सांवला रंग, राजस्थान के रेगिस्तान की सूखी रेत जैसी झुर्रियों वाला, लेकिन पसीने की चिपचिपाहट से भरा चेहरा; अंदर धंसी हुई शुष्क आँखें, गालों में गड्ढे और थकान से पस्त पचपन साल की दुबली-पतली काया! उसका नाम “पार्वती” था! और वह अपने नाम को हर रोज़ चरितार्थ भी करती थी। राजस्थान के कोटा शहर की एक बॉयज हॉस्टल की हाई-राइज बिल्डिंग की दसवीं मंजिल से शुरू करके हर मंजिल की लॉबी और एक-एक छात्र के कमरे-बाथरूम और सीढ़ियां बुहारते-बुहारते जब वह ग्राउंड फ्लोर पर आती, तो उसे ऐसी थकान लगती मानो उसने हिमालय की परिक्रमा पूरी कर ली हो! हर मंजिल पर पंद्रह-पंद्रह कमरे और बाथरूम, और महादेव के गले में लिपटे सांप की तरह लंबी-लौड़ी दस लॉबियां! यह ‘हिमालय’ उसे हेमंत और शिशिर (सर्दियों) की ऋतुओं में नहीं थकाता था। सारा दिन झाड़ू-पोछा करने जैसा थका देने वाला कठिन काम हिमालय जैसी अडिगता से करने वाली वही पार्वती, राजस्थान के पत्थरों से भरे अत्यधिक गर्म प्रदेश कोटा की गर्मियों में हिमालय की बर्फ की तरह पिघलने लगती थी!
वह मुझे कभी बिल्डिंग की लॉबी में कचरा बुहारते मिल जाती, तो कभी सीढ़ियों पर बैठी काले, कत्थई या नीले रंग की फीकी पड़ चुकी जर्जर ओढ़नी से खुद को हवा डालती या पसीना पोंछते हुए विश्राम करती दिख जाती! वह राजस्थानी घाघरा और चोली पहनती और सिर पर ओढ़नी रखती। चोली में उसकी लालिमा लिए हुए काली, घमौरियों वाली पीठ दिखती जिसे खुजला-खुजलाकर उसने लाल कर दिया होता! कभी खून की लकीरें उभर आतीं तो कभी काले दाग उसके खुजलाने की गवाही देते। वह हर लॉबी में रखे वाटर कूलर से ठंडा-ठंडा पानी लेकर गटक-गटक पीती जाती और यह खास ध्यान रखती कि पानी उसकी छाती पर लुढककर जा गिरे, इसलिए वह ऊपर से मुंह में धार बनाकर पानी पीती। पानी उसके गले के अंदर और बाहर दोनों और गिरता हुआ सा उसे थोड़ी देर के दिए ही सही पर बड़ी राहत पहुंचाता। फिर, ठंडा पानी पीठ पर छिड़क छिड़क कर पार्वती खुद को भिगो लेती! मेरी तरफ थकी हुई मुस्कान के साथ हाड़ौती बोली में कहती- ‘गजब की ताप पड़ र्यो है बहनजी! छोरा-छोरी पढ़ाई में जी कस्यां लगावता होंगा?”
मैं उसकी तरफ देखती,मुस्कुराती और कहती- ‘क्या कर सकते हैं? पढ़ना तो पड़ता ही है।’
तब वह कहती, “हां वा तो है ई!”
