, नई पीढ़ियाँ लगातार उनकी ओर लौटती रहीं, पर साहित्यिक संस्थाएँ उन्हें वह मान्यता नहीं दे सकीं जिसके वे वास्तव में हकदार थे.

यदि हम आधुनिक मैथिली साहित्य का अध्ययन करें, तो स्पष्ट होता है कि उसका विकास कुछ विलक्षण रचनाकारों के निर्णायक हस्तक्षेपों से संभव हुआ है. हरिमोहन झा ने व्यंग्य और मनोवैज्ञानिक यथार्थ के माध्यम से मैथिली गद्य को नई दिशा दी. बाबा ‘यात्री’ (नागार्जुन) ने उसमें सामाजिक चेतना और राजनीतिक ऊर्जा का संचार किया. राजकमल चौधरी ने इन दोनों परंपराओं को आत्मसात किया, लेकिन उन्हें एक नए क्षेत्र में ले गए. यदि हरिमोहन झा ने मैथिली गद्य को आधुनिक बनाया और नागार्जुन ने उसे राजनीतिक चेतना दी, तो राजकमल ने उसे मनुष्य के भीतर की दुनिया से जोड़ा. उन्होंने मैथिली साहित्य को उस आधुनिक मनुष्य की कथा से जोड़ा, जो शहरों की भीड़ में अकेला है, अपने ही अस्तित्व से जूझ रहा है और सामाजिक नैतिकताओं के बीच अपनी इच्छाओं तथा पहचान के लिए संघर्षरत है.

राजकमल चौधरी के साहित्य का गंभीर पाठ यह बताता है कि उन्होंने मैथिली साहित्य को एक नई संवेदनात्मक और वैचारिक भाषा दी. यह भाषा सांत्वना की नहीं, बेचैनी की भाषा है; निश्चितताओं की नहीं, विखंडित होते मानवीय अनुभवों की भाषा है. उनकी रचनाओं के नए संस्करण, बढ़ते अनुवाद और उन पर हो रहे शोध इस बात के प्रमाण हैं कि राजकमल चौधरी ने जिन सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय प्रश्नों को उठाया था, वे आज भी हमारे समय में उतने ही प्रासंगिक और अनुत्तरित बने हुए हैं.

एक आधुनिक लेखक का निर्माण

राजकमल चौधरी ऐसे समय में बड़े हुए जब भारतीय समाज तीव्र परिवर्तन से गुजर रहा था. औपनिवेशिक सत्ता का अंत हो रहा था, लोकतंत्र अपनी संस्थाएँ बना रहा था, शहरों का विस्तार हो रहा था, और पारंपरिक सामाजिक संरचनाएँ धीरे-धीरे बदल रही थीं. लेकिन स्वतंत्रता के साथ जो आदर्शवाद आया था, उसके समानांतर जाति, वर्ग और पितृसत्ता की जड़ें भी बनी हुई थीं.

राजकमल की रचनात्मकता इसी विरोधाभास से जन्म लेती है. उन्होंने स्वतंत्रता के वादों को भी देखा और उन वादों की सीमाओं को भी. मैथिली के वरिष्ठ लेखक तारानंद वियोगी, जिन्होंने राजकमल पर जीवनीपरक पुस्तक जीवन क्या जिया लिखी है, मानते हैं कि राजकमल ने बहुत जल्दी समझ लिया था कि आधुनिक संस्थाएँ अपने आप सामंती संस्कारों को समाप्त नहीं करेंगी. कई बार वे उन्हें नए रूपों में पुनर्स्थापित भी कर देंगी.

यह समझ उनके कथा-संसार में लगातार दिखाई देती है. उनके शहर मुक्ति के स्थल नहीं हैं. वहाँ अकेलापन और गहरा हो जाता है. उनके गाँव भी नैतिक पवित्रता के प्रतीक नहीं हैं. वे जाति, पितृसत्ता और सामाजिक मौन से संचालित संसार हैं.

राजकमल का योगदान मात्र मौलिक लेखन तक सीमित नहीं था. वे भारतीय भाषाओं के बीच संवाद के समर्थक थे. शंकर के चर्चित बंगला उपन्यास चौरंगी का उनका हिन्दी अनुवाद इस बात का उदाहरण है. पत्रकारिता ने भी उनके लेखन को प्रभावित किया. उन्होंने निबंध, समीक्षाएँ और टिप्पणियाँ लिखीं.

