नई दिल्ली: भारत में मानसून को खेती-किसानी की जीवनरेखा माना जाता है। लेकिन जून 2026 की तस्वीर चिंता बढ़ाने वाली है। दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत में दाखिर हो चुका है लेकिन शुरुआती कुछ दिन अपना असर दिखाने के बाद अब इसकी रफ्तार थम गई है। नतीजा यह हुआ कि 126 वर्षों (1901 से लेकर अब तक) के रिकॉर्ड में यह जून सबसे सूखे महीनों में शामिल हो गया। इसके पीछे अल नीनो का असर है, जो लगातार मजबूत हो रहा है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ मानसून की कमजोर शुरुआत भर है या भारत एक बड़े जल संकट और सूखे की तरफ भी बढ़ रहा है?
126 साल में दूसरा सबसे सूखा जून
इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार 21 जून 2026 तक देश में औसतन केवल 46 मिमी बारिश दर्ज हुई, जबकि सामान्य तौर पर इस अवधि तक 84.4 मिमी वर्षा हो जाती है। यानी करीब 43-46% बारिश की कमी। इस बीच 22 जून को मानसून की रफ्तार भले लौटने के भी संकेत आए हैं। वहीं, समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट अनुसार भारत में 21 जून तक बारिश सामान्य से 42.2% कम रही है।
मौसम के इस उठापटक के पीछे अल-नीनो का असर है। इस साल का अल नीनो 2015, 1997 और 1982 जैसे बड़े अल नीनो वर्षों की तुलना में शुरुआती चरण में ही ज्यादा ताकतवर दिखाई दे रहा है। अगर मौजूदा रुझान जारी रहे, तो यह अल नीनो रिकॉर्ड बुक दोबारा लिखने पर मजबूर करेगा।
1901 के बाद भारत में कब-कब पड़ा बड़ा सूखा?
भारतीय मौसम विभाग (IMD) और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार 1901 के बाद भारत ने 26 छोटे-बड़े सूखे देखे हैं। हालांकि इनमें प्रमुख वर्ष रहे-
1918
1965
1972
1987
2002
2009
इनमें 1918 को 20वीं सदी के सबसे भीषण सूखों में गिना जाता है। 1965-66 के सूखे ने खाद्यान्न संकट खड़ा कर दिया था। 1972 में महाराष्ट्र बुरी तरह प्रभावित हुआ था। 1987 का सूखा देश के लगभग आधे हिस्से तक फैल नजर आया था। 2002 में मानसूनी बारिश करीब 19% कम रही थी और कृषि उत्पादन पर बड़ा असर पड़ा था। ऐसे ही 2009 में कमजोर मानसून ने खाद्य महंगाई बढ़ा दी थी। इसमें 2015 का भी साल शामिल कर सकते हैं जब अल नीनो के कारण बारिश प्रभावित हुई थी।
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सूखे की ओर बढ़ रहा भारत…खेती पर कितना बड़ा खतरा?
भारत की लगभग आधी कृषि भूमि अब भी बारिश पर निर्भर है। मानसून देश की सालाना वर्षा का करीब 70% हिस्सा देता है। अगर बारिश की कमी लंबे समय तक बनी रहती है, तो खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित हो सकती है। धान, दालें, सोयाबीन, मक्का, बाजरा और कपास जैसी फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं। बुआई टालनी पड़ सकती है। बीजों के खराब होने और उत्पादन घटने का जोखिम भी बढ़ जाता है। वैसे भी जून खत्म होने में कुछ दिन रह गए हैं और इस समय तक खरीफ फसलों की बुआई शुरू हो जाती है, लेकिन मौसम की मार ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
मौजूदा स्थिति को देखते हुए क्या कहा जा सकता है कि भारत बड़े सूखे की ओर बढ़ रहा है? फिलहाल इसका जवाब निश्चित नहीं है। असर तो होगा, लेकिन कितना बड़ा…ये अभी देखना होगा। साथ ही कमजोर मानसून का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता। जलाशय, बांध, भूजल और पेयजल आपूर्ति भी प्रभावित होती है। जाहिर है असर रबी फसलों पर भी दिख सकता है।
क्या राहत की उम्मीद है?
अच्छी खबर यह है कि मानसून ने दो सप्ताह की सुस्ती के बाद दोबारा गति पकड़नी शुरू कर दी है। सोमवार (22 जून) की रिपोर्टों के मुताबिक, मानसून महाराष्ट्र, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक के अतिरिक्त हिस्सों में आगे बढ़ चुका है। मौसम विभाग का कहना है कि अगले कुछ दिनों में मध्य भारत में बारिश बढ़ सकती है। मुंबई और पश्चिमी तट पर भी अच्छी वर्षा की संभावना जताई गई है।
IMD का अनुमान है कि जून-सितंबर के पूरे मानसून सीजन में देश को दीर्घकालिक औसत का करीब 90% वर्षा मिल सकती है। यानी पूरा मानसून सामान्य से कम रहने की आशंका बनी हुई है। हालांकि विभाग का मानना है कि जून की शुरुआती कमी का कुछ हिस्सा जुलाई में पूरी हो सकता है।
वैसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि बारिश होगी या नहीं, बल्कि यह है कि वह कितनी समान रूप से होगी। यदि लंबे सूखे अंतराल के बाद अचानक भारी बारिश होती है, तो भी बाढ़ और जलभराव का खतरा बढ़ेगा, जबकि खेती को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाएगा।



