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कहानीः जब लाद चलेगा बंजारा

कुछ प्रेम कहानियाँ मिलन की नहीं, स्मृति की होती हैं। वे समय के साथ खत्म नहीं होतीं, बल्कि भीतर कहीं एक शांत नदी की तरह बहती रहती हैं। लेखक की यह कहानी ‘जब लाद चलेगा बंजारा’ ऐसे ही एक किशोर प्रेम, बंजारा जीवन की अनदेखी दुनिया और समाज की पूर्वाग्रही निगाहों के बीच मनुष्य की सबसे कोमल संवेदनाओं को बेहद आत्मीयता से रचती है।

गोविंद निषाद की यह कहानी प्रेम के साथ-साथ उन लोगों के जीवन को भी आवाज़ देती है, जिन्हें समाज अक्सर देखकर भी नहीं देखता। यह कहानी स्मृति, प्रेम और हाशिये का जीवन-तीनों को एक साथ लेकर चलती है।

Kahani
हिंदी कहानी। इमेजः बोले भारत/ AI

शहर में एक अजीब सी बेचैनी पसरी हुई थी। वैसे देखने पर लगता था कि मेरा शहर अभी मेरे सपनों वाला ही है लेकिन अब वह शहर कहाँ रहा। अब तो यह स्मार्ट सिटी है। स्मार्ट होता जा रहा जीवन भी एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था, जहाँ कोई भी सफलता ख़ुशी का अहसास तक नहीं करा पा रही थी। सब तरफ़ अवसाद के बादल छाये हुए थे। चिंताओं की बारिश कब मूसलाधार हो जाये, इसका कोई अंदेशा नहीं था। ऐसे में मेरा मन भला कहाँ जाता। वहीं जहाँ कभी जीवन की एक तरंग भी मन को ख़ुशी से भर देती थी। वो रंग पानी का था। पानी शरीर के लिए ही नहीं मेरे मन को जीवित रखने के लिए भी जरूरी था।

मैं उस शाम जब यूँ ही अपने पाँव यमुना में डाले दूर झुंड में उड़ रहे पक्षियों को निहार रहा था कि सहसा मेरा ध्यान बगल में कूड़े बीन रही एक लड़की पर गया। सब कुछ भूलकर भी दिमाग़ को कुछ याद आ रहा था। वो मेरी तरफ़ तो नहीं देख रही थी लेकिन मेरी आँखों में उसकी आँखें चमकने लगी ठीक वैसे ही जैसे कभी उस भूरी आँखों वाली को देखकर मैं दुनिया के खुशियों के एवरेस्ट पर सवार हो जाता था। ऐसा क्या था उन आँखों में जिसे मैंने फिर कभी नहीं देखा।

ठिठुरा रहा माघ उतरकर फागुन पर सवार हो रहा था। उसके साथ हवाओं में छुपी हुई सर्द धीरे-धीरे अपना रूप बदलकर गर्माहट का आभास देने लगी थी। गाँव इंतज़ार कर रहा था। किसका? आपको लग रहा होगा कि बसंत तो आ ही गया, फिर गाँव वाले किसका इंतज़ार कर रहे थे। गेहूँ की मढ़ाई का? नहीं-नहीं। वह उनका इंतज़ार कर रहे थे, जो दूर देस से चलकर उनके गाँव में प्रतिवर्ष आ जाया करते थे।

वह अपने साथ जीने का सारा सामान लादे जब पश्चिम से उतराते थे तो वह दृश्य देखने लायक होता था। वह एक साथ पंक्तियों में ऐसे चलते जैसे चीटियों का कोई झुंड चला जा रहा हो। उनके साथ पूरा परिवार होता। उनके रंग-बिरंगे कपड़े उनके कारवां को किसी इन्द्रधनुषी रंग में बदल देते। वह जहाँ जाते, वही उनका देस हो जाता। उनके आने के बाद पूरा होता गांव वालों का फगुआ। मेरी माँ तो फागुन लगते ही पश्चिम दिशा में टुकटुकी लगाये बैठ जाया करती थी। सबके इंतज़ार का मतलब अलग-अलग होता था।

वे बंजारे थे। एक समय था, जब देश का व्यापार इन्हीं के भरोसे पर चलता था और वो इतिहास की बात हो गई थी। उनके वर्तमान का खेत उदारीकरण का साँड़ चर गया था, जिसमें दूब की जड़ें भी कराह रही थीं। इन कराहती आहों के बीच वह सिलबट्टा और पत्थर के अन्य सामान बेचा करते थे। वह गांव के बाग में अपना डेरा डालते। सुबह ही पुरुष और महिलाएँ गधों पर समान लादकर निकल जाते गांवों की ओर। यह अचानक से बसा पत्थरकट्टों का मोहल्ला आसपास के लोगो के लिए आकर्षण का केंद्र हो जाया करता था।

