Home कला-संस्कृति पुस्तक समीक्षाः भारतीय भूतों का सामाजिक भूगोल

पुस्तक समीक्षाः भारतीय भूतों का सामाजिक भूगोल

भूत आखिर किसके होते हैं? कब्रों और खंडहरों के, या मनुष्यों के भय, स्मृतियों और इच्छाओं के? ऋकसुन्दर बनर्जी की पुस्तक ‘भारतीय भूतों की अजीब दास्ताँ ‘ इस प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं देती, लेकिन भारतीय लोकविश्वासों में बसे असंख्य भूतों के जरिए समाज के अनेक चेहरे हमारे सामने खोलती है। सविता पाठक की यह समीक्षा, इस पुस्तक के रोमांचक संसार में प्रवेश करते हुए उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय अर्थों को समझने की एक दिलचस्प कोशिश है।

0
Red Hindi book cover with tree-root illustration sits beside a smiling man; yellow circular badge reads पुस्तक समीक्षा.
पुस्तक समीक्षा।

सिक्योरिटी इज मोर्टलस् चीफेस्ट एनमी– हैकैट(एक्ट-3, सीन.5) मैकबेथ, विलियम शेक्सपीयर

भूत-प्रेत चुड़ौलों की देवी हैकेट, सोलहवीं सदी के अंग्रेजी नाटक मैकबेथ में यह ब्रह्मवाक्य कहती है। मैकबेथ की चुड़ैले जो किसी भी प्रेतआत्मा की तरह सुनसान जगहों और कड़कती बिजली और तुफानी हवा में अवतरित होती हैं, उस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। ये तीन चुड़ैल बहनें औरतों जैसी दिखती हैं, लेकिन औरते नहीं है। औरत होना यानी स्त्रियोचित गुणों से सम्पन्न होना होता है।

जीवित दुनिया के लोगों को, उनके तौर तरीकों को चुनौती देने वाले भूत-प्रेतों चुड़ैलों या आत्माओं की दुनिया पर अनगिनत बातें होती रहती हैं। अदृश्य का भय दृश्य के भय से निपटने में मदद करता है। यह चुना हुआ डर, मनोरंजन और रोमांच से भरपूर होता है; उसमें जितना मिर्च मसाला डालो उसका स्वाद उतना ही चटख बन जाता है। साहित्य और फिल्म संसार मे जितना ईश्वर और प्रेम को विषय बनाया गया, तकरीबन उतना ही भूतों की दुनिया पर लिखा गया है। अंग्रेजी साहित्य में तो साहित्य की गाथिक परम्परा ही स्थापित हो गयी। हिन्दुस्तानी साहित्य के लोकसंसार, खासतौर पर किस्सागोई के जगत में भूतों और साँपों के बिना कहानियां पूरी  हो ही नहीं सकती।

जीवित लोगों की तुलना में मृतकों की संख्या हमेशा ज्यादा रही है। कई बार कुछ मौतें  एक रिक्त स्थान छोड़ जाती है, उन लोगों को कहानियों में लौटाकर लाया जाता है। कोई न्याय पाने के लिए लौटता है, तो कोई प्रतिशोध के लिए, तो कोई स्त्री प्रसव में मरने के चलते नवजात शिशुओं में अपना मातृत्व देख रही है। वर्गीय समाज का सीधा-खाका बहुत बाद में स्पष्ट हुआ है, लेकिन समाज में विभिन्न पदानुक्रम पहले से उपस्थित रहा है। भूत-प्रेतों की दुनिया में भी यह सोपान है।

भूतों के बारे में कहा जाता है कि वे किसी सीमा में नहीं बंधे होते हैं। शहर, गाँव, दीवार लांघकर वे कहीं-का-कहीं पहुँच जाते हैं। लेकिन भारतीय भूत- भारतीय मनुष्यों की तरह कुछ एक सीमाओं में बंधे होते हैं। उनका व्यवहार, डराने का तरीका, सबकुछ अलग अलग होता है। कोई किस तरह का भूत होगा वह उसकी जाति, लिंग, उम्र और इलाके पर निर्भर करता है। वह मानवीय और अमानवीय भी हो सकता है।

