मुझे सहसा लगा, यह लड़का अपनी अनिश्चितता में, अपनी नर्वसनेस में -इस लड़की को खो रहा है। मुझे तब अपने बहुत से मित्र याद हो आये जो महज़ अपनी जिद,अपनी अकड़,अपनी हिंस्र आक्रामकता में, अपने उन्मत्त पैशन में कितनी आसानी से लड़कियों को पा लेते हैं और उन्हें एक क्षण का भी संकोच नहीं होता कि वे उन लड़कियों को अपने मित्रों से छीने ले जा रहे हैं, जो पराजित हो जाते हैं,पीछे हट जाते हैं,इसीलिये नहीं कि वे कम ‘पोटेंट‘ हैं, कम मर्द हैं, कम प्रेम करना जानते हैं बल्कि इसीलिए कि वे ‘नर्वस‘ हैं,अनिश्चित हैं,शंकाकुल हैं, इस बात में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं कि उनमे इतनी सामर्थ्य है कि किसी लड़की को सुखी बना सकें. (मैं तुमसे प्रेम करती हूँ, लेकिन सुनो, मैं तुम्हारे संग सिक्योर महसूस नहीं करती) इसीलिए जब दूसरे आदमी आते हैं, मज़बूत और मुखर, अपनी धुन के पक्के- तो अनायास वे लड़कियाँ उनके साथ चली जाती हैं, उनसे विवाह करके अपनी गृहस्थी बसा लेती हैं, बच्चे जनती हैं, सब कुछ पा लेती हैं, जो कभी चाहती थीं……
लेकिन कभी कभी मैं सोचता हूँ कि किसी सूनी दुपहर में जब उनका पति अपने कोर्ट,फर्म या दफ्तर में होता है और बच्चे स्कूल जा चुके होते हैं, ये लड़कियाँ अवश्य खिड़की से बाहर झांकते हुए, या पलंग पर उंघते हुए या कोई पुराना गुरुदत्त की फिल्म का गाना सुनते हुए (जो कहीं दूर ढाबे के रेडियो से उनके कमरे में चला आता है ) सोचती होंगी उन लड़कों के बारे में जो काफी कच्चे थे,काफी अनिश्चित और चुप्पे से, दुर्भाग्यवश आत्मग्रस्त, जिन्हें कभी, शादी से पहले उन्होंने किसी शाम के झिलमिले में चूमा था-जल्दी और घबराये से होंठ-मुंह पर आये नए उदास रोयों पर और आँखें और साँसे और आँखें…….
वे सो जाती है। खिड़की बंद करके लौट आती है।
क्या वे उन्हें भूल सकती हैं?
– निर्मल वर्मा की डायरी का एक अंश, ‘पुरोवाक’ के प्रवेशांक से उद्धृत
गायत्री है इस लड़की का नाम, मैत्रेयी नहीं। किन्तु नाम से क्या होता है? वह एक प्यारी सी लड़की है बस। यही ‘बस‘ अब डी. डी. के वश का नहीं। अब क्या कभी नहीं था।
कसप पृ. 300
जब तू भाग गया ठहरा उस दिन, तब कैसे समझ रहा कुछ नहीं बदला करके? कुछ तो बदला होगा उस दिन, ना?