माँ की सबसे प्रिय सखी हर वर्ष उसी कारवां के साथ आती थी। माँ जब भी उनसे मिलती जैसे लगता अपनी किसी दूर देस की बहन से मिल रही है। कहती, “का धिया! आय गयलू।” बदले में वह उन्हें गले लगा लेतीं। फिर दोनों शाम को बैठकर ढेर सारी बातें करतीं। माँ बताती कि पूरे साल उन्होंने क्या-क्या किया। फिर जब तक उनका डेरा रहता, शाम होते ही उनकी सखी मेरे घर आ जाती और दोनों सखियाँ मिलकर खूब बातें करतीं। मैं टुकुर-टुकुर उन्हें देखता और उनकी बातें सुनता। उन्हें बंजारिन स्त्री के साथ बैठने और बात करने में कोई समस्या नहीं थी। माँ तो प्रगतिशीलता क ‘प’ भी नहीं जानती थी, लेकिन वह प्यार-दुलार को जानती थी, जिसे वह हर उस महिला पर लुटा देती थी, जो परदेस से उनके देस आती थी। चाहे वह ‘राचिन’ यानी झारखंड और छत्तीसगढ़ से आने वाली औरते हों, चाहे बंजारे।

रात उतरते ही उनके डेरे से गाली-गलौज की आवाजें आने लगती। यह गालियाँ डेरे के पुरुष देते, जो अक्सर शराब पीकर आया करते थे। अगर वह शराब न पियें तो रात में नीद भी कहाँ से आती उन्हें। आपने देखा होगा कि देसी शराब के ठेके पर शाम को कौन दारू पीता है? अरे वही जो दिन भर मजदूरी के बाद थकान मिटाने आ जाते थे ठीके पर। बंजारे भी तो आख़िर मज़दूर ही थे, भले ही यह उनका ही काम था।

गांव के लोग कहते कि उनकी औरते धंधा करती हैं। मैंने आसपास के कितने लोगो से सुना कि फलानी पत्थरकट्टिन को उसने फँसाया हुआ है। ऐसे ही चर्चे वहाँ की सभी औरतों को लेकर होते। यह कितना सच था कितना फ़साना भगवान जाने लेकिन कुछ तो था जो एक अदृश्य लोक में चलता रहता था। इसी अदृश्य लोक में पाए जाते गाँव के पुरुष और औरत भी जब बंजारे डेरा उठाकर कहीं और चले जाते।

पथरकट्टीनें जब सामान बेचने निकलती तो उनका सिंगार-पटार देखने लायक होता। वह किसी नायिका की तरह गांव में निकलती थीं। गांव की औरतें तो उन्हें देखकर ही जलने लगती थी लेकिन क्या ही करें। किसी के सिलबट्टे पर छिनाई करनी होती थी, तो किसी को अपना लोढा छिनाई करवाना होता था, तो किसी को अपना जाँता। ऐसे में बिना उन पथरकट्टिन औरतों के उनका काम भी नहीं चलता था। वैसे भी वह साल भर में एक ही बार आती थीं और अगर इस दौरान उनका सिलबट्टा, लोढ़ा और जाँता नहीं छिनाई हो पाया तो साल भर कैसे मसाला और गेहूँ पीसेंगी?

वह डरती भी थी कि कहीं उनका मरद उनकी नजरों के पासे में ना आ जाए। वह कहती थीं, “पथरकटनी ना जाने कवन जादू-टोना कई देत हई कि मरदे कुल उनन्हें के पिछवा घुमय लागत हवै।” वह तो कुछ नहीं करती थी बस उनकी आंखें की सुंदरता और उनका पहनावा ही इतना आकर्षण होता था कि पुरुष उनके आकर्षण से बच ही नहीं पाते थे। मरद जाति के मुँह से वैसे भी हमेशा लार टपकते रहता है लेकिन मुँह में घुलता पान पथरकट्टीन औरतों की इस सुंदरता में चार चांद लगा देता था। अब अगर कोई पुरुष लार टपकाता है तो उसमें उनका क्या दोष। जब वह ख़ुद कुएँ में गिरना चाहते हैं तो फिर कौन बचाए उन्हें।

हाँ, कुएँ से याद आया कोई दो साल पहले इस डेरे में आई एक स्त्री ने बिसुनाथ बनिया को तब कुएँ में धकेल दिया था, जब वह निबृत्त होने गाँव की झाड़ियों में गई थी। बिसुनाथ बनिया बड़े रसिक मिजाज के आदमी थे। स्त्री देखी नहीं की लार टपकना शुरू। उनकी दुकान पर तो औरतों ने समान ख़रीदना भी बंद कर दिया था। उस दिन वह घात लगाए पहले से झाड़ियों में बैठे थे। जैसे वह आई उन्होंने किसी ख़ूँख़ार भेड़िया सा उस पर हमला किया लेकिन बिसुनाथ बनिया को यह बात कहाँ पता थी कि वह पत्थर को भी मसल देती हैं, फिर बिसुनाथ बनिया की क्या औक़ात। उसने जबरदस्त पलटवार किया और उन्हें ज़मीन पर दरेर दिया। उनका मुँह धूल से भर गया। बिसुनाथ बनिया ठहरे पुरुष तो अपना पौरुष कैसे पराजित होने देते। उन्होंने पहले तो बहुत विनती की कि, छोड़ दो अब कभी नहीं आऊंगा।” उसने कहा कि मैं छोड़ दूँगी लेकिन तुम यहाँ से चले जाओगे और किसी से कुछ नहीं कहोगे। बिसुनाथ गो-गो करती हुई आवाज़ में बोले, “छोड़ दो, फिर कभी नहीं आऊंगा।”

