Home मनोरंजन भाषा की दीवारें टूटीं…डबिंग कैसे बदल रहा है भारतीय सिनेमा का बाजार?

भाषा की दीवारें टूटीं…डबिंग कैसे बदल रहा है भारतीय सिनेमा का बाजार?

कोविड-19 महामारी के बाद मनोरंजन की खपत का तरीका तेजी से बदला। सिनेमाघरों के साथ-साथ ओटीटी प्लेटफॉर्म दर्शकों की पहली पसंद बन गए। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो, डिज्नी+ हॉटस्टार, जियोहॉटस्टार, सोनी लिव और जी5 जैसे प्लेटफॉर्म अब लगभग हर बड़े शो और फिल्म को कई भाषाओं में उपलब्ध करा रहे हैं।

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film dubbing sector
Film dubbing sector. (AI IMAGE)

एक समय था जब डब फिल्में मुख्यतः टीवी चैनलों पर दोपहर के स्लॉट भरने का माध्यम मानी जाती थीं। दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी संस्करण या विदेशी फिल्मों के स्थानीय भाषा रूपांतरण को मनोरंजन उद्योग का एक सहायक हिस्सा समझा जाता था। लेकिन पिछले एक दशक में तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। आज डबिंग भारतीय मनोरंजन उद्योग की सबसे तेजी से बढ़ती शाखाओं में शामिल है और फिल्म, टेलीविजन तथा ओटीटी प्लेटफॉर्म की रणनीतियों का केंद्र बन चुकी है।

भारत जैसे बहुभाषी देश में, जहां सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं, डबिंग केवल अनुवाद का काम नहीं रह गई है। यह कंटेंट को नए बाजारों तक पहुंचाने, दर्शकों का दायरा बढ़ाने और फिल्मों की कमाई कई गुना बढ़ाने का माध्यम बन गई है।

1,500 करोड़ा का बाजार

विभिन्न शोध फर्मों की रिपोर्टों के अनुसार, भारत का फिल्म डबिंग बाजार 2024 में लगभग 179 मिलियन डॉलर (करीब 1,500 करोड़ रुपये) का आंका गया। 6Wresearch की मानें तो आने वाले वर्षों में इसके 10 से 13 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ने का अनुमान है। रिपोर्ट के अनुसार, डबिंग और लोकलाइजेशन का प्रत्यक्ष कारोबार लगभग 100-120 करोड़ रुपये का है, लेकिन इसका वास्तविक आर्थिक प्रभाव इससे कहीं अधिक बड़ा है क्योंकि यह फिल्मों, टीवी कार्यक्रमों और ओटीटी कंटेंट की पहुंच और कमाई को कई गुना बढ़ा देता है।

राजस्व के लिहाज से टेलीविजन अभी भी डबिंग उद्योग का सबसे बड़ा ग्राहक है। कुल कारोबार में उसकी हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत मानी जाती है। फिल्मों की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत है, जबकि ओटीटी प्लेटफॉर्म का योगदान तेजी से बढ़ते हुए लगभग 10 प्रतिशत तक पहुंच चुका है।

बॉलीवुड से आगे निकला भारतीय सिनेमा

लंबे समय तक भारतीय फिल्म उद्योग की पहचान बॉलीवुड तक सीमित रही, लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है। तेलुगु, तमिल, मलयालम और कन्नड़ फिल्मों ने न केवल अपने क्षेत्रों में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी मजबूत पहचान बनाई है।

‘बाहुबली’, ‘केजीएफ’, ‘आरआरआर’, ‘पुष्पा’ और ‘कांतारा’ जैसी फिल्मों ने साबित किया कि अच्छी कहानी भाषा की सीमाओं में कैद नहीं रहती। इन फिल्मों के हिंदी डब संस्करणों ने उत्तर भारत में रिकॉर्ड कमाई की और हिंदी फिल्म उद्योग के प्रभुत्व को चुनौती दी।

फिल्म व्यापार विश्लेषकों के अनुसार, हिंदी बाजार में दक्षिण भारतीय फिल्मों के डब संस्करण अब नियमित रूप से सैकड़ों करोड़ रुपये का कारोबार कर रहे हैं। ‘पुष्पा 2’, ‘केजीएफ चैप्टर 2’, ‘आरआरआर’ और ‘बाहुबली 2’ जैसी फिल्मों की सफलता ने यह स्थापित किया कि भारत में अब पैन-इंडिया मॉडल ही नया व्यावसायिक फॉर्मूला है।