कोटा की गर्मी यानी न दिन में शांति न रात में चैन! कोटा के पत्थरों को जब सूर्य देवता भीषण ताप से नहलाते, तो एक-एक पत्थर आग उगलने लगता! मानो बगल से लावा बह रहा हो, ऐसी गर्म-गर्म लू चलती! हाथ में पर्स लेकर सुबह नौ बजे के बाद बाहर निकलो, तो पर्स की धातु की कड़ियाँ और ज़िपर अगर हाथ को छू जाएं, तो ऐसा लगता मानो फुल्के बनाते वक्त गैस पर गरम हो गया चिमटा छू गया हो! आँखों को बचाने के लिए गॉगल्स पहनो और यदि वे धातु के हों, तो अक्सर नाक की डंडी को जला ही देते। अग्निदेव का साक्षात रुप! रात में भी कोटा के पत्थर ठंडे नहीं होते और शाम होते ही पथरीली ज़मीन से उठती ‘लू’ के ऐसे गरम तमाचे लगते कि गाल और नाक लाल-लाल हो जाएं! रात में भी कहीं राहत का नामो-निशान नहीं होता! रात का मतलब है कि अंगारा बुझ गया हो पर भट्टी अभी भी गर्म हो! ऐसी भयंकर गर्मी और भयानक उमस! कुत्ते भी गरम सड़क पर नहीं सो पाते, इसलिए वे किसी दुकान या घर के ओटले पर, जहाँ किसी ने पानी छिड़का हो, या खाने-पीने वालों के फैलाए हुए पानी से बने कीचड़ में लंबे होकर पड़े रहते!
लड़के जब हॉस्टल से क्लास जाते, तो साइकिल पर सवार होना भी एक मुसीबत होती; सीट गरम लोहे के बेंच जैसी हो गई होती और अगर क्लास दूर हो, तो पहुँचने में ज़्यादा समय लगता और उतनी ही अधिक ‘अगन वर्षा’ सहनी पड़ती! ज़्यादातर छात्र उस समय रिक्शा करवा लेते। बाकी समय लड़के कमरों में पड़े-पड़े पढ़ते रहते। कोटा शहर के तमाम खेल के मैदान खाली और सूने नज़र आते! एक-एक मैदान, बाग-बगीचे और रास्ते वीरान हो जाते और अकेलेपन की वेदना की भाप वातावरण में छोड़ते रहते! नदियों और नालों में भैंसों का जमावड़ा लगा रहता और दूध बेचने वालों की गायें भी उन नालों की नम हवा लेने के लिए वहीं हाँफती हुई किसी पेड़ की छाया में बैठी रहतीं। धोबी उन नालों में सुबह-सवेरे ही कपड़े धो लेते। दिन चढ़ते ही लाल अंगारों सी धूप पानी के छींटों को भी सोख लेती और पानी भी धूप के सामने मानो आक्रोश से ही गरम-गरम हो जाता!
पार्वती मुझे देखकर हमेशा दो शब्द बोलती)- ‘कैसी हो? आई हो बेटे के पास? कैसी चल रही है पढ़ाई?’ लेकिन गर्मियों में तो वह भी औपचारिक मुस्कान से काम चलाती और मुझे भी बाहर लॉबी की गर्मी में खड़ा नहीं रहना होता, इसलिए मैं भी मुस्कुराकर फटाफट कमरे की तरफ भाग जाती। लेकिन, पार्वती जब कमरे में आती तब थोड़ा खिलती और दो-पाँच वाक्यों की ‘लेन-देन’ होती! उससे बातचीत के दौरान मुझे इतना पता चला था कि उसके तीन बच्चे हैं। बड़ी बेटी की शादी टोंक गाँव में कर दी है और दो बेटे कोटा में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन में मज़दूरी करते हैं और उसका पति चाय की दुकान पर काम करता है। हॉस्टल के बगल में ही एक झुग्गी-बस्ती है, जहाँ उसका एक छोटा सा कमरा है। गर्मी से बचने के लिए उसने एक पुराना एयर कूलर लिया है, जो जगह बहुत घेरता है पर ज़्यादा ठंडा नहीं करता। कोटा की गर्मी में पंखे भी किसी काम के नहीं लगते, वे सुस्त और गरम हवा फेंकने वाले लगते। पार्वती जहाँ रहती थी, उस झुग्गी वाले इलाके से हनुमान जयंती के दिन एक प्रसिद्ध मंदिर के दर्शन करके रात नौ बजे हॉस्टल लौटते समय मैंने देखा था कि हर घर में कूलर था। कूलरों की घरघराहट गरम डामर की सड़कों को और भी गरम करके पिघला रही थी मानो!
