फिल्म ‘खामोशी’ में किशोर कुमार के गाये ‘वो शाम कुछ अजीब थी’ गाने को सुनते हुए अक्सर सोचता हूं कि यह गाना एक नहीं, तीन अलग-अलग भावों में साथ-साथ चल रहा हैं। गुलजार ने शब्दों में परोसा एक असमंजस सा प्यार, हेमंत कुमार की धुन ने इसमें विषाद भरा और किशोर कुमार ने इसमें सजाई एक उदासी। मीठी, रिसती हुई उदासी। इससे यह हुआ कि अंत तक भी यह गाना किसी एक निश्चित भाव में ठहर नहीं पाता जैसा कि ज़्यादातर हिन्दी गाने कर जाते हैं। यह न पूरी तरह प्रेम का गीत है, न ही साफ़-साफ़ दुख का, और न ही कोई खुशी का बल्कि यह उन तीनों के बीच का एक ऐसा एहसास है, जिसे ठीक-ठीक नाम देना मुश्किल है।
अब गाने में दो शामें हैं। एक जो स्मृति में हैं और दूसरी जो साँस की तरह अभी घट रही है।
वो शाम कुछ अजीब थी
ये शाम भी अजीब है
इसकी अगली लाइन में गुलज़ार लिखते है
‘वो कल भी पास-पास थी
वो आज भी करीब हैं’
बहुत सीधा सा फर्क लगता है, पर गुलज़ार यहाँ अपना खेल रचते हैं। देखने में दोनों लाइन एक जैसी लगती हैं पर हैं अलग। “पास-पास” देह की भूगोल है। दो शरीरों का एक चौखट में होना। कंधे से कंधा छू जाना। “क़रीब” देह से परे की यात्रा है। यह मन की परिक्रमा है, भीतर की सन्निधि है। गुलज़ार बहुधा बिंबों का कोहरा रचते हैं, मगर यहाँ वे सरलतम शब्द चुनते हैं और सरलता के उस जल में ही सबसे गहरा प्रतिबिंब तैरता दिखता है।
दोनों अंतरों का भेद भी सतही तौर पर केवल काल का हैं। पहले अंतरे में नायक स्वीकारता है-
‘मैं सोचता था मेरा नाम गुनगुना रही है वो’
दूसरे अंतरे तक आते-आते ‘सोचता था’ ‘जानता हूं’ में बदल जाता है-
‘मैं जानता हूँ मेरा नाम गुनगुना रही है वो’
‘सोचता था’ से ‘जानता हूं’ की यह यात्रा ही तो प्रेम का सम्पूर्ण वृत्त है। पहले अंतरे की ईंट से ही दूसरा अंतरा उठता है। पहले अंतरे की रेखा दूसरे अंतरे में खिंचती हैं। यह गीत का विरल सौंदर्य है। जैसे नदी उसी जल को लेकर आगे बढ़ती है, पर घाट बदल जाता है।
अब फिल्म ‘खामोशी’ के मूल कथा के साये में ‘वो शाम कुछ अजीब थी’ को सुनें, तो यह गाना और जटिल हो उठता हैं। वहीदा रहमान जो एक नर्स हैं और प्रेम में टूटे देवदासनुमा बीमार लोगो का इलाज उनके साथ प्रेम का अभिनय करते हुए करती हैं और फिर एक दिन, एक आदमी से प्रेम का अभिनय करते-करते सचमुच उससे प्रेम करने लग जाती हैं। अब जिससे उसे प्यार हुआ वो अपनी अतीत की प्रेमिका के पास वापिस चला जाता हैं। अभिनय का पुरस्कार यथार्थ का दंश बन कर साथ रह जाता है।
और जब नियति उसे एक बार फिर उसी भूमिका में नए आदमी के पास ढकेल देती है, तो प्रेम और उसका अभिनय उसके लिए काम नहीं एक पुनरावृत्ति का आतंक हो जाता है। ‘लाभशंकर ठक्कर” के लिखे एक नाटक ‘पीला गुलाब और मैं’ की नायिका की तरह एक प्रश्न उसके भीतर गूँजता रहता है- ‘मैं जो जी रही हूँ, वह अभिनय है या सच ? यदि यह प्रेम है, तो पहले किया गया अभिनय क्या था? क्या वो प्रेम नहीं था? और नहीं था तो भी कर तो वो यही रही थी और यदि वह अभिनय था, तो आज जो हो रहा है वह भी क्या उसी का विस्तार नहीं?’