उसने छोड़ा ही था कि बिसुनाथ फिर से उसका झोंटा पकड़ बैठे। फिर क्या, उसने बिसुनाथ को उठाकर कुएँ में फेक दिया। किसी को महीनों ख़बर नहीं लगी कि बिसुनाथ कहाँ बिला गए। महीनों बाद एक दिन एक भेड़िहारा जो झाड़ियों में अपनी भेड़े चराने गया था, उसने देखा कि पानी में एक नरकंकाल है। कुआँ में पानी बहुत थोड़ा था। शोर हुआ। पुलिस आई। छानबीन हुई लेकिन किसी को पता नहीं चला की बिसुनाथ ने आत्महत्या की थी या किसी ने उन्हें कुएँ में मारकर फ़ेक दिया था। आपको पता है वह और कोई नहीं मेरी माँ की सहेली थी इसलिए यह राज सिर्फ मुझे पता है और मेरी माँ को।

…..

एक दिन मैं उस बाग की तरफ अपनी माँ को ढूंढते हुए डेरे पर पहुंचा। जब मैं उनके डेरे पर पहुंचा तो सभी आदमी-औरत अपने गधों के साथ सामान बेचने के लिए गांव में चले गए थे। वहां रह गए थे तो सिर्फ बच्चे और बुजुर्ग। उस डेरे और मेरी झोपड़ी में बस इतना फर्क था कि मेरी झोपड़ी मेरी ज़मीन पर थी बाक़ी ऐसा कुछ नहीं था जो मेरी झोपड़ी में न हो, जो डेरे में होता है। मैले-कुचैले बच्चे, भिनभिनाती मक्खियाँ, बहते गंदे नाले, एक अजीब लेकिन हमारे लिए अंजान गंध, खटिया पर कराहते बूढ़ें। सब कुछ वैसा ही था।

मैंने देखा कि एक मेरी ही हमउम्र की लड़की डेरे में बैठी है। मैंने उससे अपनी माँ के बारे में पूछा तो उसने कहा कि वह तो आज आई नहीं थी। फिर मैं पास में स्थित तालाब के किनारे बैठा मछली मारने की जुगत भिड़ाने लगा। कुछ देर बाद जाल लाने के लिए घर की तरफ़ कदम बढ़ाये ही थे कि तभी देखा तो दूर वही लड़की तालाब में कपड़ें धोने चली आ रही है। वैसे मुझे तालाब में नहाना अच्छा लगता है लेकिन उस दिन अकेले नहाने का कोई मूड नहीं था। हां, तालाब के किनारे बैठा जरूर जा सकता था, हालांकि मैं अब बैठना नहीं चाहता था लेकिन उस लड़की को देखकर मेरे मन में कुछ बुलबुलाहट हुई और मैं वापस जाकर फिर से तालाब के किनारे बनी सीढ़ियों पर बैठ गया। वह आई और मेरे ठीक बगल में अपने कपड़े धुलने लगी। वैसे मैं था तो डरपोक ही लेकिन मरता क्या न करता।

मैं बगल में बैठा तो पानी में पत्थर मारते हुए एकाध बार कनखिया आंखों से उसे देख लेता। वह लड़की अपने में मगन कपड़े धोने में व्यस्त थी। जब मैंने देखा कि वह लड़की मेरी तरफ नहीं देख रही है, तब एक बार तो मुझे लगा कि कुछ नहीं होने वाला है, यहां से चलते हैं लेकिन तभी लड़की ने मुड़कर मेरी तरफ देखा और मुस्कुरा दी। इतना काफ़ी था मेरे लिए यहाँ रुक जाने के। अब मेरे पास यहां से जाने का कोई कारण नहीं था। वह मुस्कराई तो ऐसा लगा कि नदी में कमल के फूल खिल आए हैं। वह कपड़े धोती किसी बॉलीबुड की हीरोइन में बदल गई है जो सरोवर से नहा कर निकल रही है। उसके बदन पर एक चमक उभर आई है जो उसके ललाट से होकर दांत और उसके शरीर पर फैल गई है। उस लड़की ने कपड़ा धुलना जारी रखा। जब तक वह कपड़े धोती रही, मैं वहीं बैठा उसे निहारता रहा। कुछ नहीं बोला और वापस चला आया। मेरे मन में एक अजीब सी बेचैनी उभर आई थी। मैं उन आंखों को भूल ही नहीं पा रहा था। उस नीले समंदर में मैं डूबता जा रहा था। सच बोलूँ तो डूब जाना चाहता था।

दूसरे दिन फिर मैं ठीक उसी समय तालाब पर आया लेकिन वहां कोई लड़की नहीं थी। मैं उदास तालाब की सीढ़ियों पर बैठा इंतजार करता रहा उस लड़की का कि वह कब आएगी लेकिन वह नहीं आई। मैं दिल पर सिलबट्टा रखकर बड़े उदास मन से उठा और घर की तरफ चल दिया। घर पहुंचकर मैंने जब खाने के लिए हाथ बढ़ाया तो मुझे लगा कि मेरे पेट में डेरे के पत्थर जैसा कुछ भर गया है। उस रात मैं सोया भी नहीं। अगली सुबह का इंतजार करता रहा।