पुस्तक के लेखक ऋकसुन्दर बनर्जी का शोध प्रबन्ध भूत-प्रेतों के संक्रमण पर केन्द्रित रहा है। पूरे भारतीय समाज में जितनी तरह के भूत हैं उनका कोई न कोई प्रतिनिधि किताब में उपस्थित है।

सामाजिक ताने बाने की जगहों में जो लोग फिट नहीं हो पाये- वे भूत बन गये। इन भूतों का अपना अतीत है। कोई गर्भ में पूरा नहीं बना तो कोई पूरा बनकर अधूरा रह गया। कोई भूत बायंगी है, जिसे मालिक नारियल के खोल में कैद रखता है: वह मालिक को धनसम्पदा लाकर देता है लेकिन अपने आजाद होने की लड़ाई भी लड़ता रहता है और सात साल बाद वो सबकुछ तहस नहस कर देता है। ये भूत कोई श्रमशील आत्मा है, जिसको मरने के बाद भी लोग गुलाम बनाने से नहीं छोड़ते हैं। वैसे यह भूत भी अपनी लड़ाई लड़ता रहता है और सात साल के अथक श्रम के बाद अगर आजादी नहीं मिली तो मालिक को छोड़ता नहीं है। इसी तरह एक खास तरह के भूत सैनिक भी होते हैं। डंड नाम के ये प्रेत घोड़े पर सवार रहते हैं , हाथ में तलवार लिए मध्यरात्रि में पहरा देते हैं। सुनसान सड़क पर ये डंड किसी की मदद करते हैं बशर्ते  उनको कोई मुँह उठाकर न देखे। डंड अपना सिर अपने हाथ में लेकर घूमते हैं। वैसे भी जब बात तलवार से बनने वाली हो तो सिर को हाथ में लेकर घूमना चाहिए।

अगर लम्बें भूत हैं, तो गोटिया देव बौना भूत है। कुछ भूतों को मल से विशेष मोह है। पूर्वी उत्तर-प्रदेश में भी गर्मी के दिनों में अमराई में सोने वाले रखवालों को मल की मालिश करने वाली चुड़ैलें है तो बंगाल में पेड़ पर बैठ कर लोगों पर टट्टी करने वाला झापरी है। ये लोग बहुत डराते नहीं है लेकिन थोड़ा बहुत डरा कर घिन पैदा करते हैं। लेकिन मामदो और मरीद बहुत घातक हैं। ये अपनी कब्र खुद से खोदकर बाहर निकलने की कोशिश करते हैं। इनसे मुलाकात पूरी तो नहीं हो पाती क्यों ज्यादातर के पूरे अंग बचे नहीं रहते हैं।

जब बीमारियों और तकलीफों का असली निदान न करना हो भूतों और चुड़ैलों को जिम्मेदार बनाना सबसे आसान है। इसी तरह एक भूत मसाण है। ज्यादातर मसाण खुद ही किसी दमित जाति के होते हैं जिनका ठीक से दाह-संस्कार नहीं हुआ। लेकिन उनके बारे में मानते हैं कि वो बच्चों को चिपकते हैं। इसी तरह रीछ को भी भूत माना जाता है। कई आदिवासी  इलाकों में मानते हैं कि रीछ औरतों को जंगलों में उठा ले जाते हैं। उनका उद्देश्य अपनी संतान पैदा करना है। इन दुष्टात्माओं को शांत करने के लिए कई बार लड़कियों की भेंट दी जाती थी। लेकिन कहते हैं कि एक औरत ने उसकी आँख में लोहे का रॉड घुसा दिया तब से रीछ उसके गाँव नहीं आता है। वैसे भूतों प्रेतों की श्रृखंला में कई ऐसे हैं जो यौन-कुंठित है। उनका काम तुरंत विवाहित स्त्रियों को पकड़ना है। वैसे समाज में अगर यौन कुंठा है और उसके साथ मर्दवादी हिंसा है तो भूतों में कैसे नहीं होगी। आखिर भूत बनने से कुछ भी गायब तो नहीं हो जाता।