कसप पृ. 303
एक दिन वहां गणनाथ में तूने मुझसे कहा था कि ये सुन्दर स्थान पहले भी थे, मैं भी थी, तू भी था। कई बार हम मिल रहे इस सुन्दर संसार में। और हर बार तू मेरे योग्य पाया जा रहा। इसीलिए बार-बार जन्म ले रहे। …….बार-बार तू मेरे योग्य ठहरे, बार-बार मैं आ सकूं इस सुन्दर संसार में तुझसे पीछा करवाने के लिए।
कसप पृ. 304
सुधी पाठक इतने उद्धरण पढ़ते पढ़ते परेशान न होइए, क्या कीजिएगा कि इसी उपन्यास में मनोहर श्याम जोशी लिख गए हैं…प्यार एक उदास सी चीज़ है और बड़ी प्यारी चीज़ है उदासी। इसी प्यार और उदासी के आनंद का संयोग कसप है।
इसी उपन्यास की चर्चा में एक वरिष्ठ लेखक ने कहा था संबंधों के बीच बाज़ार आ गया है और पहाड़ों का प्रेम फिर नहीं लौटेगा। ना लौटे। पर प्रेम है तो। जब तक मनुष्य है, धरती है तब तक कहीं भी प्रेम संभव है। यह ठीक है कि कसप के बहाने मध्य वर्ग की समाजशास्त्रीय व्याख्या खूब बढ़िया की जा सकती है लेकिन पूरा उपन्यास प्रेम की बुनियाद पर खडा़ है। संक्षेप में प्रिय पाठक अगर आपने न पढ़ा हो तो सार सुन लें- देवीदत्त तिवारी उर्फ़ डी.डी. एक अनाथ लड़का है पहाड़ का, तीन बार प्रेम करने का असफल प्रयास कर चुका है। किसी दूर के रिश्ते में होने वाले एक विवाह आयोजन में उसकी बेबी उर्फ़ मैत्रेयी से भेंट होती है जो हमारे इस उपन्यास की नायिका बनने वाली है। बेबी के लिए डी.डी. के जिगरी दोस्त बब्बन की टिप्पणी है-‘किसकी आंगनी दाख’ अर्थात कहाँ संपन्न ऊँचे घर वाली बेबी और कहाँ फटेहाल डी.डी.। डी.डी. ऐसे पिता का बेटा है जो उड़ जाने का जादू दिखाना चाहता था और इसी उड़ान का प्रयास उसे चट्टान से नदी में फेंक देता है गहरी मौत की गोद में।
कहानी आगे बढ़ती है छेड़छाड़, धौल-धप्पे से होती….इसी दौरान डी.डी. फिर बम्बई चला जाता है जहां वह फिल्म लाइन में हाथ पाँव मार रहा था। वहां से बेबी के साथ उसका पत्राचार भी होता है और अचानक हालीवुड की एक निर्देशिका गुलनार के साथ उसे निर्देशन का मौक़ा मिलता है, जिसके लिए वह फिर पहाड़ पर आता है क्योंकि उसे एक विवाह आयोजन को शूट करना है। इस आयोजन में डी.डी. और बेबी की फिर मुलाक़ात होती है। थोड़ा आगे नायिका नायक को विवाह का प्रस्ताव देती है लेकिन नायक लौट आता है।
यह उपन्यास का प्रथम भाग है जो पेज 277 पर ख़त्म होता है, अगले 35 पेजों में तेज़ी से घटनाक्रम घूमा है। डी.डी. हालीवुड जाकर मशहूर निर्देशक हो गया है, वहीं पढ़ाई में फिसड्डी, शरारती और खिलंदड़ बेबी अपने शास्त्री पिता से पढ़ना प्रारंभ करती है और होते होते कालेज अध्यापन के बाद संसद सदस्या और साहित्य कला की अन्यतम संरक्षिका हो जाती है। ये मैत्रेयी देवी एक आई.ए. एस. से विवाह कर अपना परिवार भी बसा लेती हैं।
अंत यही है कि लड़कपन के ये दो प्रेमी मिलते हैं और…और…यह होता है कि….हे पाठक! आप भी कैसी कल्पना करना चाहते हैं…क्या हो सकता है? कुछ नहीं। नायिका कहती है बार बार तू मेरे योग्य ठहरे, बार बार मैं आ सकूं इस सुन्दर संसार में तुझसे पीछा करवाने के लिए।
मनोहर श्याम जोशी ने यह उपन्यास प्रेम कहानियों की घनघोर पाठिका अपनी पत्नी भगवती देवी को समर्पित किया है और इसे प्रेम कहानी कहा है। प्रेम कहानी यह है ही लेकिन जहां-तहां लेखक का बीच में प्रकट होकर टिप्पणी देना और स्मृतियों का ऐसा अद्भुत प्रयोग करना पाठक को बाँध लेता है।