उनकी साहित्यिक विरासत को संरक्षित करने में देवशंकर नवीन का योगदान भी उल्लेखनीय है. संपूर्ण रचनावली के संपादन के माध्यम से उन्होंने राजकमल की बिखरी हुई रचनाओं को एकत्र किया और नई पीढ़ी के पाठकों तक पहुँचाया.

मैथिली साहित्य में एक निर्णायक मोड़

राजकमल चौधरी के बिना आधुनिक मैथिली साहित्य की कल्पना अधूरी है. उनके आने से पहले मैथिली लेखन का बड़ा हिस्सा भक्ति, रोमानी संवेदना और लोक-स्मृतियों से संचालित था. राजकमल ने उसे शहरी यथार्थ, मनोवैज्ञानिक जटिलता और सामाजिक आलोचना की दिशा में मोड़ा.

आंदोलन, आदिकथा, पत्थर फूल, साँझक गाछ, लालका पाग और निर्मोही बालम हमर जैसी रचनाओं ने मैथिली गद्य की संभावनाओं का विस्तार किया. उन्होंने जाति भेद, यौन दमन, आर्थिक असुरक्षा और घरेलू उत्पीड़न को साहित्य का विषय बनाया.

मैथिली के प्रसिद्ध लेखक केदार कानन ने एक बार मुझसे कहा था कि गाँव के बुज़ुर्ग लोग राजकमल को हमेशा एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद करते थे जो लगातार लोगों को देखता और सुनता रहता था. बातचीत, हाव-भाव और रोज़मर्रा के व्यवहार में उसकी विशेष रुचि थी. वह जानता था कि समाज अपने सबसे सच्चे रूप में दैनिक जीवन में ही प्रकट होता है.
यह सजगता उनके गद्य की बड़ी विशेषता बनी. उनके पात्र किसी साहित्यिक योजना के तहत बनाए गए चरित्र नहीं लगते. वे ऐसे लोग हैं जिन्हें हम अपने आसपास देख सकते हैं. उनकी आशंकाएँ, इच्छाएँ और विफलताएँ सामाजिक यथार्थ से निकलती हैं.

तारानंद वियोगी का मानना है कि राजकमल ने मैथिली साहित्य को एक ‘आधुनिक तंत्रिका-तंत्र’ दिया. उनसे पहले का मैथिली साहित्य प्रायः अतीत की ओर देखता था. उनके बाद उसने अपने वर्तमान का सामना करना शुरू किया.

हिन्दी कथा-साहित्य और मध्यवर्गीय नैतिकता का संकट

राजकमल चौधरी ने हिन्दी कथा-साहित्य में भी गहरा हस्तक्षेप किया. उनके उपन्यास बीसवीं शताब्दी के भारतीय समाज में यौनिकता, शहरी अकेलेपन और नैतिक पाखंड की सबसे साहसी पड़तालों में शामिल हैं.

मछली मरी हुई इसका सबसे चर्चित उदाहरण है. साठ के दशक में प्रकाशित इस उपन्यास ने अकेलेपन, यौन दमन और समलैंगिक इच्छा जैसे विषयों को सामने रखा, जब हिन्दी साहित्य इन प्रश्नों से लगभग बचता था. राजकमल ने इन्हें आधुनिक जीवन की अंतर्विरोधी संरचनाओं के रूप में देखा. निर्मल पद्मावत, कल्याणी, शिरीन और प्रिया के माध्यम से उन्होंने इच्छा, स्मृति, विवाह और पहचान के जटिल संबंधों की पड़ताल की. विशेष रूप से शिरीन का चरित्र हिन्दी उपन्यास में स्त्री-अनुभव और यौनिकता के एक ऐसे विमर्श को खोलता है, जो अपने समय से काफी आगे दिखाई देता है. यह उपन्यास संकेत देता है कि आधुनिक मध्यवर्ग का संकट केवल सामाजिक व्यवस्था का संकट नहीं, आत्म और संबंधों के विखंडन का भी संकट है.