हॉस्टल की कुल तीन बहुमंजिला इमारतें थीं और तीनों की कॉमन मेस (भोजन कक्ष) ग्राउंड फ्लोर पर पक्की छत और दीवारों के साथ बनी थी। उसमें एयरकंडीशनर और पंखे लगे थे।
उसका दरवाज़ा काँच का था जो बाहर की गर्मी को अंदर आने से रोकता था ताकि छात्र आराम से खाना खा सकें। लेकिन, हॉस्टल की बिल्डिंग से मेस तक पहुँचना ही कठिन काम था। पैदल जाने में पाँच-सात मिनट तो लगते ही थे, लेकिन वे पाँच-सात मिनट आग की बारिश के नीचे चलने जैसे हो जाते। चलने का एक-एक पल गिना जाता और वह एक-एक घंटे जितना लंबा लगता! लेकिन पेट भरना हो या सुबह की चाय पीनी हो, उस आग में जलना ही पड़ता था। माताएँ सिर पर ओढ़नी ओढ़कर और बेटे टोपी पहनकर मेस आते-जाते दिखते! और मेस में पहुँचने के बाद हर किसी का पहला काम ठंडा पानी या छाछ गटकना होता! मेस का मैनेजर भी कहता कि कोई लड़का खाना खा ही नहीं पा रहा है। सिर्फ ठंडी छाछ, ठंडा दूध और आइसक्रीम ही खाई जा रही है! बाकी सब पड़ा रहता है। काम करने वाले लोग भी वहीं खाना खाते थे, पर गर्मी के कारण उन सबका भोजन भी बहुत कम हो गया था। मैनेजर कहता, ‘उणाळो में सब पाणी पी-पी’र ई काम करया करै, फेर काम करबा की सगत (शक्ति) भी कठासूं आवै?’ (गर्मियों में सब पानी पी-पीकर ही काम करते हैं, फिर काम करने की शक्ति भी कहाँ से आएगी?)
पार्वती भी वहीं खाना खाती। चार निवाले जल्दी-जल्दी खाकर छाछ के गिलास खाली करती, तो मैनेजर उस पर चिल्लाता- ‘जो खाना है वह खा! बेमतलब की छाछ मत पी, रसोई बिगड़ रही है और छाछ खत्म हो जाएगी।’
लेकिन गर्मी में बर्फ की तरह पिघलती पार्वती कुछ सुनती नहीं और एक ही साँस में छाछ के गिलास पर गिलास गटक जाती! और फिर धम्म से हाँफती हुई थोड़ी देर बैठ जाती! पार्वती और उसके जैसे दूसरे काम करने वाले मेस के पिछले हिस्से में खाना खाते थे। जूठी थाली रखने जाते समय उन सबको खाना खाते देखा जा सकता था और मैनेजर की चिल्लाहट भी सुनाई देती थी! रसोइए रसोई की गर्मी से थककर पंखे के नीचे बैठ जाते और जो मन करता वह खाते। ज़्यादातर छाछ-चावल और कभी-कभी लड़कों के लिए मंगवाई गई आइसक्रीम पर चुपचाप हाथ साफ़ कर रहे होते। यह देखकर पार्वती उन सब पर रोष जताती और शिकायत करते हुए बोलती- ‘खुद तो सब छाछ पीते हैं और ढेर सारी आइसक्रीम चट कर जाते हैं। पीछे पंखे के नीचे बैठ जाते हैं। और मुझे बिना पंखे की लॉबी और सीढ़ियों पर झाड़ू-पोछा करना पड़ता है, पूरा-पूरा दिन निकल जाता है! वहाँ हवा की एक लहर आए ऐसी एक भी खिड़की नहीं है। ऐसी गर्मी में हमारा सड़कर मरना किस्मत में लिखा है। मुझे छाछ पीने से रोकने वाला मैनेजर तो खुद एसी की ठंडक में बैठा रहता है।’