सुबह होते ही मैं फिर से तालाब की सीढ़ियों के पास जाकर बैठ गया। आज का दिन मेरे लिए शुभ दिन था। मैं वहाँ आने से पहले ही बाज़ार जाकर अख़बार में अपना राशिफल पढ़ आया था, जिसमें मेरी राशिफल ‘कुंभ’ में लिखा था—आज प्रेम-प्रसंग प्रगाढ़ होंगे।

बात सही थी, देखा तो सामने से वही लड़की चली आ रही थी। इस बार उसके हाथों में कपड़ा तो था लेकिन बहुत कम। मैं समझ गया कि आज वह कपड़े धोने नहीं, नहाने आ रही है। वह आई। उसने अपना कपड़ा रखा और तालाब में उतरकर नहाने लगी। मैं उसे निहारता रहा, ऐसे जैसे कोई पन्ना के खदानों में हीरा पा गया होऊँ, जिसे निहार-निहारकर खुश ही होता जा रहा था। वह दृश्य तो मेरे लिए हीरा ही था। ऐसे लगा मैं कोई सपना देख रहा हूँ। जब तक वह नहाती रही, मैं उसे देखता रहा। उसे देखकर लड़की ने मेरी तरफ आंखें उठाई और बोली “का टुकुर-टुकुर देख रहे हो तुम। का कभी लड़की नहीं देखे हो का।” मैं डर गया और डरकर भाग गया। थोड़ी दूर पर प्रेमबद्ध पक्षियों का जोड़ा मुझे आता देख उड़ गया। जब मैं भाग रहा था। मेरे हाथ पसीने से भर गए। माथे पर बूँदे लहराने लगी। मुझे लगने लगा कि कहीं वह इसकी शिकायत माँ से न कर दे। फिर माँ बहुत मारेगी।

हाँ, जब मैं घर आया तो खुश था। कम से कम उसने बोला तो भले ही चाहे उसने डांटा ही था। अगले दिन फिर मैं सीढ़ियो पर बैठा उसका इंतजार कर रहा था। वह आई और उसके हाथों में इस बार बर्तन थे। वह बर्तनों को धोने लगी। अबकी बार लड़की की निगाहें बर्तन छोड़ मेरे चेहरे को मापने में लगी हुई थी। इस बार लड़की ने सीधे ही कहा “तुम का रोज आ जाते हो और मुझे देखते रहते हो तुम्हें और कोई काम नहीं है।” इस बार मैंने बड़ी हिम्मत बटोर कर कहा, “काम तो बहुत है लेकिन इससे बड़ा काम तो अभी कुछ नहीं लगता है।”

लड़की ने फिर कहा, “तुम्हारी अम्मा से कह दे?”

“अम्मा से क्यों कहोगी मैंने क्या किया है?” मैंने घबराते हुए कहा

“फिर क्यों रोज-रोज यहां चले आते हो।”

“अरे मैं तालाब में मछली देखने आता हूँ।”

“सिर्फ़ देखते ही रहते हो उन्हें?”

“हाँ।”

“देखते ही रहोगे तो मछलियाँ कब मारोगे। तुम्हारी अम्मा मेरी अम्मा से कह कर गई है कि एक दिन मैं मछली लाकर दूँगी।”

“क्या! अम्मा ने कहा है?”

“हाँ-हाँ, तुम्हारी अम्मा ने कहा है। तो बताओ कब मार रहे हो मछलियाँ?”

“जब अम्मा कहेगी तो मार दूँगा।”

“और मैं कहूँ तो?”

यह सुनकर मैं तो शरम से पानी-पानी हो गया। उसने फिर पूछा, “अरे बताओगे की ऐसे शर्माओगे?”

“मार दूँगा।” मैंने अपना सिर नीचे ज़मीन में धसाँते हुए कहा।

“अच्छा, एक बात पूछू, सही-सही बताना। तुम यहाँ क्या करने आते हो?”

“तुम्हें देखने।”

“मुझे देख कर क्या करोगे?”

“कुछ नहीं करूंगा, बस तुम्हें देखूंगा। तुम्हें देखना मुझे अच्छा लगता है”

“ऐसा क्या खास है मेरे में। तुम्हारे गांव में और भी सुंदर-सुंदर लड़कियां हैं, तुम उन्हें क्यों नहीं देखते।”

“वह क्या है न कि गांव में सुंदर लड़कियां तो है लेकिन उनकी आंखें तुम्हारी आंखों जैसी नहीं है। यह जो तुम्हारी भूरी आंखें है न, ऐसी आंखें मैंने जीवन में पहली बार देखी हैं और मैं नहीं चाहता हूं कि जब तक तुम हो उसे न देख़ूँ। तुम जब तक यहां हो, मैं इन आंखों को देखूंगा। ऊपर से यह तुम्हारे बाल जो बिल्कुल काले नहीं है, कुछ भूरे हैं, जानती हो कितने अच्छे लगते हैं। ऐसा लगता है कि धान के खेत में बालिया लटक रही हों। तुम्हें नहीं लगता है कि ऐसी आंखों और बालों को कोई भर नजर देखने वाला चाहिए।”

लड़की इस बार शरमा गई। उसने शरमाते हुए कहा, “तुम्हें नहीं लगता है कि तुम कुछ गलत कर रहे हो?”

