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महाराष्ट्र में अल्पसंख्यक दर्जा देने पर विवाद, अजित पवार की मौत के बाद 4 दिन में 75 संस्थानों को दी गई मंजूरी, सीएम फड़नवीस ने दिए जांच के आदेश

अल्पसंख्यक विकास विभाग ने पिछले 100 से अधिक दिनों तक एक भी संस्थान को अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र जारी नहीं किया था, उसने पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार की विमान दुर्घटना में मृत्यु (28 जनवरी) के कुछ घंटों बाद ले लेकर अगले दो दिनों और फिर 2 फरवरी तक 75 संस्थानों को यह दर्जा प्रदान कर दिया।

मुंबईः महाराष्ट्र में शिक्षण संस्थानों को अल्पसंख्यक दर्जा देने की प्रक्रिया को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दस्तावेजों के मुताबिक पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के पास रहे अल्पसंख्यक विकास विभाग द्वारा महज 4 दिनों के भीतर राज्य के 75 संस्थानों को अल्पसंख्यक दर्जा दे दिया गया।

हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा देखे गए आधिकारिक दस्तावेजों से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि जिस विभाग ने पिछले 100 से अधिक दिनों तक एक भी संस्थान को अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र जारी नहीं किया था, उसने पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार की विमान दुर्घटना में मृत्यु (28 जनवरी) के कुछ घंटों बाद ले लेकर अगले दो दिनों और फिर 2 फरवरी तक 75 संस्थानों को यह दर्जा प्रदान कर दिया। यह मामला इसलिए संदिग्ध माना जा रहा है क्योंकि अगस्त 2025 से लेकर 27 जनवरी 2026 तक अजित पवार के नेतृत्व वाले विभाग में इन मंजूरियों पर पूरी तरह रोक लगी हुई थी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि विभाग के अतिरिक्त सचिव मिलिंद शेनॉय, जिनके हस्ताक्षर इन प्रमाणपत्रों पर हैं, ने इस बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। दस्तावेज बताते हैं कि पहली मंजूरी 28 जनवरी को दोपहर 3:09 बजे दर्ज हुई, जबकि उस दिन राज्य शोक के कारण सरकारी कार्यालय आधिकारिक रूप से बंद थे। उसी दिन नौ संस्थानों को प्रमाणपत्र मिले, जबकि 29 और 30 जनवरी को बड़ी संख्या में मंजूरियां दी गईं। रविवार के अवकाश के बाद प्रक्रिया 2 फरवरी को फिर शुरू हुई और महज चार कार्यदिवसों में 75 संस्थानों को अल्पसंख्यक टैग दे दिया गया।

बता दें कि खुद अजित पवार ने 12 अक्टूबर 2025 को एक कड़ा निर्देश जारी कर इस प्रक्रिया को स्थगित कर दिया था। उन्हें यह अंदेशा था कि कई शैक्षणिक संस्थान ‘शिक्षा का अधिकार’ (आरटीई) कानून के तहत गरीब बच्चों को मिलने वाले 25% कोटे से बचने के लिए अल्पसंख्यक दर्जे का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट आदेश दिया था कि जब तक प्रबंधन की पृष्ठभूमि, योग्य शिक्षकों की उपलब्धता और बुनियादी ढांचे जैसे मानकों की गहन समीक्षा पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी भी नई फाइल को मंजूरी न दी जाए। इसी कड़ाई के कारण महीनों से कोई नया प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ था।

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, विवादित अवधि में मंजूरी पाने वालों में पोडार इंटरनेशनल स्कूल द्वारा संचालित 25 स्कूल शामिल हैं, जिन्हें 29 जनवरी को मंजूरी दी गई। इसके अलावा सेंट जेवियर्स संस्थान तथा स्वामी शांति प्रकाश और देवप्रकाश संस्थानों के स्कूल भी सूची में हैं।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने दिए जांच के आदेश

इसी बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने 75 स्कूलों को दिए गए अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान के दर्जे पर रोक लगा दी है। साथ ही इस मामले में उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं और मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल को जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है। उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने भी विभागीय समीक्षा बैठक में मामलों की गहन जांच के निर्देश दिए और कहा कि कामकाज अधिक जवाबदेह होना चाहिए तथा अल्पसंख्यक समुदाय के लिए आवंटित धन पारदर्शी ढंग से वितरित किया जाए।

राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष प्यारे खान ने इसे चौंकाने वाला बताते हुए सीआईडी जांच की मांग की और कहा कि 8,500 से अधिक अल्पसंख्यक स्कूलों की जांच की जाएगी। उन्होंने कहा कि शोक अवधि के दौरान अचानक बढ़ी मंजूरियों से यह सवाल उठता है कि क्या पहले लगाया गया रोक आदेश दरकिनार किया गया और इन मंजूरियों को किसने अधिकृत किया।

वहीं, पुणे यूथ कांग्रेस के महासचिव अक्षय जैन ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि 1,000 से अधिक प्रस्ताव लंबित होने के बावजूद केवल इन्हीं चुनिंदा प्रस्तावों को इतनी रहस्यमयी तेजी से क्यों निपटाया गया।

अल्पसंख्यक दर्जा किसे दिया जाता है, इसके क्या लाभ होते हैं?

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह दर्जा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत प्राप्त होता है, जो धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित और संचालित करने का अधिकार देता है। महाराष्ट्र में मान्यता प्राप्त धार्मिक अल्पसंख्यकों में मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन शामिल हैं, जबकि भाषाई अल्पसंख्यकों में गुजराती, हिंदी, उर्दू, कन्नड़, तमिल और तेलुगु मातृभाषा वाले समुदाय आते हैं।

दर्जा पाने के लिए संस्थान को साबित करना होता है कि उसके संस्थापक या न्यासी बहुसंख्यक रूप से संबंधित अल्पसंख्यक समुदाय से हैं, प्रबंधन और निर्णय लेने की शक्ति उसी समुदाय के पास है और संस्थान की स्थापना उसी समुदाय के हित के लिए की गई है। एक बार दर्जा मिलने के बाद संस्थानों को कई छूट मिलती हैं। जैसे आरटीई के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 25 प्रतिशत सीट आरक्षण लागू न करना, प्रवेश में अधिक स्वायत्तता, शिक्षक भर्ती नियमों में कुछ राहत और सरकारी अनुदानों की पात्रता।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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