‘जाओ तुम सबको लू लग जाए!’ हॉस्टल का मालिक बड़बड़ाता रहता- ‘सबके दिमाग गर्मी में खराब हो जाते हैं। सब के सब झगड़ते रहते हैं।’
हॉस्टल के मालिक का घर बगल वाली बिल्डिंग में ही था, इसलिए उसकी पचपन-सत्तावन साल की पत्नी हॉस्टल में आकर बैठती और मेस में ही खाना खाती। जो माताएँ अपने बेटों से मिलने आती थीं, वे उनके साथ बातें करके समय बितातीं। अगर किसी माँ को कोटा डोरिया की साड़ी या ड्रेस लेनी होती, तो वे उनके साथ बाज़ार भी जातीं और अच्छी शॉपिंग करवातीं, यह उनका शौक था! और खुद भी अपने लिए हर बार कोटा के उस पुराने बाज़ार से, जहाँ कोटा का कपड़ा भारी मात्रा में बिकता था, कुछ न कुछ ले आतीं। कभी पति के लिए कुर्ता बनवाना होता तो कभी बेटे के लिए शर्ट! इस बार वे मेरे साथ भी बाज़ार आई थीं और उन्होंने मुझे कोटा डोरिया के कपड़े की जानकारी देते हुए बताया था कि यह कपड़ा सूती जाली जैसा पतला होता है ताकि पहनने वाले को गर्मी न लगे! “यहाँ गर्मी बहुत होती है न!” वे मेस में खाना खाते समय भी मेरे साथ थीं और मेस के पिछले हिस्से में छाछ के लिए होने वाली चिल्ला-चिल्ली सुनकर बोल उठीं- ‘सबको बस छाछ और आइसक्रीम चाहिए! सबको बाँटते फिरो तो कितना महंगा पड़ जाता है। हॉस्टल के रखरखाव का खर्चा बढ़ जाता है!’
और उस दिन पार्वती फिर से पिछले हिस्से से थोड़ा खिसककर लड़कों के खाने वाले एरिया में ही आकर बैठ गई थी जहाँ एसी की ठंडक थी। मैनेजर की नज़र पार्वती पर पड़ते ही वह उसे धमकाकर निकालने लगा और वह मालकिन भी चिढ़कर बोलीं- ‘ये काम करने वाले यहाँ आकर लड़कों की जगह में बैठ जाते हैं, यह कितना बुरा लगता है! कोई नया अभिभावक लड़कों के लिए हॉस्टल देखने आए तो कितनी खराब इम्प्रेशन पड़ेगी! इन सबको बाहर ही खाना दे दिया करो।’
सबने पार्वती को धमकाकर वहाँ से निकाला तो पार्वती जलती-मोम सी पिघलती हुई चली गई।
वह अपना झाड़ू और पोछा ग्राउंड फ्लोर के बाथरूम में रखती थी। वहाँ से वह सफाई का सामान उठाकर लिफ्ट से दसवीं मंजिल पर पहुँचती और फिर वहाँ से सफाई शुरू करके एक-एक मंजिल नीचे आती। जिस लिफ्ट में पार्वती चढ़ती, उसमें कोई भी छात्र नहीं चढ़ता था। पार्वती दसवीं मंजिल पर अकेली ही पहुँचती और फिर खाली हुई लिफ्ट का इस्तेमाल लड़के करते। कई बार तो लड़के लिफ्ट में रुम फ्रेशनर छिड़कते। लड़कों को झाड़ू-पोछा-फिनाइल और पार्वती के पसीने की गंध से कोफ्त सी थी।
