वैसे तो ‘गुमराह’ एक सामान्य सी फिल्म होती- पति-पत्नी और प्रेमी के त्रिकोण में फंसी सैकड़ों हिंदी फिल्मों की तरह एक और फिल्म- लेकिन एक गीत इस फिल्म को मेरे लिए लगभग अविस्मरणीय बना डालता है। यह साहिर लुधियानवी का लिखा हुआ गीत है- ‘चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों।’
हालांकि यह सच है कि साहिर ने यह गीत इस फिल्म के लिए नहीं लिखा था। यह चालीस के दशक में प्रकाशित उनके पहले संग्रह ‘तल्ख़ियां’ में शामिल था। साहिर हिंदी सिनेमा के शायद ऐसे अकेले गीतकार थे जो गीत पहले लिखते थे, उसकी धुन बाद में बनाई जाती थी। वरना चलन यह है कि पहले संगीत तैयार हो जाता है और फिर उसकी धुन पर गीत लिखे जाते हैं। साहिर ने दूसरा काम यह भी किया था कि अपनी कई नज़्मों या ग़ज़लों को किन्हीं फिल्मों में इस्तेमाल के लिए दे दिया था। फिल्म ‘कभी-कभी’ का मशहूर गीत ‘कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है’ भी तल्ख़ियां से ही लिया गया था। हालांकि साहिर ने फिल्म के लिहाज से अपनी इस नज़्म के बोल कुछ आसान कर दिए थे। फिल्म के गीत में पूरी नज़्म का इस्तेमाल भी नहीं था।
मगर ‘चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों’ में ऐसा नहीं था। यह नज़्म जिस तरह किताब में शामिल थी, उसी तरह फिल्म में भी शामिल की गई। कई मामलों में यह अनूठा गीत है। गीत पर आने से पहले फिल्म का थोड़ा सा ज़िक्र ज़रूरी है। 1963 में बीआर चोपड़ा के निर्देशन में बनी इस फिल्म के मुख्य कलाकार अशोक कुमार, सुनील दत्त और माला सिन्हा हैं। सुनील दत्त गायक बने हैं जिनसे माला सिन्हा प्रेम करती है। माला सिन्हा की बड़ी बहन अशोक कुमार की पत्नी है। लेकिन बड़ी बहन के देहांत के बाद माला सिन्हा को अपना प्रेम भूल अशोक कुमार से शादी करनी पड़ती है- आख़िर उनके बच्चों की देखभाल का सवाल है जिन्हें किसी सौतेली मां के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
अब यह जो त्रिकोण बनता है- पति-पत्नी और एक छूटे हुए प्रेमी का- कहानी उसके बीच बढ़ती है। मुश्किल यह है कि प्रेम छूटने को तैयार नहीं है। तो ऐसे हालात बनते हैं कि सुनील दत्त अशोक कुमार के घर आते हैं। इसके बाद उस घर में ये तीनों हैं, पियानो है और महेंद्र कपूर की आवाज के साथ रवि के संगीत में सजा साहिर लुधियानवी का एक गीत है।
अमूमन कई गीत बहुत अच्छे होते हैं, लेकिन उनका फिल्मांकन बहुत बुरा होता है। इत्तिफ़ाक़ से इस गीत के साथ ऐसा नहीं है। अशोक कुमार ने पियानो का कवर ऊपर किया है, वह सिगार फूंक रहे हैं, सुनील दत्त को देखकर मुस्कुराते हैं, और पियानो पर उंगलियां थिरकाते हुए सुनील दत्त गा रहे हैं- चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों…। पियानो के दूसरी तरफ़ खड़ी माला सिन्हा जैसे एकटक सुनील दत्त को देखे जा रही हैं। उनकी आंखों में शिकायत भी है और दर्द भी। अशोक कुमार को यह ख़बर नहीं है कि यह गीत उनकी पत्नी के लिए गाया जा रहा है।