“अरे इसमें गलत क्या है मैं तो तुम्हें देख ही रहा हूं और तो कुछ नहीं कर रहा हूं।”

“अच्छा कब तक देखोगे?”

“जब तक तुम यहां बैठी हो।”

“मैं जब तक बैठी रहूंगी, तब तक तुम बैठे रहोगे?”

“हां तुम जब तक बैठी रहोगी, मैं तब तक बैठा रहूंगा।”

“फिर ठीक है। मैं आज यहां दिन भर बैठी रहूंगी, देखती हूं तुम कब तक बैठे रहते हो?”

“बैठ कर देख लो, मैं दिन भर न बैठा रहा तो फिर कहना।”

“तुम बड़े निहायत ही ढीठ किस्म के लड़के हो।”

“देखो मैं ढीठ तो नहीं हूं। गांव में लोग मुझे बहुत अच्छा लड़का मानते हैं लेकिन मैं अगर ढीठ नहीं बना तो फिर तुम्हारी आंखों को कैसे देख पाऊंगा?”

“तुम मानोगे नहीं, मुझे जाना ही पड़ेगा।”

“अरे जा क्यों रही हो बैठो न कि दिल अभी भरा नही तुम्हारी आंखों को देखकर।”

“अरे चल हट। मुझे जाने दे।”

लड़की ने बर्तन उठाया और डेरे की तरफ चली गई। मैं उसे देखकर मुस्कुराता रहा। मैं देखना चाहता था कि वह कब मुड़कर मुझे देखेगी। अभी पिछले दिनों मैंने दीदी के गौने में वीसीआर पर ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ फिल्म देखी थी और मैं जानता था कि अगर उसने पलट कर देखा तो पक्का उसके दिल में कुछ है। वह जब डेरे के भीतर प्रवेश करने ही वाली थी, मुड़कर उसने देखा तो मेरा दिल बाग-बाग हो गया।

मैं अब शाहरुख खान था। शाहरुख ख़ान को गाँव में लोग ‘मौगा’ हीरो कहते थे इसलिए की वह हर फ़िल्म में लड़कियों से प्यार ही करता रहता है। मुझे आज वह अच्छा लग रहा था। मुझे लगा कि जब उसने पलट कर देख ही लिया है तो अब वह जरूर मुझसे मिलने के लिए कल आएगी।

आज की रात काटनी मेरे लिए मुश्किल थी। रात भर मैं वेस्टइंडीज में हो रहे एकदिवसीय क्रिकेट मैच की कॉमेंट्री सुनता रहा। दूसरे दिन मैंने अपने बालों को अच्छे से सँवारा। कपड़े इस्त्री किए। ठीक समय पर चला और फिर वही आकर बैठा हुआ उसका इंतज़ार करने लगा। बगल में जा रहे ट्रैक्टर में गाना बज रहा था, “ये दिल आपका है/ये घर आपका है हमें छोड़कर कहाँ जाइएगा।” मैं बार-बार उठकर डेरे की तरफ़ ललचाई नजरों से देखता। मगर हर बार निराश हीं हुआ। दिल डूबता जा रहा था कहीं उसने माँ से तो नहीं कह दिया। फिर सोचता अगर माँ से कहती तो माँ अब तक पीट चुकी होती। निराशा के सागर में डूबते सूरज को पूर्व दिशा से आती वह लड़की दिखी। लड़की मुस्कुराते हुए उधर से चली आ रही थी। वह आई और सीधे कपड़े धोने के लिए बैठ गई। अब वह कपड़ों से ज्यादा अपनी निगाहें मेरी तरफ किए हुए मुस्कुरा रही थी। मैं भी उसे देखकर मुस्कुरा रहा था। इसी मुस्कुराहट में न जाने कितने दिन हमने गुजार दिए।

एक दिन लड़की ने मुझसे पूछा कि, “तुमने तो अपना नाम ही नहीं बताया अभी तक?”

“तुमने पूछा भी तो नहीं।”

“अच्छा अब पूछ लिया। बताओ?”

“सुलक्छना, नाम है मेरा और तुम्हारा?”

“गौतम।”

“मैं तो जल्दी ही चली जाऊंगी, फिर क्या करोगे?”

“तुम्हारा इंतजार।”

“कब तक करोगे मेरा इंतजार?”

“जब तक तुम दोबारा नहीं आ जाती।”

“तुम्हें भरोसा भी है मैं यहां आऊंगी फिर दोबारा?”

“हां, तुम आओगी। मुझे पता है। तुम्हारे घर वाले हर साल तो आते हैं।”

“अरे अगली साल हो सकता है कि मेरे घर वाले ना आए।”

“ऐसा कैसे हो सकता है। तुम आओगी।”

“तुम्हें इतना भरोसा है?”