277 पृष्ठों के खिलंदडपन के बाद 35 पृष्ठ इन्ही स्मृतियों से गुंथे गए हैं। ये स्मृतियाँ पहले भी खिलंदडपन में इस तरह सम्मिलित हुई हैं कि पाठक अभिभूत हो जाता है। यहाँ खिलंदडपन उपज रहा है नायक की बेवकूफियों और उल्लूपने से, मज़ा यह है कि जहां हिन्दी के सर्वाधिक हिट प्रेम उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ में यह उल्लूपन ग्लेमराइज़ किया गया है या कहें कि इस किशोर भावुकता को आदर्शीकृत किया गया है वहीं मनोहर श्याम जोशी सचेत हैं, वे इस बेवकूफी को पूरे भदेस के साथ प्रदर्शित करते हैं और पाठक मुग्ध होता जाता है। यह जोशी की खूबी ही है कि वे अपने इस साहस से ना केवल कथा तत्त्व में रोचकता उत्पन्न कर रहे हैं अपितु कला में उपन्यास का भी विकास होता गया है।
उपन्यास का प्रारंभ अर्थात नायक-नायिका का प्रथम मिलन गुलाब के बगीचे में नहीं टट्टी में हुआ है। इस भदेस का तर्क जोशीजी के पास है- ‘भदेस से परहेज हमें भीरू बनाता है और अंतत: हम जीवन के सर्वाधिक भदेस तथ्य मृत्यु से आँखे चुराना चाहते हैं।’ (पृ. 15) यह कसप की खूबी है कि प्रेम के साथ जोड़ दी गयी रोमानियत को तोड़कर प्रेम को देखा गया है। वहीं भदेस का यह प्रयोग जीवन के यथार्थ से परिचित ही नहीं करवाता अपितु एक विवेकपूर्ण दृष्टि भी पाठक को देता है। इससे पहले जोशी जी ‘कुरु कुरु स्वाहा’ में भी भदेस से दो दो हाथ कर चुके थे। आखिर भूमंडलीकरण से ज्यादा अश्लील क्या होगा और क्या आश्चर्य कि आगे काशीनाथ सिंह को इसे समझने के लिए अपनी कृति ‘काशी का अस्सी’ में गालियों का सहारा लेना पड़ा।
एक कल्पना की जाए। ‘अगर’ की कल्पना…. अगर बात जम जाती। अगर डी.डी. और बेबी का विवाह हो जाता। अगर बेबी का परिवार डी.डी. को प्रारंभ में ही अपना लेता तो? तो कैसा होता यह प्रेम? अभी बीते दिनों नए जमाने की मुसीबतों और उलझनों की चर्चा करता एक उपन्यास आया है-‘ईंधन’। जी, यह भी अंतत: और मूलत: एक प्रेम कहानी है। भले ही भावुक पाठकों को यह ‘कसप’ जैसी प्रेम कहानी न लगे, पर प्रेम की परिणति ही इस उपन्यास में रोहित और स्निग्धा को विवाह तक ले आती है। विवाह के बाद ‘कहानी को करूण मोड़’ मिल जाता है। क्या फिर प्रेम, प्रेम नहीं रह जाता? अर्थात प्रेम विवाह से पहले ही संभव है?
शायद! शायद अपूर्णता में ही प्रेम बसा हो। दरअसल प्रेम की शास्त्रीय समझ हमारे यहाँ यही रही कि प्रेम कर्त्तव्य मार्ग में बाधा है। थोड़ा प्रगतिशील विचार जो मार्क्सवादी लेखन में मिल जाता है कि, प्रेम कर्त्तव्य मार्ग में बाधा तो नहीं बल्कि प्रेरणा है। अर्थात प्रेम का प्रेम होना पर्याप्त नहीं है वह माध्यम है। जब प्रेम लक्ष्य ही नहीं है तो फिर करुण मोड़ क्यों? ‘प्रेमा पुमर्थो महान’ का अर्थ है ‘प्रेम ही पुरुषार्थ है।’ ईंधन में रोहित और स्निग्धा के लिए भी लक्ष्य प्रेम नहीं है और इसीलिए प्रेम की तलाश ख़त्म नहीं होती।
