नई दिल्ली: स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में ईरान और अमेरिका के बीच हुई पहली उच्चस्तरीय वार्ता को लेकर ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा कि दोनों देशों के बीच हुई बातचीत में ‘बड़ी प्रगति’ हुई है। साथ ही अब तकनीकी स्तर की वार्ताएं पूरे सप्ताह जारी रहेंगी। यह बातचीत इसी महीने 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हुए हस्ताक्षर के तहत हुई, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच शत्रुता समाप्त करना और व्यापक राजनीतिक समाधान का रास्ता तैयार करना था।
बातचीत की शुरुआत से पहले हालांकि तनाव नजर आया जब ईरानी दल बाहर चला गया। इसके पीछे की वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से बातचीत से कुछ घंटे पहले दी गई धमकियां बताई गई। हालांकि, मामला जल्द ही सुलझता नजर आया और ईरानी पक्ष बातचीत की टेबल पर लौटा और देर रात तक वार्ता हुई। बहरहाल, अमेरिका की ओर से अब तक इस वार्ता के नतीजों को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन वार्ताकारों ने तनाव दोबारा न बढ़े, इसके लिए कोई तरीका विकसित करने और लंबित मुद्दों पर आगे चर्चा जारी रखने पर सहमति जताई है।
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि मध्यस्थता के जरिए लेबनान युद्ध को समाप्त करने की दिशा में बड़ी प्रगति हुई है। उन्होंने लिखा, ‘मध्यस्थता के जरिए लेबनान युद्ध को खत्म करने की दिशा में बड़ी प्रगति हुई है। तेल और पेट्रोकेमिकल निर्यात पर लगी रोक हटाई गई है, नाकेबंदी समाप्त की गई है, कुछ जमे हुए विदेशी फंड जारी किए गए हैं और ईरान के लिए बड़े पुनर्निर्माण एवं विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गई है।’
अराघची ने यह भी कहा कि अब सबसे बड़ी चुनौती लेबनान में नए निगरानी तंत्र को लागू करना होगा। उनके मुताबिक, स्विट्जरलैंड में बनी सहमतियों की ‘पहली असल परीक्षाट अमेरिका, ईरान और लेबनान के बीच बनने वाले ‘डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल’ की स्थापना होगी।
ईरान-अमेरिका में पहले राउंड की बातचीत से क्या निकला?
60 दिन में अंतिम समझौते का रोडमैप: बातचीत को लेकर सबसे महत्वपूर्ण नतीजा 60 दिनों के भीतर व्यापक समझौते तक पहुंचने का रोडमैप तैयार करना रहा। संयुक्त बयान के अनुसार एक हाई लेवल कमिटी का गठन किया जाएगा, जो पूरी वार्ता प्रक्रिया की राजनीतिक निगरानी करेगी और तकनीकी कार्य समूहों को दिशा देगी। संयुक्त बयान में कहा गया, ‘हाई लेवल कमिटी ने 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते तक पहुंचने के रोडमैप पर सहमति जताई है, जिससे आगे की तकनीकी वार्ताओं की तत्काल शुरुआत का आधार तैयार हुआ है।’
लेबनान के लिए डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल: वार्ता के दौरान सबसे अहम फैसलों में से एक लेबनान को लेकर लिया गया। दोनों पक्षों ने अमेरिका, ईरान और लेबनान की भागीदारी वाला एक डी-कॉन्फ्लिक्शन सेल बनाने पर सहमति जताई। इसे मध्यस्थ देशों की मदद से संचालित किया जाएगा और इसका उद्देश्य लेबनान में सैन्य गतिविधियों की समाप्ति से जुड़े समझौतों का पालन सुनिश्चित करना होगा। संयुक्त बयान में कहा गया कि यह व्यवस्था लेबनान में सैन्य अभियानों की समाप्ति के पालन को सुनिश्चित करने के लिए बनाई जा रही है। चूकी हाल के दिनों में हुई लेबनान पर इजराइली हमलों के कारण युद्धविराम व्यवस्था कमजोर पड़ने की आशंका जताई जा रही थी। ऐसे में इस कदम को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्जुज पर क्या: ईरान और अमेरिका ने होर्मुज में किसी भी तरह की गलतफहमी और टकराव को रोकने के लिए एक सीधी संचार व्यवस्था स्थापित करने पर भी सहमति जताई है। संयुक्त बयान के मुताबिक, ‘कमर्शियल जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने और किसी भी घटना या गलतफहमी से बचने के उद्देश्य से दोनों पक्षों के बीच एक संचार लाइन बनाई गई है।’ यह व्यवस्था 60 दिन की वार्ता अवधि के दौरान प्रभावी रहेगी।
