
नई दिल्लीः भगवान जगन्नाथ पर आधारित एनिमेटेड फिल्म ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ को लेकर चल रहा विवाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को फिल्म को रिलीज करने की अनुमति तो दे दी, लेकिन यह भी साफ कर दिया कि फिल्म 27 जुलाई को रथ यात्रा समाप्त होने के बाद ही सिनेमाघरों में प्रदर्शित की जाएगी। कोर्ट ने कहा कि फिल्म 28 जुलाई या उसके बाद रिलीज की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि “भक्ति व्यक्ति की आंतरिक भावना होती है। कोई एनिमेटेड फिल्म किसी की श्रद्धा को कम नहीं कर सकती। कल्पना और पौराणिक ग्रंथों में पूरी तरह समानता होना जरूरी नहीं है।”
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने संतुलित रुख अपनाया। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “भक्ति हर व्यक्ति की निजी और आंतरिक भावना है। क्या कोई एनिमेटेड फिल्म श्रद्धा को खत्म कर सकती है? कल्पना को स्कंद पुराण या ब्रह्म पुराण के हर विवरण से पूरी तरह मेल खाना जरूरी नहीं है।”
हालांकि अदालत ने यह भी माना कि रथ यात्रा के दौरान फिल्म रिलीज करने से अनावश्यक विवाद पैदा हो सकता है। इसलिए फिल्म को 27 जुलाई तक रोकने और 28 जुलाई या उसके बाद रिलीज करने का निर्देश दिया गया।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई, आपत्ति किस बात पर थी?
दरअसल ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ को 17 जुलाई को देशभर के करीब 300 सिनेमाघरों में रिलीज होना था। इससे पहले 15 जुलाई को ओडिशा हाईकोर्ट ने इसकी रिलीज पर अंतरिम रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट का मानना था कि फिल्म के कुछ दृश्य भगवान जगन्नाथ की पारंपरिक मान्यताओं और धार्मिक इतिहास से मेल नहीं खाते। ऐसे में रथ यात्रा के दौरान इसकी रिलीज से कानून-व्यवस्था और धार्मिक भावनाओं पर असर पड़ सकता है। हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ फिल्म निर्माता कंपनी एले एनिमेशंस प्राइवेट लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
विवाद की शुरुआत 6 जून 2026 को हुई, जब फिल्म का टीजर ‘जय जगन्नाथ’ नाम के यूट्यूब चैनल पर जारी किया गया। टीजर सामने आने के बाद सोशल मीडिया और धार्मिक संगठनों की ओर से फिल्म की कहानी और भगवान जगन्नाथ के चित्रण पर सवाल उठने लगे।
इसके बाद श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने फिल्म पर आपत्ति जताई। निर्माता ने फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग पुरी के गजपति महाराजा और मंदिर प्रशासन के प्रतिनिधियों को दिखाई। इस दौरान कई सुझाव दिए गए और दावा किया गया कि फिल्म में जरूरी बदलाव किए जाएंगे। लेकिन याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि निर्माता ने पर्याप्त बदलाव किए बिना ही फिल्म की रिलीज की तारीख घोषित कर दी।
ओडिशा सरकार और श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन का कहना था कि फिल्म में भगवान जगन्नाथ से जुड़ी कुछ घटनाओं और कथाओं को पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं के विपरीत दिखाया गया है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि फिल्म के कुछ दृश्य मंदिर प्रशासन और गजपति महाराजा को आपत्तिजनक लगे। उन्होंने दलील दी कि रचनात्मक स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि धार्मिक कथाओं में मूल स्वरूप से बहुत बड़ा बदलाव कर दिया जाए। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई भगवान कृष्ण के जन्म को कारागार के बजाय किसी रिसॉर्ट में दिखाए, तो इसे केवल साहित्यिक स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता।
फिल्म निर्माताओं का पक्ष क्या था?
फिल्म निर्माताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने कहा कि फिल्म का उद्देश्य बच्चों में भगवान जगन्नाथ के प्रति श्रद्धा और रुचि पैदा करना है। इसलिए कहानी को एनिमेशन और कल्पना के माध्यम से बच्चों के लिए सरल बनाया गया है। उन्होंने अदालत को बताया कि यह फिल्म पहले से लोकप्रिय एक एनिमेटेड टीवी सीरीज पर आधारित है, जिसे पिछले दो वर्षों में यूट्यूब पर 100 करोड़ से अधिक बार देखा जा चुका है।
कामत ने यह भी कहा कि ‘बाल गणेश’ और ‘बाल हनुमान’ जैसी कई एनिमेटेड फिल्में पहले भी बन चुकी हैं। इसके अलावा फिल्म को सेंसर बोर्ड (CBFC) पहले ही प्रमाणपत्र दे चुका है। ऐसे में रिलीज पर रोक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर डालती है और इससे निर्माताओं को करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान भी होगा।
यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि फिल्म को पहले ही सेंसर बोर्ड से रिलीज की मंजूरी मिल चुकी थी। इसके बावजूद ओडिशा हाईकोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए रिलीज पर रोक लगा दी।
हाईकोर्ट ने कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि किसी फिल्म से धार्मिक भावनाएं आहत होने या सामाजिक अशांति फैलने की आशंका हो तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। खासकर तब, जब राज्य में भगवान जगन्नाथ की वार्षिक रथ यात्रा चल रही हो।
‘आवारापन’ से ‘तुम्बाड’ तक…जब रिलीज के वक्त फ्लॉप हुईं ये फिल्में समय के साथ बन गईं कल्ट क्लासिक