कसप इस दृष्टि से प्रेम पर गंभीर विचार करता है। डी.डी. अपनी कुंठा में अमेरिका चला जाता है- ‘हिमालय उसके लिए अपनी आकांक्षा का आदर्श रहा है, रूपक बना है। निष्कलंक हिम और बिवाई पड़े नंगे पाँव ये दो स्थायी प्रतीक हैं, उसके मानस के काव्य के। स्वर्गारोहिणी उसके स्वप्नों की भाषा में सबसे अधिक व्यवहृत शब्द है।’ (पृ. 208) लेकिन यह उसकी कुंठा क्यों है इसे जानने के लिए तनाव के क्षणों में जाना होगा। अमेरिका जाने से पहले वह बेबी से कहता है -‘तू यह क्यों नहीं कहती साफ़ साफ़ कि हम शास्त्री लोग इतने चढ़े हुए हैं सदा के कि हमें एक गरीब लड़के का स्वाभिमानी होना पसंद नहीं? हम चाहते हैं कि वह हमारे साथ रहकर पढ़े, हमारी बच्ची को पढाये, बच्ची का और हमारा मन बहलाए, और, और हमारी जूठन खाये।’ (पृ.252) जबकि अल्हड़ और चंचल नायिका डी.डी. से कहीं ज्यादा मेच्योर दिखाई देती है, जब डी.डी. कहता है – ‘तू, तू अपने को मेरी जगह रखकर क्यों नहीं देखती?’ तो नायिका का प्रतिप्रश्न देखिये- ‘तेरी जगह मेरी जगह से अलग हो ही नहीं सकती। और जो होती ही हो तो तू अपने को मेरी जगह रखकर क्यों नहीं देखता?’ (पृ.255) आगे भी वह कहती है- ‘सवाल यही है कि वह उम्र (पागलपन की) कहाँ तक खींच ले जा सकते हैं लोग!’ (पृ.297) सवाल यही है कि प्रेम कहाँ तक ले जाया जा सकता है?’ प्रेम की परिणति विवाह में ही है? जहां तक उपन्यास की बात है यहाँ अपूर्णता के साथ ग्लैमर जुड़ा है, बकौल चचा ग़ालिब ‘होता तो क्या होता’ यह पाठक की समस्या है। जोशी जी का यह उपन्यास इसलिए भी सफल हो जाता है क्योंकि पाठक को होने या न होने का ढेर सारा सोचने की गुंजाइश है।
ईंधन में स्निग्धा विवाह के बहुत बाद अपने पति को छोड़ कर चली जाती है, यहाँ द्वंद्व तीन कोणों का है। स्निग्धा रोहित को छोड़कर तुषार के पास चली जाती है। रोहित इस स्थिति को समझ नहीं पाता, वह सोचता है-‘क्या यह संभव है कि वह हमेशा, हरदम, मन ही मन मेरी तुषार से तुलना करती रही हो, तुषार को हर मामले में मुझसे बेहतर पाती रही हो और फिर भी मुझे इसका अहसास तक न होने दिया हो?’ (पृ.,256 ईंधन) लेकिन स्निग्धा का तुषार के पास चले जाना या डी.डी. और बेबी का न मिल पाना क्या प्रेम का असफल हो जाना है? अब तक जो हुआ वह क्या था? प्रेम ही ना? और क्या यही पर्याप्त नहीं कि प्रेम तो हुआ। अगर डी.डी. बीच में मर जाता या रोहित का एक्सीडेंट हो जाता तब तुषार और स्निग्धा का मिलना हमें नहीं खलता!
क्या सच? दरअसल हम सुखान्त फिल्मे देखने के शौक़ीन हैं। हम विवाह को जीवन की पूर्णता से जोड़ते हैं और हमें किसी पुरुष या स्त्री का अकेले रहना ही आपतिजनक लगता है। इस लिहाज से कसप अपने समय से आगे की रचना है, जो किसी लिव इन रिलेशन क़ानून का इंतज़ार नहीं कर रही।
जिस प्रगति के आलीशान समय में हम रह रहे हैं, वहां यह आम बात है कि प्रेम करने वाले जोड़ो को जाति- पंचायतें मृत्यु दंड दे रही हैं। हमारा सपना अगर मानव समाज को सुन्दर और समानतापूर्ण बनाना है तो वहां प्रेम एक अनिवार्य शर्त है। प्रेम अर्थात खुलापन। प्रेम बंद समाज को तोड़ता है, इसिलए प्रेम का बड़ा मूल्य है। सोचिये मीरा ने क्या किया था? बंद समाज में प्रेम की ही तो कामना की थी और वह भी निराकार ईश्वर से? लेकिन खुलापन बंद समाजों को स्वीकार्य नहीं। कसप प्रेम की अनिवार्य शर्त की संभावना को खोजने का मुश्किल काम करता है।



