सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर पाकिस्तान की बौखलाहट बढ़ती जा रही है। इसी बीच पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक (Musadik Malik) ने भारत को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर किसी ने पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर दावा करने या उसे रोकने की कोशिश की, तो हम उन हाथों को काट देंगे।
गौरतलब है कि पिछले साल पहलगाम में आतंकवादी हमले के बाद भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने संप्रभु अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया था। भारत का साफ कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह और विश्वसनीय तरीके से बंद नहीं करता, तब तक यह संधि स्थगित रहेगी।
सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता में मुसादिक मलिक ने आरोप लगाया कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। मंत्री ने कहा कि पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री के हाथ में एक नल है और वह कहते हैं कि पाकिस्तान की ओर पानी की एक बूंद भी नहीं जाने देंगे। मुसादिक यहीं नहीं रुके। उन्होंने सीधे सैन्य और आक्रामक लहजे में चेतावनी देते हुए कहा कि जो हमारे हिस्से के पानी पर हाथ डालेगा, हम उसका हाथ काट देंगे।
मलिक ने दावा किया कि पाकिस्तान पहले भी अपने अधिकारों की रक्षा करता रहा है और भविष्य में भी अपने हिस्से के पानी की सुरक्षा के लिए हरसंभव कदम उठाएगा। हालांकि, उनके इस बयान के वीडियो सोशल मीडिया और पाकिस्तानी मीडिया में प्रसारित हुए हैं, लेकिन उनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
सिंधु जल संधि से पाकिस्तान में संकट?
मुसादिक मलिक ने कहा कि पाकिस्तान की 40 से 50 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। ऐसे में यदि पानी का प्रवाह बाधित होता है तो इसका सीधा असर देश की खाद्य सुरक्षा, रोजगार और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
मुसादिक ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह तय होना चाहिए कि क्या किसी ऊपरी धारा वाले देश को निचले हिस्से के देश का पानी रोकने का अधिकार है। उनका कहना था कि सिंधु जल संधि मौजूद है और पाकिस्तान इसी कानूनी आधार पर अपना पक्ष रखेगा।
प्रेस वार्ता में पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने कहा कि सिंधु जल संधि आज भी पूरी तरह प्रभावी है और इसे कोई भी पक्ष एकतरफा निलंबित, समाप्त या संशोधित नहीं कर सकता। उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान के कानूनी तर्कों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिल रहा है और भारत का संधि को स्थगित करने का फैसला किसी वैश्विक मंच पर स्वीकार नहीं किया गया है।
तरार ने कहा कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि पानी हमारी जीवनरेखा भी है और हमारी लाल रेखा भी। उन्होंने यह भी घोषणा की कि इस्लामाबाद में सिंधु जल संधि पर पहला अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जा रहा है, जिसमें कानूनी विशेषज्ञ, जल विशेषज्ञ और विभिन्न देशों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। इस सम्मेलन में संधि के तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर चर्चा होगी।
इससे पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी कह चुके हैं कि यदि पाकिस्तान की जल सुरक्षा को खतरा हुआ तो उनका देश सैन्य कार्रवाई करने से भी पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने एक पाकिस्तानी टीवी चैनल से कहा था कि पानी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है और यदि उस पर खतरा आया तो पाकिस्तान युद्ध का विकल्प भी अपनाएगा।
भारत का क्या है रुख?
भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने के अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि 1960 में बनी यह संधि आज की सुरक्षा चुनौतियों और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप नहीं रह गई है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 62वें सत्र में भारत की प्रथम सचिव अनुपमा सिंह ने कहा था कि यह तर्कसंगत नहीं है कि जो देश आतंकवाद को अपनी नीति का साधन बनाता है, वह सद्भावना और सहयोग पर आधारित संधि के लाभों की अपेक्षा करता रहे।
उन्होंने कहा कि 1960 में हुई किसी संधि को ऐसा स्थायी अधिकार नहीं माना जा सकता, जिसे बीते छह दशकों में आए भू-राजनीतिक, सुरक्षा और वैश्विक परिवर्तनों से पूरी तरह अलग रखा जाए।
भारत ने हाल ही में फिर दोहराया कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और रहेगा। साथ ही उसने पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल आतंकवाद और अपने घरेलू मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए करता है।
भारत ने पिछले महीने सिंधु जल संधि के तहत कथित रूप से गठित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले को भी पूरी तरह खारिज कर दिया था। विदेश मंत्रालय ने कहा था कि 15 मई 2026 को इस तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय ने संधि की व्याख्या और जलाशयों की अधिकतम भंडारण क्षमता से जुड़े मामले में जो फैसला दिया, वह शून्य, अवैध और कानूनी रूप से अमान्य है।
भारत ने दो टूक कहा कि उसने कभी भी इस न्यायाधिकरण के गठन को मान्यता नहीं दी। इसलिए उसकी कोई भी कार्यवाही, आदेश या फैसला भारत के लिए बाध्यकारी नहीं है। विदेश मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि संधि स्थगित रहने की अवधि में भारत उस संधि के तहत किसी भी दायित्व का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है और किसी भी तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय को भारत के संप्रभु निर्णयों की समीक्षा करने का अधिकार नहीं है।
भारत इससे पहले जम्मू-कश्मीर की किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े मामलों में भी कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन की कार्यवाही को अस्वीकार कर चुका है। भारत का कहना है कि यह पूरी मध्यस्थता प्रक्रिया ही सिंधु जल संधि की मूल भावना और विवाद समाधान तंत्र का उल्लंघन करती है। भारत का आरोप है कि पाकिस्तान बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों का सहारा लेकर अपनी जवाबदेही से बचने की कोशिश करता है और यह तथाकथित मध्यस्थता प्रक्रिया भी उसी रणनीति का हिस्सा है।
क्या है पूरा विवाद?
विश्व बैंक की मध्यस्थता में 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। इस संधि के तहत भारत को रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का उपयोग करने का अधिकार मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब के अधिकांश जल का उपयोग पाकिस्तान को आवंटित किया गया।
यह संधि कई युद्धों और दशकों तक चले तनाव के बावजूद लागू रही। लेकिन अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले, जिसमें 26 लोगों की जान गई थी, के बाद भारत ने संधि को स्थगित करने का फैसला किया। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, तब तक संधि को बहाल नहीं किया जाएगा।
इस बीच पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठा रहा है, जबकि भारत का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दे को नजरअंदाज कर कोई भी संधि सामान्य रूप से लागू नहीं रह सकती।
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