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सुमन कल्याणपुरः सुरों की एक यादगार विरासत छोड़ गईं

सुमन कल्याणपुर ने हिंदी के अलावा मराठी, बंगाली, असमी, कन्नड़, ओड़िया और अन्य भारतीय भाषाओं में भी अपनी आवाज दी। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने अपने लंबे करियर में 3,000 से अधिक फिल्मी और गैर-फिल्मी गीत रिकॉर्ड किए।

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सुमन कल्याणपुर। इमेज एआई

मुंबई: भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णिम दौर की आवाजें एक-एक कर खामोश होती जा रही हैं। पहले लता मंगेशकर, फिर आशा भोसले और अब मशहूर गायिका सुमन कल्याणपुर। रविवार रात करीब 8 बजे मुंबई में उनका निधन हो गया। उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण गायिका ने अपने घर पर अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ भारतीय संगीत जगत ने एक ऐसी गायिका को खो दिया, जिसकी आवाज दशकों तक लोगों के दिलों में गूंजती रही, लेकिन जिसे अक्सर उसकी असाधारण प्रतिभा के बावजूद वह पहचान नहीं मिली जिसकी वह हकदार थीं।

28 जनवरी 1937 को तत्कालीन पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के ढाका में सुमन हेम्माडी के रूप में जन्मी सुमन एक संपन्न परिवार से थीं। उनके पिता शंकर राव हेम्माडी एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी थे। बचपन के शुरुआती वर्ष बंगाली परिवेश में गुजरे, जिससे आगे चलकर उन्हें बंगाली भाषा और संगीत से गहरा जुड़ाव हुआ। 1943 में उनका परिवार मुंबई आ गया। दिलचस्प बात यह है कि सुमन कभी गायिका नहीं बनना चाहती थीं। उनकी रुचि चित्रकला में थी और उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में दाखिला भी लिया था।

लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। पारिवारिक समारोहों में जब वह नूरजहां के गीत गाती थीं, तो उनकी आवाज सुनकर लोगों ने संगीत सीखने की सलाह दी। इसके बाद उन्होंने पंडित केशवराव भोले, उस्ताद खान अब्दुल रहमान खान, सुधीर फड़के, यशवंत देव और मास्टर नवरंग जैसे गुरुओं से संगीत की शिक्षा ली। शास्त्रीय संगीत की लंबी औपचारिक तालीम भले न मिली हो, लेकिन सुरों पर उनकी पकड़ असाधारण थी।

लता मंगेशकर से होती रही तुलना

1950 के दशक में उन्होंने फिल्म संगीत की दुनिया में कदम रखा। शुरुआती संघर्ष आसान नहीं था। उनकी पहली फिल्मों के कई गीत रिलीज तक नहीं पहुंच पाए। लेकिन धीरे-धीरे संगीतकारों की नजर उनकी आवाज पर पड़ी। 1954 में फिल्म ‘दरवाजा’ में तलत महमूद के साथ गाया उनका युगल गीत उनके शुरुआती करियर का अहम पड़ाव बना। हालांकि उनको असली पहचान 1960 के दशक में मिली। संगीतकार सचिन देव बर्मन ने उन्हें ‘मियां बीवी राजी’ में मौका दिया और फिर 1962 में आई फिल्म ‘बात एक रात की’ का गीत ‘ना तुम हमें जानो, ना हम तुम्हें जानें’ उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर ले गया। हेमंत कुमार के साथ गाया गया यह गीत आज भी हिंदी फिल्म संगीत के सबसे मधुर गीतों में गिना जाता है। विडंबना यह रही कि कई लोग सालों तक इसे लता मंगेशकर की आवाज समझते रहे।

यहीं से शुरू हुई वह तुलना, जो जीवनभर उनके साथ जुड़ी रही। सुमन कल्याणपुर की आवाज लता मंगेशकर से इतनी मिलती-जुलती थी कि कई बार श्रोता दोनों में अंतर नहीं कर पाते थे। लेकिन यह समानता उनके लिए वरदान और अभिशाप दोनों साबित हुई। उन्हें अक्सर ‘गरीबों की लता मंगेशकर’ कहा गया, जबकि संगीत जानकार मानते हैं कि यह उनकी प्रतिभा के साथ अन्याय था। सुमन केवल आवाज में ही नहीं, भावों की अभिव्यक्ति में भी असाधारण थीं और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।

1960 और 1970 का दशक उनके करियर का स्वर्णिम दौर रहा। ‘आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे’, ‘ना ना करते प्यार तुम्हीं से’, ‘तुमने पुकारा और हम चले आए’, ‘बुझा दिए हैं’, ‘अल्लाह करम करना’ और ‘बहना ने भाई की कलाई पर’ जैसे गीतों ने उन्हें घर-घर पहुंचाया। उन्होंने हिंदी ही नहीं, मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, भोजपुरी, उड़िया और कन्नड़ समेत कई भाषाओं में गीत गाए। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने अपने लंबे करियर में 3,000 से अधिक फिल्मी और गैर-फिल्मी गीत रिकॉर्ड किए।

