अल नीनो के असर और दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी शुरुआत ने भारत में किसानों की चिंता बढ़ा दी है। जून के आखिर तक देश के बड़े हिस्से में सामान्य से काफी कम बारिश होने के कारण खेतों में खरीफ फसलों बुआई की रफ्तार सुस्त पड़ गई है। यह अब सरकारी आंकड़ों में भी दिखने लगा है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार 25 जून तक देश में खरीफ फसलों की बुआई पिछले साल की तुलना में लगभग 23 प्रतिशत कम रही है।
ऐसे में यदि जुलाई में भी मानसून की स्थिति तेजी से नहीं सुधरी तो इसका असर केवल खरीफ उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा। माना जा रहा है कि इससे खाद्य महंगाई, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और अगले रबी सीजन पर भी फर्क दिखाई दे सकता है।
सबसे बड़ा असर धान, दलहन और तिलहन पर
आंकड़ों के अनुसार 25 जून तक देश में खरीफ फसलों की कुल बुआई 182.72 लाख हेक्टेयर रही, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 236.46 लाख हेक्टेयर थी। यानी लगभग 53.74 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में बुआई हो सकी। इसकी सबसे बड़ी वजह जून में बारिश का सामान्य से काफी कम रहना और खेतों में पर्याप्त नमी का न बन पाना माना जा रहा है, जिससे किसानों ने बुआई टाल दी।
सबसे ज्यादा चिंता धान की है, क्योंकि यह भारत की सबसे महत्वपूर्ण खरीफ फसल है। धान की बुआई करीब 25 प्रतिशत घटकर 25.75 लाख हेक्टेयर रह गई है। दलहन की बुआई में भी 30 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है और अरहर, उड़द तथा मूंग जैसी फसलों की बोनी पिछले साल की तुलना में काफी पीछे चल रही है। सबसे बड़ी गिरावट तिलहन की बुआई में दर्ज की गई है। तिलहन का रकबा पिछले साल के 36.41 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.99 लाख हेक्टेयर रह गया है, यानी करीब 53.3 प्रतिशत की कमी आई है।
सोयाबीन की बुआई में 65 प्रतिशत से अधिक और मूंगफली की बुआई में 42 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। कपास की खेती भी करीब 35 प्रतिशत पीछे चल रही है। केवल गन्ना ऐसा प्रमुख कृषि क्षेत्र है, जहां रकबे में मामूली बढ़ोतरी देखने को मिली है।
315 जिलों में सामान्य से कम बारिश, अनाज भंडार कितना है?
कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए सरकार ने देश में करीब 315 ऐसे जिलों की पहचान की है, जहां सामान्य से कम वर्षा की संभावना है। इनमें मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्य शामिल हैं। इन जिलों में बड़ी आबादी की खेती अब भी मानसून पर निर्भर है और सिंचाई का दायरा सीमित है।
हालांकि उत्पादन को लेकर बढ़ती चिंता के बीच देश का मौजूदा खाद्यान्न भंडार का रिकॉर्ड एक बड़ी राहत है। आंकड़े बताते हैं कि सरकारी गोदामों में एक जून तक चावल का भंडार 6.843 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है, जो सरकार के निर्धारित बफर टार्गेट से कई गुना अधिक है। गेहूं का भंडार भी 5.341 करोड़ टन पर पहुंच गया है, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक है और तय लक्ष्य का लगभग दोगुना है। पिछले कृषि वर्ष में चावल और गेहूं दोनों का रिकॉर्ड उत्पादन सहित बेहतर सरकारी खरीद इसकी बड़ी वजह मानी जा रही है।
पिछले साल की अच्छी खेती की वजह से धान की बुआई फिलहाल धीमी रहने के बावजूद विशेषज्ञ तत्काल खाद्य सुरक्षा संकट की आशंका नहीं जता रहे। पर्याप्त भंडार से सरकार के पास घरेलू आपूर्ति बनाए रखने और जरूरत पड़ने पर बाजार में अतिरिक्त अनाज उतारकर कीमतों को नियंत्रित करने की क्षमता है। हालांकि यह राहत मुख्य रूप से चावल और गेहूं तक सीमित है। यदि दलहन और तिलहन की बुआई लंबे समय तक प्रभावित रहती है तो खाद्य तेल और दालों की उपलब्धता सहित कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
क्या रबी की फसल भी होगी प्रभावित?
अल नीनो का असर केवल खरीफ तक सीमित रहने की आशंका नहीं है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अल नीनो अगले दो-तीन महीने और मजबूत बना रहा तो सर्दियों का मौसम भी अपेक्षाकृत गर्म रह सकता है। ऐसी स्थिति में गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलों के उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
कमजोर मानसून के कारण मिट्टी में नमी कम रहने और जलाशयों में पानी घटने का असर सिंचाई पर पड़ेगा, जिससे रबी की खेती की परिस्थितियां प्रभावित हो सकती हैं। इससे ग्रामीण आय, खाद्य महंगाई, उपभोक्ता मांग और समूचे आर्थिक गतिविधियों पर भी दबाव बढ़ेगा। भारत वैश्विक कृषि बाजार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इसलिए घरेलू उत्पादन में कमी का असर अंतरराष्ट्रीय खाद्य कीमतों पर भी दिख सकता है।
सामने बड़ी मुश्किलें…सरकार क्या तैयारी कर रही
संभावित जोखिम को देखते हुए केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर बहु-स्तरीय तैयारी शुरू कर दी है। सरकार ने बताया है कि 315 जिलों के लिए जिला कृषि आकस्मिकता योजनाएं तैयार की गई हैं। कम अवधि और कम पानी में तैयार होने वाली फसलों जैसे दलहन, तिलहन और मोटे अनाज की खेती पर जोर देने, वैकल्पिक फसल प्रणाली अपनाने और अतिरिक्त बीज भंडार उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है।
इसके अलावा किसानों को कृषि विज्ञान केंद्रों, मौसम आधारित सलाह, एसएमएस, व्हाट्सऐप और अन्य माध्यमों से लगातार वैज्ञानिक सलाह देने की व्यवस्था करने भी बात सरकार कह रही है। साथ ही उर्वरकों की उपलब्धता, पशुओं के लिए चारे की तैयारी, फसल बीमा, किसान क्रेडिट कार्ड और अन्य सहायता योजनाओं के जरिए भी किसानों को राहत पहुंचाने को लेकर सक्रियता से काम करने की बात सरकार ने कही है।
फिलहाल मौसम वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि जुलाई के पहले सप्ताह में मानसून की गतिविधियां तेज हो सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो किसान तेजी से बुआई पूरी कर सकते हैं और मौजूदा अंतर काफी हद तक कम हो सकता है। लेकिन यदि बारिश का संकट लंबा खिंचता है, तो मुश्किलें बढ़ेंगी।
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