‘ओरमैक्स मीडिया’ के आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में हिंदी बॉक्स ऑफिस की कुल कमाई में 31 फीसदी की बड़ी हिस्सेदारी साउथ इंडियन फिल्मों के हिंदी डब वर्जन की रही। इसमें कल्कि 2898 एडी और पुष्पा 2: द रूल जैसे ‘पैन-इंडिया’ प्रोजेक्ट्स की मुख्य भूमिका थी। गौरतलब है कि पुष्पा 2: द रूल के केवल हिंदी डब्ड संस्करण ने ही घरेलू बाजार में 800 करोड़ से अधिक का ग्रॉस कलेक्शन कर एक नया इतिहास रचा। भारत में जी5 जैसी कंपनियों की रिपोर्ट बताती है कि उनके कुल दर्शकों में से लगभग 50% लोग नॉन-हिंदी या क्षेत्रीय कंटेंट देखना पसंद करते हैं, जो डबिंग के जरिए संभव हो पाता है।

ओटीटी ने दी डबिंग उद्योग को नई उड़ान

कोविड-19 महामारी के बाद मनोरंजन की खपत का तरीका तेजी से बदला। सिनेमाघरों के साथ-साथ ओटीटी प्लेटफॉर्म दर्शकों की पहली पसंद बन गए। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो, डिज्नी+ हॉटस्टार, जियोहॉटस्टार, सोनी लिव और जी5 जैसे प्लेटफॉर्म अब लगभग हर बड़े शो और फिल्म को कई भाषाओं में उपलब्ध करा रहे हैं।

आज एक तेलुगु फिल्म का दर्शक हिंदी, तमिल, मलयालम, कन्नड़, बंगाली या मराठी में भी उसे देख सकता है। यही कारण है कि डबिंग अब कंटेंट वितरण रणनीति का अनिवार्य हिस्सा बन गई है।

मनोरंजन उद्योग की रिपोर्टें बताती हैं कि क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेंट देखने वाले दर्शकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यही वजह है कि बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म दक्षिण भारतीय और अन्य क्षेत्रीय कंटेंट पर अरबों रुपये का निवेश कर रहे हैं। पिछले साल दिसंबर में ही जियो और डिज्नी के संयुक्त प्लेटफॉर्म ‘जियोहॉटस्टार’ ने अगले पांच सालों में दक्षिण भारतीय कंटेंट पर 4000 करोड़ रुपये निवेश करने की घोषणा थी। कंपनी ने कहा था कि दक्षिण भारत के दर्शक अन्य क्षेत्रों की तुलना में इस प्लेटफॉर्म पर 70 प्रतिशत अधिक समय बिताते हैं।

सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है डबिंग

डबिंग का उपयोग अब फिल्मों से कहीं आगे बढ़ चुका है। टीवी धारावाहिक, एनिमेशन, डॉक्यूमेंट्री, विदेशी वेब सीरीज, गेमिंग कंटेंट और इंटरैक्टिव मीडिया भी तेजी से डब किए जा रहे हैं। विदेशी कंटेंट का भारतीय भाषाओं में रूपांतरण डबिंग बाजार का बड़ा हिस्सा बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय स्टूडियो अब भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं क्योंकि भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल मनोरंजन बाजारों में से एक बन चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले सालों में गेमिंग और एआई आधारित इंटरैक्टिव कंटेंट डबिंग उद्योग के लिए नए अवसर पैदा करेंगे। डबिंग मार्केट में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई और मशीन लर्निंग का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। नई तकनीकों के जरिए वॉयस मैचिंग, लिप-सिंकिंग, टोन रिप्लिकेशन और मल्टी-लैंग्वेज एडाप्टेशन पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज और सटीक हो गया है। हालांकि इस मशीनी सुविधा के बावजूद, फिल्म निर्माता मानते हैं कि इंसानी कला का कोई विकल्प नहीं। क्योंकि किसी भी कंटेंट का सफल डब संस्करण केवल शब्दों का अनुवाद नहीं होता। जिस भाषा के दर्शकों के लिए फिल्म की डबिंग की जाती है, उसके स्थानीय संदर्भों, मूल भावनाओं और सांस्कृतिक संवेदनशीलताओं का भी ध्यान रखना पड़ता है।

डबिंग उद्योग का एक महत्वपूर्ण पक्ष रोजगार भी है। यह क्षेत्र वॉयस आर्टिस्ट, अनुवादक, स्क्रिप्ट एडाप्टर, साउंड इंजीनियर, एडिटर और पोस्ट-प्रोडक्शन विशेषज्ञों सहित हजारों पेशेवरों को काम देता है। छोटे शहरों और क्षेत्रीय बाजारों में भी अब डबिंग स्टूडियो खुल रहे हैं, जिससे स्थानीय प्रतिभाओं के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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