उस दिन दोपहर में, मैं खाना खाकर गर्मी की थकान के कारण एसी फुल करके सो गई थी। चार बजने वाले होंगे कि अचानक बाहर लॉबी में लड़कों का शोर सुनाई दिया। मैं कमरे से बाहर निकली। मेरा बेटा अभी क्लास से लौटा नहीं था। लड़कों को देखते हुए मैं कमरे के दरवाज़े पर ही खड़ी हो गई। गर्मी की वजह से लॉबी में जाने का मन नहीं हुआ। पार्वती वहीं थी। उसने मुझे बताया कि कमरा नंबर पाँच वाले लड़के का मोबाइल खो गया है।
लड़के क्लास से आकर अपने-अपने कमरों में गए थे और पाँच नंबर के कमरे का एक लड़का अपना मोबाइल गायब होने के कारण उसे ढूंढने निकला था। सब उसकी मदद के इरादे से पूछ रहे थे कि उसने आखिरी बार मोबाइल कब इस्तेमाल किया था? क्लास में मोबाइल ले जाने की अनुमति नहीं थी, फिर भी कई लड़के साइलेंट करके साथ ले जाते थे। उस लड़के ने कहा कि वह क्लास में मोबाइल नहीं ले गया था। शायद मेस में खाना खाने जाते समय जेब से गिर गया हो। अगर ऐसा है, तो मोबाइल हॉस्टल में ही होगा! लड़कों ने पार्वती से पूछा- ‘कहीं गिरा हुआ मोबाइल देखा है?’ पार्वती ने मना कर दिया और फिर पूरा झुंड एक-एक मंजिल की सीढ़ियां चढ़-उतरकर गया और तलाश शुरू की। मेस में गए। सारी टेबलें देखीं। स्टाफ से पूछताछ की। लेकिन कहीं मोबाइल नहीं मिला। लड़कों ने कई बार रिंग भी की थी, लेकिन फोन कहीं नहीं बजा, क्योंकि शायद वह साइलेंट मोड पर था।
भीड़ छँट गई लेकिन हॉस्टल के मालिक ने तमाम स्टाफ को निर्देश दे दिया था कि अगर मोबाइल मिले तो तुरंत जमा करा दें। ‘अगर किसी ने भी मोबाइल चुराया है तो बुरा हाल होगा, नौकरी से निकाल दिया जाएगा,’। ऐसा कहकर शायद दबाव बढ़ाया जा रहा था। गर्मी में मोबाइल गुम होने की घटना ने वातावरण को और गरम बना दिया था। एक तरह से मुझे अच्छा लगा कि हॉस्टल का मैनेजमेंट अच्छा है, कुछ भी होने पर तुरंत कदम उठाता है!
अगले दिन सुबह पार्वती अपने हाथ में मोबाइल लिए हॉस्टल के ऑफिस में एसी में खड़ी थी। मैनेजर ने लड़के को बुलाया था और पुष्टि हो गई थी कि मोबाइल उसी लड़के का है। मैनेजर ने पार्वती से पूछा- ‘तुझे यह मोबाइल कहाँ से मिला?’ पार्वती ने कहा- ‘नीचे वाले बाथरूम में, जहाँ मैं झाड़ू और पोछा रखती हूँ, वहाँ मुँडेर पर पड़ा था।’ तो मैनेजर ने शक से पूछा- कल जब तू झाड़ू रखने गई थी तब नहीं दिखा था?’