कोई किशोर ब्राह्मण का भूत जिसका जनेऊ संस्कार हो चुका है- वह युवा लड़कियों की तलाश में रहता है तो कोई भूत किशोरियों का रक्षक है।

इसी तरह एक भूत कटाई के बाद फसल के हिस्से में माँग करता है। दाग नाम के इस भूत को हिस्सा न देकर मार डाला गया  था, लेकिन मार कहाँ पाये। वह आज भी उत्तरप्रदेश के कुछ इलाकों में रहता है अगर गरीब लोगों को हिस्सा नहीं मिलता तो वह खेतों मे आग लगा देता है।

जो समाज जितना जटिल है उसके भूत भी उतने ही जटिल है। चमकती कड़कती बिजली और बारिश में आने वाले इन भूतों को चेहरा देख पाने की हिम्मत जुटाना आसान काम नहीं है। लेकिन इस काम को अपने शोध का हिस्सा बनाकर ऋकसुन्दर बनर्जी ने बहुत रोचक काम किया है। यह किताब डराने के उददेश्य से नहीं लिखी गयी है और न ही इसका उद्देश्य किसी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना है। ये एक तरह से भूतों का वर्गीकरण और उनका सामाजिक अध्ययन है। दो भागों में बँटी यह किताब भूतों का सिलसिलेवार ब्यौरा एक डिक्शनरी की तरह देती है लेकिन यहीं उसकी सीमा भी है। यहां अलग अलग भौगोलिक परिवेश के भूत-प्रेत तो हैं लेकिन उनका सामाजिक-आर्थिक अध्ययन नहीं है।न ही यह उस अंचल की समस्या पर बात करती है, जहाँ पर इस तरह के भूत पाये जाते हैं। हर पुस्तक की कुछ सीमा होती है जो किसी अगली पुस्तक का खाका बनाती है। शोषित-उत्पीड़ित भूत-प्रेतों के भूगोल और शोषण करने वाले भूतों के आधार को अगर लिखा जाता तो किताब और बेहतर बन सकती थी।  

फिलहाल गर्मियों की दोपहर में यह विषय असली भूतों से निपटने में काम आ सकता है। यहां जिन्न, रूही, मुन्ज्या, तोला, वेताल, डाकिनी, परी से लेकर तमाम ऐसे भूत हैं जिनके बारे में जानना रोचक है। सिक्किम से लेकर दक्षिण भारत को एक करने वाले इन भूतों की कथा अनबाउन्ड स्क्रिप्ट से आयी है। बांग्ला भाषा के लेखक ऋकसुन्दर बनर्जी ने यह किताब मूलत अंग्रेजी में लिखी थी। किताब का हिन्दी अनुवाद शायक आलोक ने बेहद सहजता से किया है।

पुस्तक: भारतीय भूतों की अजीब दास्ताँ (दो भागों में प्रकाशित)
विधा: कथेतर
लेखक: ऋकसुन्दर बनर्जी
अनुवाद: शायक आलोक
प्रकाशक: अनबाउन्ड स्क्रिप्ट,दिल्ली
मूल्य: 199

पुस्तक समीक्षाः लालटेन बाज़ार से अमेरिका तक- तस्करी, त्रासदी और परिवर्तन की कहानी

author avatar
सविता पाठक
परिचय- सविता पाठक का जन्म जौनपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ है। शिक्षा विभिन्न शहरों से हुई है। हिन्दी की कई प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में लेख और कहानियाँ प्रकाशित। इसके अलावा सविता अनुवाद करती है। डा आंबेडकर की आत्मकथा वेटिंग फार वीजा का अनुवाद। क्रिस्टीना रोसोटी की कविताओं के अलावा कई लातीन अमरीकी कविताओं का अंग्रेजी से अनुवाद। पाखी के सलाना अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित। वीएस नायपाल के साहित्य पर शोध। हाल में ही इनका उपन्यास ‘कौन से देस उतरने का’ लोकभारती प्रकाशन से आया है जिसकी काफी चर्चा हुई। हिस्टीरिया और अन्य कहानियाँ नाम से कहानी संग्रह। फिलहाल सविता पाठक दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध एक कालेज में अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन करती हैं।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version