बीते दौर की कई मशहूर फिल्में 4K रिस्टोरेशन के बाद दोबारा सिनेमाघरों में रिलीज हो रही हैं। ऐसी ही एक फिल्म इन दिनों खूब चर्चा में है। मलयालम सुपरस्टार मोहनलाल की 1989 में रिलीज हुई क्लासिक फिल्म ‘किरीडम’ (Kireedam)। 37 साल बाद एक बार फिर यह बड़े पर्दे पर लौट आई है। इस बार फिल्म को अत्याधुनिक 4K रिस्टोरेशन और डॉल्बी एटमॉस साउंड के साथ भारत समेत कई देशों में रिलीज किया गया है।
1989 में रिलीज हुई ‘किरीडम’ का मूल कैमरा नेगेटिव समय के साथ खराब हो चुका था। ऐसे में राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार (NFAI) में 30 से अधिक वर्षों तक सुरक्षित रखी गई 35 मिमी प्रिंट के आधार पर फिल्म को 4K में नया रूप दिया गया। इसके लिए हाई-रिजॉल्यूशन स्कैनिंग की गई, फिल्म के खराब हो चुके फ्रेम ठीक किए गए, रंगों को बेहतर बनाया गया और आवाज को डॉल्बी एटमॉस तकनीक के मुताबिक अपग्रेड किया गया।
सिबी मलयिल के निर्देशन और दिवंगत लेखक एके लोहितदास की कहानी पर बनी ‘किरीडम’ में मोहनलाल ने सेतुमाधवन और दिवंगत अभिनेता थिलकन ने हेड कांस्टेबल अच्युतन नायर की भूमिका निभाई थी। यह फिल्म मलयालम सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिनी जाती है और मोहनलाल के करियर की सबसे क्लासिक फिल्मों में शामिल है।
केरल में आयोजित एक विशेष स्क्रीनिंग के दौरान फिल्म को आधुनिक 4K स्क्रीन और बेजोड़ साउंड के साथ देखकर मोहनलाल रो पड़े थे। उन्होंने मीडिया से कहा कि, “यह मेरे 48 साल के अभिनय करियर का एक दुर्लभ क्षण है। ‘किरीडम’ मेरे जीवन का सबसे बड़ा मील का पत्थर है, जिसने मुझे मेरा पहला राष्ट्रीय पुरस्कार (स्पेशल मेंशन) दिलाया था। इसे आज की भव्य तकनीक के साथ देखना अद्भुत है, लेकिन पर्दे पर उन महान कलाकारों (थिलकन, कोच्चिन हनीफा आदि) को देखना दिल को भारी कर देता है जो आज हमारे बीच नहीं हैं।”
मोहनलाल ने कहा कि सीमित तकनीकी संसाधनों के बावजूद 37 साल पहले इतनी बड़ी और भावनात्मक फिल्म बनाना अपने आप में असाधारण उपलब्धि थी। ‘किरीडम’ उन चुनिंदा फिल्मों में है, जिन्हें हर बार देखने पर वही भावनात्मक असर महसूस होता है।
मूक युग की लगभग 90% फिल्में हमेशा के लिए लुप्त
फिल्म संरक्षण संस्था फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन के अनुसार भारत में बनी लगभग 1,330 मूक फिल्मों में से केवल 29 फिल्में ही आज सुरक्षित हैं। यानी मूक युग की लगभग 90 प्रतिशत फिल्में हमेशा के लिए लुप्त हो चुकी हैं। फिल्म आर्काइविस्ट शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर के अनुसार 1931 से 1950 के बीच बॉम्बे में बनी 2000 फिल्मों का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा अब देखने के लिए उपलब्ध नहीं है। भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ भी आज केवल तस्वीरों और दस्तावेजों में ही मौजूद है। इस ऐतिहासिक फिल्म की एक भी प्रिंट दुनिया में मौजूद नहीं है। इंटरनेट पर इसकी खोज करने पर केवल एक पुरानी तस्वीर मिलती है, जिसमें जुबैदा मास्टर विठ्ठल की बाहों में दिखाई देती हैं। इसके अलावा पूरी फिल्म समय के साथ हमेशा के लिए खो चुकी है।
‘आलम आरा’ अकेली ऐसी फिल्म नहीं है, जो इतिहास बनकर रह गई। भारत की पहली रंगीन फिल्म ‘किसान कन्या’ (1937), ‘भक्त विदुर’ (1921), ‘बलिदान’ (1927), ‘सीता’ (1934) और ‘जिंदगी’ (1940) जैसी कई महत्वपूर्ण फिल्मों की भी आज कोई प्रिंट उपलब्ध नहीं है। इसके पीछे कई कारण रहे। शुरुआती दौर में फिल्मों को सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि व्यावसायिक उत्पाद माना जाता था। नाइट्रेट फिल्म रीलें आग पकड़ लेती थीं, गर्मी और नमी से खराब हो जाती थीं और पुराने प्रिंटों को सुरक्षित रखने की कोई व्यवस्थित व्यवस्था भी नहीं थी।
4K रिस्टोरेशन से नई जिंदगी पा रही हैं भारतीय क्लासिक फिल्में
फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन ने मशहूर हॉलीवुड निर्देशक मार्टिन स्कॉर्सेसी की फिल्म फाउंडेशन के साथ मिलकर 2012 में उदय शंकर की फिल्म ‘कल्पना’ (1948) का 4K रिस्टोरेशन किया था। यह 4K में बहाल होने वाली पहली भारतीय फिल्म मानी जाती है। साल 2015 में केंद्र सरकार ने इसको लेकर नेशनल फिल्म हेरिटेज मिशन शुरू किया। जिसके तहत पुरानी फिल्मों के संरक्षण, डिजिटाइजेशन और रेस्टोरेशन का काम तेजी से किया जा रहा है। सरकारी संस्था NFDC-NFAI और फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन जैसी गैर-लाभकारी संस्था के साथ-साथ प्रसाद कॉरपोरेशन, अल्ट्रा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट, एनएच स्टूडियोज और शेमारू एंटरटेनमेंट जैसी निजी कंपनियां मिलकर कर रही हैं।
हाल के वर्षों में ‘आवारा’, ‘प्यासा’, ‘सिलसिला’, ‘उमराव जान’, ‘चांदनी’, ‘सम्राज्यम’, ‘रावणप्रभु’, ‘वर्षम’, ‘किरीडम’, ‘पाकीजा’, ‘द गॉडफादर पार्ट-2’ और ‘शिवा’ जैसी कई क्लासिक फिल्मों को 4K में नया रूप दिया गया है। इनमें से कई फिल्में दोबारा सिनेमाघरों में भी रिलीज हो चुकी हैं। वहीं प्रसाद कॉरपोरेशन ने एनएफडीसी और नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया के साथ मिलकर ऋत्विक घटक की 16 फिल्मों को 4K में बहाल किया है।
एनएच स्टूडियोज पुरानी फिल्मों का डिजिटाइजेशन, रीमास्टरिंग और तकनीकी रूप से संभव होने पर उनका रिस्टोरेशन करता है। इसके बाद इन फिल्मों को सिनेमाघरों, टीवी, ओटीटी प्लेटफॉर्म, FAST चैनलों और यूट्यूब के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है।
फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन के संस्थापक और निदेशक शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर के अनुसार फिल्म रिस्टोरेशन के दो प्रमुख उद्देश्य हैं। पहला, उन दुर्लभ और ऐतिहासिक फिल्मों को संरक्षित करना, जिनका व्यावसायिक महत्व कम हो सकता है। दूसरा, शोले जैसी लोकप्रिय फिल्मों को तकनीकी रूप से बेहतर बनाकर दोबारा प्रदर्शित करना, जिससे सांस्कृतिक संरक्षण के साथ व्यावसायिक लाभ भी मिल सके।
4K रेस्टोरेशन कैसे होता है?
विशेषज्ञों के मुताबिक किसी फिल्म को बहाल करने की प्रक्रिया केवल तकनीक तक सीमित नहीं होती। सबसे पहले उपलब्ध नेगेटिव या प्रिंट की पहचान की जाती है। फिर उसकी हाई-रिजॉल्यूशन स्कैनिंग, रंगों की मरम्मत, खरोंच हटाना, साउंड बहाल करना, सबटाइटल तैयार करना और आधुनिक प्लेटफॉर्म के अनुरूप नए मास्टर तैयार किए जाते हैं।
अगर मूल फिल्म सामग्री खराब हो चुकी हो या उसका कुछ हिस्सा गायब हो, तो काम और कठिन हो जाता है। कई मामलों में पूरी फिल्म को फ्रेम-दर-फ्रेम ठीक करना पड़ता है। रिस्टोरेशन पर आम तौर पर 40 लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये तक का खर्च आता है। यदि फिल्म को दोबारा सिनेमाघरों में रिलीज करना हो, तो प्रचार-प्रसार का खर्च अलग से जुड़ जाता है
उद्योग से जुड़े जानकारों का मानना है कि अगर लोकप्रिय क्लासिक फिल्मों का एक मजबूत पोर्टफोलियो तैयार किया जाए, तो अगले तीन से पांच वर्षों में उस पर लगभग 20 प्रतिशत सालाना रिटर्न हासिल किया जा सकता है। यही वजह है कि फिल्म संरक्षण अब केवल सांस्कृतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक टिकाऊ बिजनेस मॉडल के रूप में भी उभर रहा है।
फिल्म व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश क्लासिक फिल्मों की दोबारा रिलीज से बॉक्स ऑफिस पर बहुत बड़ी कमाई नहीं होती। ‘प्यासा’, ‘आर-पार’, ‘चौदहवीं का चांद’, ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’, ‘बाज’, ‘आराधना’ और सत्यजीत रे की ‘नायक’ जैसी फिल्मों की विशेष स्क्रीनिंग से आम तौर पर केवल 4 से 5 लाख रुपये तक का कारोबार हुआ था। हालांकि फिल्म संरक्षण से जुड़े लोग मानते हैं कि यह केवल आर्थिक निवेश नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को बचाने का प्रयास है।
पुरानी भारतीय क्लासिक फिल्मों का 4K रिस्टोरेशन सिर्फ उनकी विरासत को सुरक्षित रखने का माध्यम नहीं है, बल्कि इससे दोबारा रिलीज और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए कमाई के नए अवसर भी पैदा होते हैं। अल्ट्रा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट ग्रुप के सीईओ सुशील कुमार अग्रवाल के मुताबिक, जिन फिल्मों के अधिकार धारकों के पास 4K संस्करण उपलब्ध हैं, उनके लिए कमाई की संभावनाएं कहीं अधिक होती हैं। इसके विपरीत, जिन फिल्मों का 4K संस्करण नहीं है, उनके लिए ओटीटी और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अवसर लगातार सीमित होते जा रहे हैं।



