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राज कपूरः क्लैपर बॉय से हिंदी सिनेमा के ‘शोमैन’ बनने तक की अनोखी दास्तां

आज राज कपूर की पुण्यतिथि है। आज ही के दिन 1988 में वह सिनेमा की एक लंबी विरासत को छोड़ चले गए थे। इस मौके पर उन्हें याद करना दरअसल भारतीय सिनेमा के उस सुनहरे दौर को याद करना है, जिसकी धड़कनों में राज कपूर बसते थे।

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raj kapoor
राज कपूर। फोटो- एआई

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल अभिनेता या निर्देशक नहीं, बल्कि एक युग की पहचान बन जाते हैं। राज कपूर ऐसा ही एक नाम हैं। ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘बरसात’, ‘संगम’, ‘मेरा नाम जोकर’ और ‘बॉबी’ जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने न केवल करोड़ों दर्शकों का दिल जीता, बल्कि हिंदी सिनेमा को विश्व मंच पर नई पहचान भी दिलाई। उनकी पुण्यतिथि (2 जून 1988) पर उन्हें याद करना दरअसल भारतीय सिनेमा के उस सुनहरे दौर को याद करना है, जिसकी धड़कनों में राज कपूर बसते थे।

14 दिसंबर 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जन्मे राज कपूर का बचपन से ही झुकाव फिल्मों और थिएटर की तरफ था। उनके पिता पृथ्वीराज कपूर उस दौर के दिग्गज अभिनेता और थिएटर आर्टिस्ट थे। वे अक्सर राज कपूर की पढ़ाई के प्रति बेरुखी और चौबीसों घंटे फिल्मों के ख्यालों में खोए रहने की आदत से बेहद चिंतित रहते थे। करियर की इसी चिंता में वे अक्सर कहा करते थे, “राज जिंदगी में कुछ नहीं कर पाएगा।”

जब केदार शर्मा ने राज कपूर को जड़ दिया था थप्पड़

लेकिन बेटे के भीतर छिपे जुनून को पहचानकर उन्होंने एक दिन राज कपूर को अपने गहरे दोस्त और उस दौर के मशहूर फिल्मकार केदार शर्मा के पास काम सीखने के लिए भेज दिया।केदार शर्मा के साथ राज कपूर के फिल्मी सफर की शुरुआत बेहद जमीनी स्तर से हुई। वे सेट पर छोटे-मोटे काम करते थे और ‘क्लैपर बॉय’ की जिम्मेदारी संभालते थे। वे हर काम को पूरी लगन से सीखते थे, लेकिन उनके भीतर एक हीरो बनने की तड़प हमेशा अंगड़ाइयां लेती रहती थी।

इसी दौरान की एक बेहद चर्चित और अनोखी घटना है। एक दिन शूटिंग के दौरान राज कपूर का ध्यान क्लैप देने के बजाय अपने बालों में कंघी करने पर था। निर्देशक केदार शर्मा को शॉट के बीच में यह लापरवाही इतनी नागवार गुजरी कि उन्होंने गुस्से में आकर राज कपूर को एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया।

पूरे सेट पर सन्नाटा पसर गया, लेकिन उसी पल केदार शर्मा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने राज की आंखों में देखा और समझ गए कि यह लड़का क्लैप देने के लिए नहीं, बल्कि कैमरे के सामने इतिहास रचने के लिए पैदा हुआ है। केदार शर्मा ने अगले ही दिन एक बड़ा फैसला लिया और साल 1947 में अपनी आने वाली फिल्म ‘नील कमल’ के लिए राज कपूर को बतौर मुख्य अभिनेता कास्ट कर लिया। इस फिल्म में उनके अपोजिट अभिनेत्री मधुबाला थीं। सिनेमा के गलियारों में आज भी कहा जाता है कि केदार शर्मा का वह थप्पड़ राज कपूर की सोई हुई किस्मत को जगाने वाला साबित हुआ।

24 की उम्र में की आरके स्टूडियो की स्थापना

‘नील कमल’ से राज कपूर को एक अभिनेता के रूप में पहचान तो मिल गई, लेकिन उनके सपने सिर्फ एक्टिंग तक सीमित नहीं थे। वे परदे के पीछे की दुनिया को नियंत्रित करना चाहते थे। इसी महत्वाकांक्षा के साथ उन्होंने महज 24 साल की उम्र में अपना खुद का स्टूडियो ‘आरके फिल्म्स’ स्थापित कर दिया।

बतौर निर्देशक उनकी पहली फिल्म 1948 में आई ‘आग’ थी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक कमाल नहीं दिखा पाई। राज कपूर ने हार नहीं मानी और 1949 में फिल्म ‘बरसात’ बनाई। इस फिल्म की अपार सफलता ने उनकी किस्मत का सितारा चमका दिया। ‘बरसात’ के साथ ही सिनेमा जगत को एक ऐसी जादुई टीम मिली, जिसने संगीत के इतिहास को बदल दिया। इस टीम में संगीतकार शंकर-जयकिशन, गीतकार शैलेंद्र और हसरत जयपुरी शामिल थे।

राज कपूर की शुरुआती फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे सिर्फ मनोरंजन नहीं करती थीं, बल्कि तत्कालीन समाज का आईना थीं। उनकी फिल्मों में आजादी के बाद के नेहरूवादी समाजवाद और शहरों में आम आदमी के संघर्ष की गहरी झलक मिलती थी।

साल 1951 में आई उनकी फिल्म ‘आवारा’ ने उन्हें सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि सोवियत संघ (रूस), चीन और मध्य-पूर्व के देशों में एक अंतरराष्ट्रीय सुपरस्टार बना दिया। उनका कोट, फटी पैंट और सिर पर ढीली टोपी वाला ‘राजू’ का किरदार वैश्विक स्तर पर ‘भारतीय चार्ली चैपलिन’ के रूप में स्थापित हो गया। इसके बाद ‘श्री 420’, ‘जागते रहो’ और ‘जिस देश में गंगा बहती है’ जैसी कालजयी फिल्मों ने उन्हें सफलता के शिखर पर पहुंचा दिया।

बेटे की इस अभूतपूर्व सफलता को देखकर पिता पृथ्वीराज कपूर का नजरिया पूरी तरह बदल गया। जो पिता कभी बेटे के भविष्य को लेकर डरे हुए थे, वे बाद में गर्व से महफिलों में कहने लगे- “शुरुआत में लोग राज कपूर को मेरे बेटे के रूप में जानते थे, लेकिन आज मुझे यह कहते हुए फख्र महसूस होता है कि दुनिया मुझे ‘राज कपूर के पिता’ के नाम से पहचानती है।”

‘मेरा नाम जोकर’ और अंतिम सफर

राज कपूर ने अपने जीवन का सबसे बड़ा जोखिम अपनी सबसे महत्वाकांक्षी और आत्म-कथात्मक फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ को बनाने में लिया। हालांकि, रिलीज के वक्त इस फिल्म को वो सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी और राज कपूर आर्थिक संकट में घिर गए, लेकिन आज इस फिल्म को भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित और कल्ट क्लासिक फिल्मों में गिना जाता है। इसके बाद उन्होंने ‘संगम’ और युवाओं पर आधारित ‘बॉबी’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में देकर अपनी बादशाहत दोबारा साबित की। आज राज कपूर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्मों के गीत, उनके किरदार, उनकी आंखों की अदायगी और उनका सिनेमा आज भी जीवित हैं।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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