Left book cover shows 'The Dead Fish' with a large sunflower and stylized fish design, by Rajkamal Choudhary (translated by Mahua Sen).
Rajkamal Chaudhary books

नदी बहती थी, ताश के पत्तों का शहर, शहर था शहर नहीं था और बीस रानियों के बायस्कोप जैसे उपन्यास मध्यवर्गीय जीवन की नैतिक संरचनाओं की पड़ताल करते हैं. विवाह यहाँ प्रेम से अधिक सामाजिक व्यवस्था है. सम्मान सामाजिक नियंत्रण का उपकरण बन जाता है. व्यक्ति स्वतंत्र होना चाहता है, लेकिन परंपरा और अपेक्षाओं के जाल में फँसा रहता है.
सुपरिचित लेखक और आलोचक प्रभात रंजन का मानना है कि राजकमल के कथा-साहित्य में एक दुर्लभ ‘मनोवैज्ञानिक निर्वसन’ दिखाई देता है. उनके अनुसार राजकमल ने समझ लिया था कि आधुनिक भारत का संकट केवल राजनीतिक या आर्थिक नहीं है. वह भावनात्मक भी है. उनके पात्र किसी बड़े हादसे से नहीं टूटते. वे रोज़मर्रा के जीवन के दबावों से थक जाते हैं.

यही बात उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाती है.

देह, इच्छा और नैतिकता

राजकमल चौधरी की चर्चा यौनिकता के प्रश्न के बिना अधूरी है. उनकी कविता और कथा दोनों में ‘देह’ केंद्रीय उपस्थिति रखती है. इच्छा उनके यहाँ किसी रोमानी स्वप्न की तरह नहीं आती. वह अकेलेपन, अपराध-बोध और सामाजिक नियंत्रण से निर्मित अनुभव है.

इस दृष्टि ने उन्हें अपने समय की रूढ़ साहित्यिक धारा से अलग खड़ा किया. उनके यहाँ यौनिकता केवल निजी विषय नहीं है. वह सामाजिक संरचना को समझने का माध्यम बन जाती है. कौन इच्छा को नियंत्रित करता है? कौन नैतिकता की परिभाषा तय करता है? कौन सीमा लाँघने पर दंडित होता है?

केदार कानन का मानना है कि राजकमल की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने इच्छा और नैतिकता के प्रश्नों को सामाजिक यथार्थ से अलग करके नहीं देखा. उनके अनुसार, राजकमल के यहाँ देह मात्र जैविक उपस्थिति नहीं है असल में वह उससे कहीं अधिक एक समाज, सत्ता और व्यक्ति के बीच चल रहे संघर्ष का क्षेत्र भी है.

तारानंद वियोगी के शब्दों में, राजकमल समझते थे कि समाज अपने नियम सबसे गहरे रूप में मनुष्य की देह पर लिखता है. इसलिए उनके पात्र निकटता चाहते हुए भी भय और अलगाव से घिरे रहते हैं.

यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आज की युवा पीढ़ी के लिए भी अर्थपूर्ण बनी हुई हैं.

कविता और साक्ष्य की नैतिकता

राजकमल चौधरी की कविता को जितना महत्व मिलना चाहिए था, उतना नहीं मिला. कंकावती, मुक्ति प्रसंग, स्वर्गंधा, इस अकाल बेला में और विचित्रा जैसी कृतियाँ एक ऐसे कवि से हमारा परिचय कराती हैं जो अलंकरण से अधिक अनुभव पर भरोसा करता है.

उनकी कविताओं में अकेलापन, मृत्यु-बोध और इच्छा बार-बार लौटते हैं. फिर भी उनमें एक नैतिक गंभीरता बनी रहती है. तारानंद वियोगी का मानना है कि राजकमल की कविता का सबसे विशिष्ट गुण उसका असुविधाजनक ईमान है. उनके अनुसार, राजकमल अपनी कविताओं में किसी वैचारिक आश्रय या सांस्कृतिक सांत्वना की तलाश नहीं करते. वे अपने समय की विडंबनाओं, मनुष्य की विफलताओं और भीतर के अंधकार से सीधा सामना करते हैं.