“हां, मुझे भरोसा है कि तुम जरूर आओगी।”

“अच्छा यह बताओ तुम करते क्या हो?”

“पढ़ता हूं।”

“यह कौन सा काम है?”

“अरे, मैं कैसे समझाऊँ तुम्हें। वो क्या है न कि मैं लिखता हूँ। तुमने देखा न लोग एक पिलास्टिक के डंडे से कुछ कागज पर बनाते हैं। वही मैं करता हूँ।”

“हाँ, देखा तो है। कभी-कभी पुलिस डेरे पर आती है तो सबसे पूछकर एक कागज पर कुछ गोंजा-गोंजी करती है। वही न?”

“हाँ-हाँ, वही।”

“तो तुम पुलिस वाला काम करते हो? वह बड़े ख़राब होते हैं। जब भी आसपास कहीं चोरी होती है। हमारे डेरे पर आते हैं और दो-चार लोगो को ले जाकर जेल में बंद कर देते हैं। पूछने पर कुछ बताते भी नहीं। कुछ पुलिस वाले तो हमारे साथ भी….. जोर-जबरदस्ती करते हैं। कहते हैं कि तुम लोग धंधा करती हो। मर्दो को फँसाकर पैसा ऐठती हो। फिर वह पैसा माँगते हैं। हम लाचार क्या करें। कुछ नहीं कर सकते हैं सिवाय लात-घूसा और गाली खाने के। हमारी नियति में ही यह लिखा है। उन्होंने मेरे बाप को एक चोरी के इल्ज़ाम में एक दिन पकड़कर बंद कर दिया,….. जब हम इलाहाबाद में शहर के पास एक गांव में डेरा जमाए हुए थे। उसके बाद वह फिर कभी लौटकर वापस नहीं आए।” इतना कहकर वह रोने लगी। मैंने उसे चुप कराने की कोशिश की लेकिन वह रोती रही। थोड़ी देर बाद जब वह शांत हुई तो मैंने पूछा-

“तुम लोग सरकार से शिकायत नहीं करते?”

“कौन सी सरकार। हम क्या जाने कि सरकार क्या चीज होती है। हमारे लिए तो वही सरकार है, जो हमारे गाढ़े वक्त में काम आ जाय। इसी सरकार ने तो हमें चोर बना रखा है। मेरे बाप को यही सरकार खा गई। कब मुझे कोई उठा ले जाये, मुझे ख़ुद नहीं पता।”

मैं एक अजीब सी बेचैनी में घिर गया। यह सोचकर ही सिरहन होने लगी कि सरकार इनके लिए कुछ करती क्यूँ नहीं। यह भी तो हमारी तरह इंसान हैं। मैंने सोचा कि उससे रुलाने से अच्छा है कि कुछ और बात करूँ। मैंने पूछा-

“तुम्हारा घर कहाँ है?”

“हमारा कोई घर नहीं है, पूरी दुनिया ही हमारा घर है। इसलिए हम अपने एक घर में बहुत दिन तक नहीं रहते हैं।”

“यह पत्थर कहाँ से लाते हो?”

“इसे हम दक्खिन से लाते हैं। और तुम इतना क्या पूछ रहे हो। बियाह करोगे क्या हमसे?” उसने ठुनकते हुए पूछा।

“वैसे तुम बियाह करे लायक़ तो हो लेकिन इतनी कम उम्र में वियाह थोड़े न होगा।”

“मेरे यहाँ तो हो जात है।”

“तुम्हारा हो गया?”

“ना।”

“फिर ठीक है।”

“तो तुम करोगे क्या बियाह?”

“अरे भक्क। हम तो इसलिए पूछ रहे कि कहीं दूसरे के मेहरारू से तो नहीं बतिया रहा हूँ।

“अच्छा हमने सुना है कि तुम लोग मूस खाते हो।”

“यह तुमसे किसने कहा?”

“अरे लोग बतियाते रहते हैं कि यह पथरकट साले मूस मार कर खाते हैं और तुम लोग बिल्ली और नेवले भी खा जाते हो।”

“तुमको देखकर लगता है कि मैं मूस खाती हूं या बिल्ली खाती हूं।”

“तुम्हें देखकर तो मुझे बिल्कुल नहीं लगता है। मुझे तो लगता है कि तुम दुनिया की सबसे सुंदर चीज खाती होगी। तभी तो इतनी सुंदर आंखें हैं तुम्हारी।”

“जब तुम्हें लगता है कि हम नहीं खाते हैं तो तुम्हें दूसरो की बातों पर इतना भरोसा क्यों है?”

“अरे वह लोग बात करते रहते हैं ना तुम लोगों के बारे में, इसलिए मैंने पूछा।”

“तुम मुझसे पूछो, क्या पूछना चाहते हो?”

