Home भारत कारगिल के 27 साल: युद्ध के मैदान से लेकर हथियारों तक कितना...

कारगिल के 27 साल: युद्ध के मैदान से लेकर हथियारों तक कितना बदला भारत?

कारगिल युद्ध के बाद युद्ध की प्रकृति में भी व्यापक बदलाव आया है। आधुनिक युद्धक्षेत्र में सैनिकों और हथियारों के साथ-साथ उन्नत तकनीक, सटीक मारक क्षमता, वास्तविक समय में निगरानी और तेजी से निर्णय लेने की क्षमता का महत्व बढ़ा है।

0
kargil vijay diwas, kargil vijay diwas 2026, indian army,
भारत भविष्य के युद्धक्षेत्रों की चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी सेनाओं को अत्याधुनिक तकनीक से लैस करने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है। फोटोः आईएएनएस (एआई मदद के साथ)

देश आज 27वां कारगिल विजय दिवस मना रहा है। यह दिन 1999 की उस ऐतिहासिक जीत की याद दिलाता है, जब भारतीय सैनिकों ने बर्फ से ढकी दुर्गम चोटियों और दुश्मन की भारी गोलाबारी के बीच अदम्य साहस और पराक्रम का परिचय देते हुए कारगिल की चोटियों पर फिर से तिरंगा फहराया था। लद्दाख की पहाड़ियों पर हर साल लहराता तिरंगा उन सैनिकों के बलिदान, वीरता और देश के प्रति उनके अटूट समर्पण की याद दिलाता है।

कारगिल युद्ध भारत की रक्षा यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। इस युद्ध ने खुफिया तंत्र, सीमा निगरानी और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल के साथ-साथ आधुनिक हथियारों और आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की जरूरत को भी सामने रखा। इसके बाद देश ने रक्षा क्षेत्र में कई बड़े सुधार किए। पिछले कुछ वर्षों में इन प्रयासों को और गति मिली है। आज भारत अपनी सैन्य क्षमता को आधुनिक बनाने के साथ-साथ घरेलू रक्षा उत्पादन और नई तकनीकों पर भी तेजी से काम कर रहा है।

कारगिल के बाद रक्षा प्रबंधन में बड़ा बदलाव

कारगिल युद्ध के बाद रक्षा क्षेत्र में उच्च स्तरीय प्रबंधन और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल को मजबूत करने की दिशा में कई कदम उठाए गए। इसी क्रम में सैन्य मामलों का विभाग (डीएमए) बनाया गया। इसका उद्देश्य थल सेना, नौसेना और वायु सेना के बीच संयुक्तता को बढ़ावा देना तथा रक्षा नीति, योजना, संसाधन प्रबंधन और प्रक्रियाओं में बेहतर समन्वय सुनिश्चित करना है।

इसी सुधार प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के पद का गठन भी रहा। सीडीएस सरकार के प्रमुख सैन्य सलाहकार के रूप में कार्य करते हैं और तीनों सेनाओं के बीच संयुक्तता, समन्वय तथा एकीकृत सैन्य योजना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जनरल बिपिन रावत वर्ष 2020 में देश के पहले सीडीएस बने थे। वर्तमान में यह जिम्मेदारी जनरल अनिल चौहान संभाल रहे हैं।

रक्षा क्षेत्र में निवेश बढ़ा, स्वदेशी उत्पादन को मिली रफ्तार

भारत ने रक्षा क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के साथ घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करने पर भी जोर दिया है। रक्षा विनिर्माण में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए ऑटोमैटिक रूट के तहत एफडीआई की सीमा बढ़ाकर 74 प्रतिशत की गई है। आधुनिक प्रौद्योगिकी से जुड़े मामलों में सरकारी रूट के जरिए 100 प्रतिशत तक एफडीआई की अनुमति है।

मार्च 2026 तक रक्षा क्षेत्र में 6,670.59 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त हुआ है। सरकार विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं के साथ सह-विकास और सह-उत्पादन को भी बढ़ावा दे रही है, ताकि देश में आधुनिक रक्षा विनिर्माण क्षमताओं का विस्तार किया जा सके।

भारत का रक्षा बजट 2013-14 के 2.53 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 7.85 लाख करोड़ रुपये हो गया है। इसी अवधि में पूंजीगत व्यय भी 2014-15 के 94,587.95 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 2.19 लाख करोड़ रुपये हो गया। इस बढ़े निवेश का इस्तेमाल आधुनिक सैन्य उपकरणों, रक्षा अवसंरचना और रणनीतिक क्षमताओं को मजबूत करने में किया जा रहा है।

रक्षा उत्पादन और निर्यात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी

भारत का रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह 2014-15 के 46,429 करोड़ रुपये की तुलना में लगभग चार गुना है। इसी तरह रक्षा निर्यात भी 2013-14 के 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये हो गया। भारतीय रक्षा उत्पाद अब 80 से अधिक देशों को निर्यात किए जा रहे हैं।

‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों ने रक्षा विनिर्माण में स्वदेशी क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया है। सरकार के अनुसार, अब देश की करीब 65 प्रतिशत रक्षा जरूरतें घरेलू उत्पादन से पूरी की जा रही हैं, जबकि पहले भारत की रक्षा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर था।

यह बदलाव केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है। युद्ध के समय हथियारों, गोला-बारूद, स्पेयर पार्ट्स और सैन्य प्रणालियों की लगातार आपूर्ति बनाए रखना भी रणनीतिक जरूरत होती है। ऐसे में घरेलू रक्षा उत्पादन क्षमता राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

कारगिल के बाद बदला युद्ध का स्वरूप

कारगिल युद्ध के बाद युद्ध की प्रकृति में भी व्यापक बदलाव आया है। आधुनिक युद्धक्षेत्र में सैनिकों और हथियारों के साथ-साथ उन्नत तकनीक, सटीक मारक क्षमता, वास्तविक समय में निगरानी और तेजी से निर्णय लेने की क्षमता का महत्व बढ़ा है।

भारत ने इसी जरूरत को देखते हुए तीनों सेनाओं में आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म और नई तकनीक को शामिल किया है। अर्जुन एमके-1ए मुख्य युद्धक टैंक, स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत, राफेल लड़ाकू विमान, अपाचे और चिनूक हेलीकॉप्टर, ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, ड्रोन आधारित युद्ध क्षमता, प्रोजेक्ट 17ए स्टील्थ फ्रिगेट और संधायक श्रेणी के सर्वेक्षण पोत इस बदलाव के उदाहरण हैं।

अर्जुन एमके-1ए को फरवरी 2021 में भारतीय सेना को सौंपा गया था। भारत के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत को 2 सितंबर 2022 को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। वहीं, ब्रह्मोस का पहला सफल प्रक्षेपण 2001 में हुआ था। इसकी सुपरसोनिक गति और सटीक मारक क्षमता इसे भारत की महत्वपूर्ण मिसाइल प्रणालियों में शामिल करती है।

युद्ध के पैटर्न में क्या कुछ बदलाव आया?

भारत की सैन्य तैयारी अब केवल पारंपरिक युद्ध तक सीमित नहीं है। अंतरिक्ष, ड्रोन, साइबर और नेटवर्क आधारित युद्ध जैसी क्षमताएं भी आधुनिक सैन्य रणनीति का हिस्सा बन रही हैं।

‘मिशन शक्ति’ के तहत 27 मार्च 2019 को भारत ने एंटी-सैटेलाइट (एएसएटी) मिसाइल का सफल परीक्षण किया। इसके साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया, जिनके पास उपग्रह-रोधी क्षमता है। इसके बाद 11 मार्च 2024 को ‘मिशन दिव्यास्त्र’ के तहत अग्नि-5 मिसाइल का पहला उड़ान परीक्षण किया गया, जिसमें एमआईआरवी तकनीक का प्रदर्शन किया गया। यह तकनीक एक ही मिसाइल से अलग-अलग लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता प्रदान करती है।

इसके अलावा, भारत लंबी दूरी की मिसाइल, हवाई रक्षा, हाइपरसोनिक तकनीक और सटीक मारक क्षमता विकसित करने पर भी काम कर रहा है। पिनाका की लंबी दूरी की निर्देशित प्रणाली, उन्नत वायु रक्षा तकनीक और स्क्रैमजेट आधारित प्रणोदन पर चल रहा अनुसंधान भविष्य की सैन्य जरूरतों के अनुरूप क्षमताएं विकसित करने की दिशा में उठाए गए कदम हैं।

भारत की सैन्य तैयारियां

भारत भविष्य के युद्धक्षेत्रों की चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी सेनाओं को अत्याधुनिक तकनीक से लैस करने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है। इसी कड़ी में डीआरडीओ की ओर से लंबी दूरी की वायु रक्षा, क्रूज मिसाइल, हवाई पूर्व चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली तथा हाइपरसोनिक तकनीक के क्षेत्र में लगातार परीक्षण और विकास कार्य किए जा रहे हैं।

स्वदेशी ‘नेत्र’ एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (एईडब्ल्यू एंड सी) प्रणाली जैसी क्षमताएं हवाई निगरानी और परिस्थितिजन्य जागरूकता को मजबूत करती हैं। वहीं, लंबी दूरी की मिसाइल और वायु रक्षा प्रणालियां भारत की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

1999 के कारगिल युद्ध ने जिन चुनौतियों और कमियों को सामने रखा था, उसके बाद भारत ने धीरे-धीरे अपनी रक्षा व्यवस्था में सुधार किए। आज देश जल, थल और नभ के साथ अंतरिक्ष और अन्य उभरते परिचालन क्षेत्रों में भी अपनी क्षमता बढ़ा रहा है।

दिल्ली मेट्रो की सेवाएं बहाल, सभी स्टेशनों के एंट्री-एग्जिट गेट खोले गए

–आईएएनएस इनपुट के साथ

author avatar
अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version