मुक्ति प्रसंग की भूमिका लिखते हुए अज्ञेय ने राजकमल में एक ऐसे कवि को पहचाना था जो साहित्यिक शिष्टाचार के साथ समझौता नहीं करना चाहता. उनकी कविता में अनुभव और अभिव्यक्ति के बीच कोई दूरी नहीं है.

उनकी कविताएँ मुक्ति का वादा नहीं करतीं. वे अपने समय की बेचैनी का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं. जैसा कि तारानंद वियोगी कहते हैं, राजकमल की कविता पढ़ना कई बार उस पीढ़ी की बेचैनी को सुनना है जिसने स्वतंत्रता का स्वप्न देखा था, लेकिन उसके भीतर छिपी निराशाओं को भी उतनी ही तीव्रता से अनुभव किया.

पुनर्खोज के बाद का राजकमल

लंबे समय तक राजकमल चौधरी अंग्रेज़ी पाठकों की पहुँच से बाहर रहे. पिछले कुछ वर्षों में यह स्थिति बदलनी शुरू हुई है. साउदामिनी देव द्वारा अनूदित Traces of Boots on Tongue and Other Stories ने उनकी कथा-दुनिया के एक महत्वपूर्ण हिस्से को अंग्रेज़ी पाठकों के सामने रखा. इसके बाद महुआ सेन द्वारा अनूदित The Dead Fish ने मछली मरी हुई जैसी चर्चित कृति को नए पाठकों तक पहुँचाया. इन अनुवादों ने राजकमल को हिन्दी और मैथिली की सीमाओं से बाहर निकालकर व्यापक साहित्यिक संवाद का हिस्सा बनाया.
ये अनुवाद केवल साहित्यिक घटनाएँ नहीं हैं; वे पुनर्खोज के गंभीर प्रयास हैं. वे राजकमल को विश्व साहित्य और उत्तर-औपनिवेशिक अनुभवों की बड़ी बहसों में शामिल करते हैं.

फिर भी बहुत काम शेष है. उनकी मैथिली कहानियाँ अभी भी व्यापक रूप से अंग्रेज़ी में उपलब्ध नहीं हैं. जब तक ऐसा नहीं होता, वैश्विक पाठक उनके रचनात्मक व्यक्तित्व के केवल एक हिस्से से परिचित रहेंगे.

राजकमल आज इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उन्होंने भारतीय आधुनिकता को बिना किसी भ्रम के देखा. उन्होंने न परंपरा का महिमामंडन किया और न आधुनिकता का जश्न मनाया. वे जानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता सामाजिक असमानताओं को अपने आप समाप्त नहीं करती.

उनकी रचनाएँ हमें असुविधाजनक प्रश्नों से सामना कराती हैं. वे हिन्दी और मैथिली साहित्य की नैतिक तथा भावनात्मक सीमाओं का विस्तार करती हैं.

इसका सबसे मार्मिक उदाहरण लालका पाग की ‘तिरु’ है. भारतीय भाषाओं के कथा-साहित्य में स्त्री पात्रों की एक समृद्ध परंपरा रही है, लेकिन जिस दौर में यह कहानी लिखी जा रही थी, उस समय बहुत कम स्त्री पात्र इतने आत्मविश्वास, जटिलता और आत्मचेतना के साथ सामने आते हैं.

हिन्दी, मैथिली और अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में भी उस समय ऐसी स्त्री आवाज़ें विरल थीं जो अपनी इच्छाओं, असंतोष, आंतरिक संघर्ष और मानवीय गरिमा को इतनी स्पष्टता से व्यक्त कर सकें. उसके माध्यम से राजकमल ने स्त्री की मौन पीड़ा, उसकी इच्छाओं और उसकी मानवीय गरिमा को असाधारण संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया.

इसीलिए राजकमल आज भी हमारे साथ हैं. उनका साहित्य अतीत की वस्तु नहीं है. वह हमारे वर्तमान को पढ़ता है. कई बार हमसे पहले हमें पहचान लेता है.

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आशुतोष कुमार ठाकुर
आशुतोष कुमार ठाकुर समाज, साहित्य और कला पर नियमित लिखते हैं।

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