“अरे क्या पूछूं तुमसे, जो पूछना था मैंने पूछ लिया। मुझे तुम्हारी बात पर पूरा यकीन है”

“अच्छा तुम्हारी नाक में यह जो नकबेसर है ना, बहुत अच्छा लगता है और कमर पर गोदना ना ऐसा लगता है जैसे नीले आसमान में कहीं काले बादल आ गए हो।”

“अच्छा तो तुम्हें यह अच्छा लगता है।”

“हाँ, तुम्हारे कपड़े भी अच्छे लगते हैं। यह कपड़े तुम लोग कहां से सिलवाती हो?”

“यह तो हम खुद ही सिलते हैं। हमारे यहां लोग ऐसे ही कपड़े पहनते हैं।”

“तुम्हारा घाघरा भी बहुत अच्छा लगता है।”

“अच्छा कहो तो तुम्हारे लिए भी बनाकर दे दूँ।” इतना कहकर वह खिल खिलाकर हंसने लगी।

“अरे नहीं भाई मैं क्या करूंगा।”

शाम गहराने लगी थी। डेरे पर सभी के लौटने का समय हो रहा था। उसे लोगो के वापस आने तक डेरे पर लौट जाना था। उसने बताया कि अगले दिन उनका डेरा उठने वाला है। अब वह इस गांव में नहीं रहेंगे। यहां से कोई दस किलोमीटर दूर एक और गांव पड़ता है, वहां अपना डेरा डालेंगे। इतना सुनना था कि गौतम की खुशी का गुब्बारा धड़ाम से फट गया। वह मायूस हो गया।

उसको मायूस होता देख सुलक्छना ने कहा- “यह क्या, तुम मुँह ऐसे क्यूँ बना रहे हो।”

“अरे तुम चली जाओगी तो क्या मैं खुश रहूंगा।”

“ऐसा क्या मैंने कर दिया है कि तुम मुझे जाने को लेकर दुखी हो रहे हो।”

“तुम नहीं समझोगी।”

“क्यूँ नहीं समझूँगी। बताओ ना। क्या तुम भी हमें और लोगों जैसा ही समझते हो?”

“अरे नहीं ऐसा नहीं है। लेकिन छोड़ो ना जाने दो बात को।”

“ कल चली जाऊंगी, फिर कभी नहीं मिलूँगी इसलिए जो कहना हो कह दो।”

“इसी बात का तो दुख है।”

“किस बात का दुख है। ऐसा मैंने क्या कर दिया है?”

“जादू कर दिया है तुमने मुझ पर। लोग कहते हैं तुम पथरकट्टिने जादू करती हो। तुमने मेरे ऊपर जादू कर दिया है। देखो मैं तुम्हें भूल नहीं पा रहा हूं। मैं रोज तुम्हें देखने के लिए घर से चला आता हूं। तालाब की सीढ़ियो पर बैठा रहता हूं। किसी काम-धाम की कोई खबर नहीं रहती मुझे। यह जादू नहीं तो और क्या है?” मैंने झल्लाते हुए चिल्लाकर अपनी आवाज़ को दाँतो के नीचे दबाकर कहा।

“तुम भी ना, कैसी बातें करते हो। हम कोई जादू नहीं करती हैं। तुम ही लोगों को पता नहीं कैसे लगता है कि हम जादू करती हैं। मैंने तुम्हारे ऊपर कोई जादू नहीं किया है।”

“किया है ना जादू तुम्हारी इन खूबसूरत आंखों ने।”

“अरे यह भी कोई बात हुई। मेरी आंखों में ऐसा क्या है?”

“तुम्हारी आंखों में वशीकरण का तीर है। वह चलता है ना तो किसी के भी दिल को पार हो जाए। तुमको पता है यह वशीकरण क्या होता है। अरे तुम पढ़ती तो तुम्हें भी पता रहता। वह मुंशी जी की दुकान है ना किताबों की, वहां एक किताब है, जिस पर लिखा है कि, “स्त्री को अपने वश में कैसे करें।” उसी में वशीकरण मंत्र के बारे में लिखा है, लेकिन यहां तो मेरे साथ उल्टा हो रहा है। मैं तुम्हारे ही वशीकरण में आ गया हूं। मुझे तो हमेशा तुम ही दिखाई देती हो। ऐसा क्या हो गया है, मुझे भी नहीं पता।”

“तो कल से कैसे रहोगे?”

“कल से तुम्हारी यादों के भरोसे रहूंगा। तुम्हारी इन आंखों को देखकर जो पानी में फैल गई है। इन्हें ही देखता रहूंगा। मान लूंगा यह तालाब, तालाब नहीं, तुम्हारी आंखें हैं, इसी में मैं डूब जाऊंगा।”

“तुम बातें बहुत अच्छी करते हो।”

“बातें अच्छी नहीं करता हूं, बस दिल से निकल आता है।”

“अच्छा तो दिल का मामला है।”

“तुम्हें क्या लगता था?”