मोहम्मद रफी के साथ बनी यादगार जोड़ी

उनकी सबसे सफल साझेदारी मोहम्मद रफी के साथ रही। दोनों ने मिलकर हिंदी सिनेमा को कई यादगार युगल गीत दिए। यह धारणा अक्सर बनाई गई कि रफी और लता मंगेशकर के बीच रॉयल्टी विवाद के कारण सुमन को अवसर मिले, लेकिन उनके कई लोकप्रिय गीत उस विवाद से पहले के हैं। सच यह है कि संगीतकार उनकी प्रतिभा और सुरों की मिठास के कारण उन्हें चुनते थे।

कम लोगों को पता है कि सुमन कल्याणपुर भारतीय गायकों के विदेशों में बड़े पैमाने पर कॉन्सर्ट करने की परंपरा शुरू करने वालों में भी शामिल थीं। 1969 से 1976 के बीच उन्होंने अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के 30 से अधिक शहरों में कार्यक्रम किए। एक कार्यक्रम तो उस दिन हुआ था जब पूरी दुनिया चंद्रमा पर मानव की पहली लैंडिंग देख रही थी। लेकिन भारतीय श्रोताओं ने उस ऐतिहासिक प्रसारण से ज्यादा उत्साह उनके कार्यक्रम के लिए दिखाया।

गीतों का सही श्रेय तक नहीं दिया गया

संगीत जगत में उनकी उपलब्धियों के बावजूद उन्हें अक्सर वह श्रेय नहीं मिला जिसकी वह हकदार थीं। कई बार उनके गीतों का सही श्रेय तक नहीं दिया गया। कुछ रिकॉर्डों और रेडियो प्रसारणों में उनके नाम की जगह दूसरे नाम लिखे गए। इसके बावजूद उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से शिकायत नहीं की। उनका मानना था कि जो मिला, वही उनकी नियति थी। एक बार उन्होंने कहा था, “मुझे जितने गीत मिले, उनमें से 70 प्रतिशत हिट रहे। यही मेरे लिए सबसे बड़ा संतोष है।”

सुमन कल्याणपुर का स्वभाव बेहद संकोची था। वह मीडिया और सार्वजनिक आयोजनों से दूरी बनाए रखती थीं। प्रसिद्ध रेडियो प्रस्तोता अमीन सयानी ने उनसे इंटरव्यू के लिए दशकों तक प्रयास किया। बताया जाता है कि लगभग 45 साल इंतजार करने के बाद 2005 में उन्हें सुमन का इंटरव्यू रिकॉर्ड करने का मौका मिला। तब भी सुमन ने स्पष्ट कर दिया था कि उनकी तस्वीरें नहीं ली जाएंगी और किसी असहज सवाल का जवाब देना उनके लिए जरूरी नहीं होगा।

‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को लेकर रहा विवाद

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में दिए गए एक इंटरव्यू में सुमन कल्याणपुर ने दावा किया था कि मशहूर देशभक्ति गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ मूल रूप से उन्हें गाने के लिए चुना गया था। उन्होंने कहा कि वह इसकी तैयारी भी कर ली थी, लेकिन अंतिम समय में यह गीत लता मंगेशकर को दे दिया गया। सुमन ने इसे अपने जीवन के सबसे बड़े झटकों में से एक बताया था। हालांकि इस दावे को लेकर वर्षों से अलग-अलग मत सामने आते रहे हैं।

1957 में उन्होंने व्यवसायी रामानंद कल्याणपुर से विवाह किया। उनके पति ने केवल जीवनसाथी ही नहीं, बल्कि उनके करियर के प्रबंधक और सबसे बड़े समर्थक की भूमिका भी निभाई। दोनों की एक बेटी चारुल हुई, जो आज अमेरिका में रहती हैं। 70 के दशक के बाद हिंदी फिल्म संगीत का स्वरूप तेजी से बदलने लगा। पश्चिमी प्रभाव बढ़ा और पारंपरिक मेलोडी का दौर कमजोर पड़ने लगा। इसी दौरान पारिवारिक जिम्मेदारियों और पति की खराब सेहत के कारण उन्होंने धीरे-धीरे खुद को फिल्मों से दूर करना शुरू कर दिया। 1988 की फिल्म ‘वीराना’ उनका अंतिम फिल्मी गीत लेकर आई। इसके बाद उन्होंने एक शांत और निजी जीवन चुना।

सुमन कल्याणपुर के कुछ सदाबहार और सुरीले गीत

‘आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर…‘ (फिल्म: ब्रह्मचारी)

‘ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे…’ (फिल्म: जब जब फूल खिले)

‘तुमने पुकारा और हम चले आए…’ (फिल्म: राजकुमार)

‘ना तुम हमें जानो, ना हम तुम्हें जानें…’ (फिल्म: बात एक रात की)

‘ठहरिए होश में आ लूं, तो चले जाइएगा…’ (फिल्म: मोहब्बत इसकों कहते हैं)

संगीत के क्षेत्र में उनकी निस्वार्थ सेवा के लिए उन्हें देश-विदेश में कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया। भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें 2023 में देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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