प्रतिबंधों में राहत और जब्त किए फंड का मुद्दा: अराघची ने दावा किया कि वार्ता से ईरान को आर्थिक स्तर पर भी राहत मिली है। उनके अनुसार, ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल निर्यात पर लगी रोक हटाने, नाकेबंदी समाप्त करने और कुछ जब्त हुए विदेशी फंड जारी करने पर सहमति बनी है। साथ ही, ईरान के पुनर्निर्माण और विकास के लिए बड़े कार्यक्रम की शुरुआत की गई है। हालांकि, वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में जब्त फंड जारी किए जाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। वैसे, इससे पहले हुए MoU में अमेरिका ने प्रतिबंधों में राहत देने और प्रतिबंधित ईरानी फंड तक पहुंच बहाल करने की प्रतिबद्धता जताई थी।
तकनीकी स्तर की बातचीत जारी रहेंगी: अहम ये भी है कि दोनों देशों ने लंबित सभी मुद्दों पर तकनीकी स्तर की बातचीत जारी रखने का फैसला किया है। संयुक्त बयान में कहा गया, ‘तकनीकी वार्ताएं सप्ताह के बाकी दिनों में बर्गेनस्टॉक में जारी रहेंगी।’ इस बातचीत में परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों से जुड़े मसले, समझौते को लागू करने की प्रक्रिया आदि पर चर्चा होगी।
बातचीत से पहले तनाव! ईरानी प्रतिनिधिमंडल का वॉकआउट
इससे पहले बातचीत की शुरुआत काफी तनावपूर्ण माहौल में हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर दी गई धमकियों के विरोध में ईरानी प्रतिनिधिमंडल आमने-सामने की बातचीत छोड़कर बाहर चला गया।
ट्रंप ने ईरान पर बमबारी करने की चेतावनी दी थी और कहा था कि यदि होर्मुज को नहीं खोला गया तो ईरानी वार्ताकारों का अपहरण तक किया जा सकता है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा था, ‘ईरान को तुरंत लेबनान में अपने प्रॉक्सी समूहों को परेशानी पैदा करने से रोकना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम ईरान पर फिर बहुत कड़ा प्रहार करेंगे, पिछले सप्ताह से भी ज्यादा ताकत के साथ।’
वहीं, फॉक्स न्यूज से करीब 20 मिनट की बातचीत में ट्रंप ने कहा, ‘जरूरत पड़ी तो हम होर्मुज पर नियंत्रण कर लेंगे। अगर वे समझौता नहीं करते हैं, तो हम वहां से गुजरने वालों से शुल्क वसूलेंगे।’
होर्मुज का जिक्र करते हुए उन्होंने कथित तौर पर ईरान वर्ताकारों के अपहरण तक की धमकी दी थी। ट्रंप ने कहा, ‘तुम इसे बंद करोगे तो तुम्हारे पास देश नहीं बचेगा। तुम अपने देश तक वापस भी नहीं पहुंच पाओगे।’
इसके बाद ईरानी सरकारी मीडिया ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति के ‘अपमानजनक संदेश’ के बाद वार्ता एक कठिन चरण में पहुंच गई थी और उसे कुछ समय के लिए इसे रोक दिया गया था। इसके बाद ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने वार्ता स्थल छोड़ने से पहले कतर के मध्यस्थों से मुलाकात की।
तनाव के बाद पटरी पर लौटी बातचीत
बाद में उच्चस्तरीय बातचीत फिर शुरू हुई और सोमवार तड़के (भारतीय समय के अनुसार) तक चली। कतर और पाकिस्तान ने कहा कि तकनीकी स्तर की वार्ताएं सप्ताह भर जारी रहेंगी।
कतर और पाकिस्तान की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि लेक लुसर्न समिट के तहत आयोजित यह बैठक ‘सकारात्मक और रचनात्मक माहौल’ में संपन्न हुई और कई अहम मुद्दों पर उत्साहजनक प्रगति दर्ज की गई।
अब दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या ईरान और अमेरिका अगले 60 दिनों के भीतर इन शुरुआती सहमतियों को अंतिम और व्यापक समझौते में बदल पाते हैं या नहीं। यदि ऐसा होता है तो यह न केवल दोनों देशों के रिश्तों में बड़ा बदलाव होगा, बल्कि लेबनान और होर्मुज जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।



