Home कला-संस्कृति चिठिया हो तो हर कोई बांचे

चिठिया हो तो हर कोई बांचे

साहित्य के इतिहास में कुछ पत्र ऐसे होते हैं, जो अपने समय से आगे जाकर विचार की स्थायी विरासत बन जाते हैं। जॉन कीट्स का 21 दिसंबर 1817 का लिखा यह पत्र, जिसमें वे ‘Negative Capability’ की अवधारणा रखते हैं, केवल कविता ही नहीं, मनुष्य की बौद्धिक और भावनात्मक स्वतंत्रता का भी गहरा बयान है।
वहीं जॉर्ज कीट्स के उत्तर के साथ यह संवाद अनिश्चितताओं को स्वीकार करने और स्थिरता की मानवीय जरूरत के बीच एक अर्थपूर्ण संतुलन रचता है।

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chithiyan

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पत्र: 21 दिसंबर 1817

“प्रिय जॉर्ज और टॉम,

कल शाम मैं डिल्के के साथ था और हम साहित्य तथा मनुष्य की प्रकृति पर चर्चा कर रहे थे। उसी दौरान मुझे एक विचार आया, जो मुझे लगता है कि किसी महान व्यक्ति, विशेषकर एक महान कवि, के गुण को परिभाषित करता है।

मैं उसे ‘Negative Capability’ कहता हूँ अर्थात वह क्षमता, जिसमें मनुष्य अनिश्चितताओं, रहस्यों और संदेहों के बीच बिना किसी चिड़चिड़ेपन या तर्क के आग्रह के रह सके।

मुझे लगता है कि शेक्सपीयर में यह गुण अत्यधिक था। वे किसी निश्चित निष्कर्ष की तलाश में नहीं रहते थे, बल्कि जीवन को उसकी संपूर्ण जटिलता में स्वीकार करते थे।

इसके विपरीत, कोलरिज जैसे व्यक्ति इस क्षमता से वंचित थे। वे हर चीज़ को एक दार्शनिक निष्कर्ष तक पहुँचाना चाहते थे।

मुझे विश्वास है कि एक सच्चे कवि के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने ‘स्व’ को मिटा सके और वस्तुओं में विलीन हो सके।

— तुम्हारा स्नेही,

जॉन”

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“प्रिय जॉन,

तुम्हारा पत्र मिला और तुम्हारे विचार पढ़कर बहुत प्रसन्नता हुई। तुम्हारी ‘Negative Capability’ की अवधारणा अत्यंत रोचक है।

मुझे लगता है कि यह न केवल कविता, बल्कि जीवन के लिए भी आवश्यक है—क्योंकि हम हर चीज़ को पूरी तरह समझ नहीं सकते।

फिर भी, मुझे यह भी लगता है कि कुछ निश्चित आधार और विश्वास भी आवश्यक होते हैं, जिन पर मनुष्य टिक सके।

तुम्हारे विचारों ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर विवश किया है।

— तुम्हारा,

जॉर्ज”

संदर्भ स्त्रोत-
Letters of John Keats, संपादक: Hyder Edward Rollins
Harvard University Press
British Library (मूल पांडुलिपि अभिलेख)

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कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।

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