गीत आगे बढ़ता है- ‘न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूं दिलनवाज़ी की, न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लतअंदाज़ नज़रों से।‘ अचानक हम पाते हैं कि पूरे स्क्रीन पर दिख रहे सुनील दत्त पर फिर दो आंखें टिक गई हैं- इस बार उनमें शिकायत से ज़्यादा कोमलता है। यहां एक बात और साफ़ कर दूं। सुनील दत्त मुझे कभी बहुत भावप्रवण अभिनेता नहीं लगे। इस फिल्म में लेकिन उनकी आंखें कुछ कहती सी मालूम होती हैं। इनमें शिकायत नहीं है, बेफ़िक्री भी नहीं है, एक तरह की बेख़ुदी है- कुछ गवां चुकने के एहसास के बाद खुद को खो देने का वीतरागी सा अंदाज़ जिसने एक मुस्कुराता चेहरा पहन लिया है। सुनील दत्त आगे गा रहे हैं- ‘न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों में / न ज़ाहिर हो तुम्हारी कशमकश का राज़ नज़रों से।‘ यहां अब कैमरा माला सिन्हा को देख रहा है जो दो-एक क़दम चल रही हैं- कैमरा उनसे ज़्यादा तेज़ चल रहा है। वह फिर अशोक कुमार और सुनील दत्त को फ्रेम में ले लेता है। फिर इस फ्रेम में माला सिन्हा भी धीरे से दाख़िल होती हैं- इस बार उनकी आंखों में यह अंदेशा दिख रहा है कि उनका उलझा हुआ रिश्ता अशोक कुमार की पकड़ में तो नहीं आ गया। चलो इक बार फिर से अजनबी बनने की इस गुज़ारिश में फिलहाल अशोक कुमार दोनों के बीच खड़े हैं।
लेकिन गीत धीरे-धीरे हालात को शायद खोल रहा है। पियानो पर सुनील दत्त की थिरकती उंगलियों और संगीत के बीच अशोक कुमार को पहली बार कुछ एहसास हो रहा है। गीत आगे बढ़ता है- ‘तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशक़दमी से..’ अशोक कुमार अपने होंठों से सिगार हटाते हैं। माला सिन्हा दो क़दम बढ़ती हुई उनके कंधों पर अपना सिर टिकाती है। वे उसे कुछ अचरज से देखते हैं। गीत चल रहा है- ‘मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराये हैं।‘ माला सिन्हा सहसा अशोक कुमार के कंधे से सिर हटा कर दूसरी ओर देख रही है, अशोक कुमार उलझन में एक बार उसे देखते हैं और एक बार सुनील दत्त को। गीत अब कुछ और भी बता रहा है- ‘मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माजी की, तुम्हारे साथ भी बीती हुई रातों के साये हैं।‘ यहां से फिर अजनबी बनने की तीसरी टेक शुरू होती है और माला सिन्हा की बड़ी-बड़ी आंखें परदे पर शिकायत, दर्द और मायूसी सब जताती हुई दिखाई पड़ती है। अशोक कुमार ख़ुद में कुछ सोचते दिखाई पड़ते हैं और उनका सिगार ढेर सारा धुआं उगलता है।
अब आख़िरी अंतरा है और कैमरा जैसे अशोक कुमार को भूल बैठा है। या अशोक कुमार कुछ दूर छिटक गए हैं। सुनील दत्त महेंद्र कपूर की उठान लेती आवाज़ में गा रहे हैं- ‘तआर्रुफ़ रोग बन जाए तो उसको भूलना बेहतर, ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको छोड़ना अच्छा।‘ सुनील दत्त की आंखें कुछ भरी हुई दीखती हैं, माला सिन्हा अपनी आंखें एक लम्हे को मूंदती हैं. फिर धीरे-धीरे जीने की ओर बढ़ती हैं। गीत जारी है- ‘वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे इस ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।‘ अब दोनों पियानो के पास बिल्कुल आमने-सामने एक-दूसरे को देख रहे हैं। गाने के बिल्कुल आख़िरी फ्रेम में अशोक कुमार कुछ पीछे जीने के पास इन दोनों को देखते दिखाई पड़ते हैं।