पार्वती ने कहा- ‘साहब, मैं पूरे दिन के काम से बहुत थक गई थी, इसलिए नहीं दिखा होगा!’ लेकिन वह पाँच नंबर वाला लड़का शक से पार्वती की तरफ देख रहा था। पार्वती वहाँ से सफाई करने चली गई। फिर उस लड़के ने कहा- ‘सर, पूरी जांच कीजिएगा। मुझे तो लगता है इसी ने मोबाइल ले लिया था और काम से निकाले जाने की धमकी मिलने के डर से आज वापस दे दिया। वरना बाथरूम में मोबाइल कहाँ से पहुँच जाएगा? मैं तो ग्राउंड फ्लोर के बाथरूम में जाता भी नहीं हूँ।’ वह लड़का थोड़ी देर बाद दूसरे लड़कों को लेकर ऑफिस पहुँचा और सबने पार्वती के खिलाफ एक ही तरह की शिकायत की कि जब भी पार्वती कमरे में सफाई करने आती है, तो बहुत धीरे-धीरे झाड़ू लगाती है और पोछा करती है। इतना ज़्यादा समय लगाती है। हो सकता है वह कमरे की कीमती चीज़ों पर नज़र रखती हो और पढ़ाई में व्यस्त लड़कों की नज़र बचाकर चोरी करने की ताक में रहती हो! लड़कों ने अपनी छोटी-मोटी चीज़ें गायब होने की शिकायत की। लेकिन वे इतनी बड़ी चीज़ें नहीं थीं कि वे शिकायत करने आते, इसलिए अब तक किसी ने ध्यान नहीं दिया था, लेकिन आज जब मोबाइल की बात आई तो सबकी शक की सुई पार्वती पर टिक गई। उन सभी लड़कों को यकीन तो नहीं था, लेकिन फिर भी सबको एक ही शक था कि, ‘पार्वती क्यों हर कमरे में इतना धीरे-धीरे काम करती थी?’
मेरे कमरे में भी वह धीरे-धीरे काम करती थी, लेकिन मैंने सोचा था कि वह मुझसे बातें करते-करते काम करती है इसलिए धीरे करती होगी। जितने भी अभिभावक वहाँ मौजूद थे, उन सबका एक ही स्वर उठा कि पार्वती को काम से निकाल दिया जाए। ‘आज तो इसने मोबाइल वापस दे दिया है, कल कोई कीमती चीज़ चुराकर न भी दे!’
मैनेजमेंट ने पार्वती को निकाल दिया। छाछ पीने या एसी में बैठने के लिए जब पार्वती को धमकाया जाता, तब पार्वती जलती-पिघलती बाहर निकल जाती थी। आज मैंने उसे रोते-पिघलते बाहर निकलते देखा! मुझे उस पर दया आई लेकिन हकीकत पता न होने के कारण मैं चुपचाप कमरे में एसी की ठंडक में चली गई!
दो दिन बाद मैं अपने शहर वापस जाने के लिए निकल रही थी और सामान लेकर रिक्शा के इंतज़ार में गर्मी से बेहाल खड़ी थी कि तभी पार्वती वहाँ से गुज़री। मुझे देखकर पल भर के लिए रुकी और पीठ खुजलाते हुए पूछा- ‘जा रही हैं? एक आपका ही कमरा था जहाँ मैं आपसे बातें करते-करते एसी में थोड़ी ज़्यादा देर रह पाती थी। भले ही कमरे में बैठ न सकूँ, पर काम करते-करते ही सही, गर्मी से थोड़ी देर तो बच पाती थी। ये घमौरियाँ मुझे बहुत जलाती हैं। एसी के सामने पीठ करती हूँ तो थोड़ी देर जलन शांत हो जाती है।’
‘बहुत गर्मी लगती है। सबके कमरे में मैं इसीलिए धीरे-धीरे काम करती थी ताकि थोड़ी देर एसी में रह सकूँ। पर अब तो यह नौकरी भी गई!’
यह कहकर बुझी आंखों से वो चुपचाप चली गयी। और मैं देरतक उसका प्रतीक्षा ठ देखती रही थी। वही घमौरियों भरा पीठ…




तथाकथित सभ्य समाज की असंवेदनशीलता और लाचार शोषित का मार्मिक चित्रण
बढ़िया कहानी !
पूर्वी जी को बहुत बहुत बधाई !
जी बहुत बहुत धन्यवाद 🙏