“मुझे तो लगता था कि बस तुम फिरकी ले रहे हो।”

“तुम्हें तो लगेगा ही। तुम्हें क्या है कल इस गांव, परसों उस गांव। तुम्हें हर जगह तो लड़के मिलते ही होंगे न। मुझे कहां मिलोगी तुम। मेरे लिए तो तुम एक ही हो।”

“अच्छा तो मैं हर गांव में जाकर लड़का देखती हूं।”

“अरे! मेरे कहने का यह मतलब नहीं था।”

“फिर तुम्हारे कहने का क्या मतलब था।”

“अरे मैं तो यह कह रहा था कि तुम्हें तो देखने वालों की कमी नहीं रहती होगी।”

“हाँ, सब घूरते ही तो रहते हैं कि कब पाये और कच्चा चबा जाए हमको। इतने सालों में एक तुम मिले जिसने मुझे एहसास कराया कि डेरे की दुनिया से बाहर भी कुछ अपने जैसे लोग होते हैं। अच्छा तो मैं अब जाऊं लेकिन उससे पहले एक बात कहना चाहती हूँ?”

“हाँ-हाँ कहो न, मैं तो तुम्हारी बातें ही सुनना चाहता हूँ।”

“तुम न पढ़कर सब कुछ करना लेकिन पुलिस मत बनना। यह पुलिस वाले हमारे पुरुखों को पहले चोर-उचक्का बताकर उठा ले जाते थे, अब हमें। अगर कुछ बनना तो इन पुलिस वालो और दुनिया वालो को बताना कि हम भी इंसान हैं, कोई चोर-उच्चके नहीं। न ही हम धंधा करती हैं और न ही जादू। ठीक है। करोगे न?

“हाँ-हाँ मैं करूँगा। जरूर करूँगा। मैं बताऊंगा दुनिया को कि तुमसे भी प्रेम किया जा सकता है, जैसे मेरी माँ करती है।

“ ठीक है। अब मैं चलती हूँ।”

इतना सुनना था कि मेरी निगाहें तालाब के बीच में उग आए उस पेड़ पर चली गईं, जिस पर बगुले बैठकर आराम कर रहे थे। निगाहें पेड़ पर ऐसे टिक गई जैसे किसी ने उसे बांध दिया हो। मैं अपनी निगाह उसकी तरफ नहीं कर पा रहा था। मेरा उतरा चेहरा देखकर लड़की ने कहा कि, “अरे मेरी तरफ तो देखो।”

“नहीं देखूंगा तुम जाओ।”

“अरे देख लो।”

उसने फिर कहा, “नहीं देखूंगा तुम चली जाओ।”

“अंतिम बार नहीं देखोगे मुझे?” उसने कातरता से कहा।

“क्यूँ अगले साल तुम नहीं आओगी?” मैंने नजरे नीचे किए जिज्ञासा भरी निगाहों से पूछा

“नहीं आऊंगी।”

“क्यूँ?”

“मेरी शादी दूसरे डेरे में हो रही है। अब मैं यहाँ नहीं आऊंगी। वह डेरा दक्खिन की तरफ़ जाता है।”

मैंने दोनों आँखे भीच ली। चेहरे पर रोने का भाव उतर आया। बड़ी मुश्किल से मैंने अंतिम बार उसकी तरफ़ प्रेम से देखने की कोशिश की लेकिन असफल रहा। ऐसा लगा किसी ने टनों का भार पुतलियों पर रख दिया है। उसने अपने कदम सीढ़ियो के ऊपर नहीं, मेरी तरफ बढ़ाये और मेरा चेहरा हाथों से अपनी आंखों की तरफ किया और एक थपकी गालों पर देते हुए वह अपने डेरे की तरफ चली गई। मैं बड़ी देर तक डूबते हुए सूरज को निहारता रहा।

ऐसा लग रहा था डूबते हुए सूरज के साथ मेरा दिल भी डूब रहा है। जैसे-जैसे सूरज डूबता गया, वैसे-वैसे मेरी निगाहें तालाब के पानी पर पसरती गईं। अगले दिन जब वह तालाब पर आया तो बाग में डेरे का नामोनिशान नहीं था। वहां बस था तो पथरकट्टो के द्वारा छोड़ दी गई कुछ निशानियां। उन निशानियों में मैं सुलक्छना की निशानी ढूंढता रहा लेकिन कुछ नहीं मिला। मैं तालाब के किनारे घंटों बैठा रहा। देखता रहा तालाब के पानी को। मगर कितने दिन तक? धीरे-धीरे उसका देखना कम होता गया और लेकिन याद रह गया कि कभी किसी लड़की को मैंने इस तालाब के किनारे भरी निगाहों से देखा था।

……

कूड़ा बीनने वाली वह लड़की जा चुकी थी और मेरे मन के कोने में एक मुस्कान उभर आई थी, जिसे बचाकर मैं कमरे की ओर चल दिया।

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गोविंद निषाद
नाम- गोविंद निषाद शोध छात्र, जी बी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान इलाहाबाद तद्भव, समालोचन, वनमाली कथा, समय के साखी, हिंदवी बेला, सम्मुख, बनास जन आदि पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित।

3 COMMENTS

  1. बहुत ही सुंदर प्रेम कहानी । लेखक को बधाई।

  2. आपकी कहानी में प्रेम के साथ साथ घुमन्तु समुदाय के जीवन का यथार्थ भी प्रस्तुत करती है पढ़ते समय ऐसा भी महसूस हुआ कि जैसे ये ‘राही’ का अगला भाग हो और ये राही की बेटी तो नहीं।

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