साठ के दशक में ऐसी फिल्मों में प्रेम नहीं, दांपत्य जीतता था। तो इसमें भी जीतता है। माला सिन्हा अपनी पहचान भूलने को तैयार है। वह मिसेज़ अशोक बन कर खुश है। इस लिहाज से यह एक भावुक, मेलोड्रामैटिक अच्छी फिल्म थी जो ख़ूब चली। लेकिन सच यह है कि मेरे लिए इस फिल्म का मोल इस गीत में है।
और यह गीत जितना दृश्य में है, उससे ज़्यादा बाहर है। दरअसल यह साहिर लुधियानवी की मास्टरी की एक और मिसाल भर है। साहिर ने अपनी नज़्मों-ग़ज़लों और अपने गीतों से जैसे रिश्तों का व्याकरण नए सिरे से लिखा है। यह गीत भी संवेदना का एक नया छोर छूता है। रिश्तों में प्रेम, बेवफ़ाई, छल, शिकायत, प्रतिशोध- सब पहले से चले आ रहे थे, साहिर ने वह गांठ खोली जो ज़िंदगी के ज़ख़्मों को हमेशा हरा बनाए रखती थी। साहिर ने बताया कि किसी मजबूरी में प्रेम छूटता लगे, रिश्ता टूटता लगे तो एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर ही ख़त्म करना चाहिए। जीवन के ज़्यादातर अफ़साने हम अधूरा छोड़ जाते हैं। हमें पता भी नहीं होता कि वह खूबसूरत मोड़ कौन सा है जहां लाकर यह रिश्ता छोड़ा जाए?
बरसों बाद मनोहर श्याम जोशी ने अपने उपन्यास कुरु-कुरु स्वाहा में इसी गीत के इस खूबसूरत मोड़ को अपनी तरह से समझने की कोशिश की थी। लेकिन प्रेम में वापसी संभव है, कुछ चीज़ों को भूला जा सकता है या उनकी कसक अपने दिल में रखी जा सकती है, अपने प्रेम को बिना कुछ कहे ससम्मान विदा किया जा सकता है- यह खयाल किसी नज़्म, किसी ग़ज़ल, किसी गीत में इस ख़ूबसूरती के साथ पहले शायद कभी नहीं आया था। हिंदी की छायावादी कविता में भी प्रेम और प्रतीक्षा के सूक्ष्म और मादक रूप हैं, लेकिन इतने स्पष्ट संकेतों के साथ वहां भी यह नहीं कहा गया कि अधूरे छूटे रिश्तों का कोई ख़ूबसूरत मोड़ हो सकता है। ग़ालिब और मीर के सैकड़ों शेर हैं जिनमें इश्क़ की नाकामी, रुसवाई और ज़िद सबका ज़िक्र है, मगर उनके यहां भी यह शराफ़त नहीं मिलती, यह सलीका नहीं दीखता कि वे किसी रिश्ते को बीच में इस ख़ूबसूरत ढंग से छोड़ देने की बात कर रहे हों।
बेशक, यह आसान नहीं होता। जिसके कभी सबकुछ होने की उम्मीद रही हो, उससे बिल्कुल कोई उम्मीद न रखना, उसे न पहचानना, अपनी आंखों में अजनबीयत का भाव भरे रहना- इन सबके लिए ख़ुद को कुछ होम भी करना पड़ता है। हमारे समाज में यह होता भी है। लेकिन साहिर की शायरी इस कशमकश को जो मुक़ाम देती है, उसका कोई जवाब नहीं।
साहिर दरअसल निजी दुख से सार्वजनिक सबक निकालने वाले उस्ताद शायर हैं। इस गीत के भी पहले दो अंतरे निजी रिश्तों का बयान हैं- एक आपसी संवाद कि हम ज़माने से सबकुछ छुपाए रखेंगे। लेकिन तीसरे अंतरे तक आते-आते साहिर उसे बिल्कुल एक सार्वजनीन और सार्वकालिक वक्तव्य में बदल देते हैं- तआल्लुक और तआर्रुफ़ को बोझ और रोग बनने से पहले भूल जाना चाहिए, छोड़ देना चाहिए। रिश्तों की जिन कहानियों को हम किसी मुक़ाम तक नहीं पहुंचा सकते, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देना चाहिए। साहिर ने हमें यह बताया कि किसी मजबूरी में प्रेम छूटता लगे, रिश्ता टूटता लगे तो एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर ही ख़त्म करना चाहिए… यहां दिलचस्प यह है कि यहां प्रेम असफल तो होता है, लेकिन अपने असफल होने की कीमत दूसरे से नहीं वसूलता।
दरअसल यह रिश्तों को नई निगाह से देखने का काम था जिसके लिए साहिर ने एक कमाल की भाषा चुन ली। फिर कहने की ज़रूरत है कि इस गीत का जितना जादू इसके फिल्मांकन में है- जो शायद उतना ज़्यादा भी नहीं है- उससे ज़्यादा इसके शब्दों में, इसके मानी में है। यही वजह है कि अपने लिखे और गाए जाने के आधी सदी बाद भी यह गीत जब भी बजता है, इसे चुपचाप सुनते रहने की इच्छा होती है। इस इच्छा का वास्ता शायद हमारे समय की इस सच्चाई से भी है कि हम रिश्तों को अधिकार और प्राप्ति के आग्रह से इतना बांध देते हैं कि उसके लिए किसी भी मुकाम तक जाने को तैयार रहते हैं। प्रेम हत्या में बदल जाता है, नई उम्मीदों के पहाड़ पर अचानक एक खाई आती है जिसमें ऐसा रिश्ता धकेल दिया जाता है। जबकि यह बिछड़ने का गीत है, लेकिन इसमें न कोई बद्दुआ है, न कोई शिकायत का शोर, न प्रेम पर मालिकाना हक़ का कोई दावा। इसी वजह से यह गीत आज भी अलग सुनाई देता है। रिश्तों के इस नामुमकिन लगते समय में साहिर का यह गीत एक फाहे की तरह है जो कहता है, ज़िंदगी में ख़ूबसूरत मोड़ आते हैं, आने चाहिए, नहीं तो बनाने चाहिए- अफ़साने अधूरे भी छोड़ दिए जाने चाहिए, यह अधूरापन ही उनकी संपूर्णता भी है।
अंत में एक भूली सी याद की तरह एक बात और। आख़िर यह नज़्म साहिर को सूझी कैसे, उन्होंने लिखी क्यों? क्या यह अमृता प्रीतम के साथ अपने रिश्ते को किसी मोड़ तक पहुंचा न पाने की कसक से पैदा हुई नज़्म थी? अमृता ने बार-बार साहिर से अपनी मोहब्बत का ज़िक्र किया है, लेकिन साहिर ने कभी इस बारे में ज़ुबान नहीं खोली। तारीख़ भी नज़्म से इस रिश्ते का वास्ता होने की कोई गवाही नहीं देती। कहते हैं कि साहिर और अमृता की पहली मुलाकात 1944 में हुई थी। जबकि साहिर का पहला कविता संग्रह ‘तल्ख़ियां’ 1945 में छप कर आ गया था। ऊपरी तौर पर इस ख़ूबसूरत इत्तिफ़ाक़ के घटने के आसार बहुत कम दिखते हैं कि साहिर ने अमृता की मोहब्बत को एक ही बार में महसूस भी कर लिया होगा, उन्हें ये एहसास भी हो गया कि ये वो अफ़साना है जिसे अधूरा छोड़ना होगा और इसके लिए उनहोंने एक ख़ूबसूरत मोड़ की कल्पना कर ली और यह नज़्म लिख डाली। लेकिन प्रेम में हर असंभव भी संभव है। अमृता के पहले से शादीशुदा होने ने शायद उनके भीतर इस अहसास को और उनकी इस रिश्ते की मार्फत चुप्पी को भी जन्म दिया हो।
बहरहाल, यह नज़्म अचानक साहिर और अमृता के रिश्ते का भी जैसे सच बयान करती है। दरअसल टूटे हुए दिलों, बिखरी हुई दुनिया और गड्डमड्ड रिश्तों के संसार में जब भी किसी को कोई कशमकश घेरती है, जब भी कोई अपना छूटता है तो यह गीत याद आ ही जाता है- ‘वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।’
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