वहीदा रहमान के पात्र की त्रासदी यही हैं। उसके लिए प्रेम अब कभी ‘एकल’ नहीं हो सकता। वह सदा ‘प्रेम’ और ‘प्रेम के अभिनय’ की दोहरी परछाईं लिए आता है। ‘वो शाम कुछ अजीब थी’ उसी द्वैध की बंदिश है। एक असमंजस, एक रहस्य, एक उदासी जो हर स्वर में कुरेदती है। यह प्रेम सत्य है, या एक और निपुण अभिनय? गाने में वहीदा रहमान के पात्र पर यह असमंजस छाया हुआ हैं वही राजेश खन्ना का किरदार इन सब से बेखबर। प्रेम को पाकर अब बीमार राजेश खन्ना ठीक होते हैं और प्रेम का अभिनय करते हुए वहीदा रहमान पागल हो जाती हैं। प्रेम अजूबा हैं। इसे पाकर कोई तर जाता हैं तो कोई डूब जाता हैं।
‘ख़ामोशी’ कंटेंट के रूप में अपने समय से बहुत ही आगे की फिल्म थी। आशुतोष मुखर्जी के उपन्यास ‘नर्स मित्र’ पर आधारित इस फिल्म में हेमंत कुमार के यशस्वी गाने ‘तुम पुकार लो’ और ‘हमने देखी हैं उन आँखों की महकती खुशबू’ भी दर्ज हैं। अब फिल्म की खूबसूरती देखिये। ये ऊपर बताये तीनो ही गाने नर्स वहीदा रहमान के मन का हाल हैं पर इन्हे फिल्माया गया है किन्हीं और पर।
‘खामोशी‘ के अंत में जो होता है, वह सिर्फ़ एक पात्र का टूटना नहीं है, वह प्रेम की उस परत का खुलना है, जिसे हम अक्सर देखना ही नहीं चाहते। वहीदा रहमान का चरित्र प्रेम का अभिनय करते-करते वहाँ पहुँच जाता है, जहाँ अभिनय और सच्चाई एक-दूसरे में ऐसे घुल जाते हैं कि उसे पता तक न चल पा रहा कि उसकी फीलिंग प्यार ही हैं या कोई ऐसा अभिनय, जो वो सालो से करती हुई आ रही हैं।
प्रेम के बारे में हम अक्सर सोचते हैं कि वह अचानक होता है, पूरी तरह सच्चा होता है, और अपने आप चलता रहता है। पर सच्चाई शायद इससे अलग और कठोर है। प्रेम बहुत बार अपने आप नहीं चलता, उसे उठाना पड़ता है, ढोना पड़ता है, बचाना पड़ता है और यहीं से ‘प्रेम का अभिनय’ शुरू होता है। जब मन नहीं होता, फिर भी ठहरना। जब शिकायत होती है, फिर भी चुप रहना। जब दूरी महसूस होती है, फिर भी पास बने रहना।
ये सब क्या है? यह प्रेम ही है, लेकिन अपने सबसे कच्चे, सबसे कठिन रूप में।
आज के समय में प्रेम इसलिए कमज़ोर नहीं हुआ कि लोग महसूस करना भूल गए हैं बल्कि इसलिए कि जीवन ने महसूस करने की फुर्सत कम कर दी है। यहीं ‘अभिनय’ ज़रूरी हो जाता है।
प्रेम अब कई बार सुंदर और ईमानदार अभिनय से ज्यादा कुछ नहीं होता।
प्रेम अब सिर्फ़ एक आवेग नहीं रहा, वह एक अभ्यास बन गया है। रोज़ थोड़ा-थोड़ा निभाया जाने वाला। मन नहीं होता, फिर भी साथ बने रहना। शिकायत होने पर भी चुप रहना। भीतर दूरी महसूस होने पर भी बाहर से पास बने रहना। यह सब क्या है? क्या यह झूठ है? या यही प्रेम का सबसे कठिन और परिपक्व रूप है?
प्रेम हमेशा पूरी तरह सहज नहीं होता। लेकिन ख़तरा तब पैदा होता है जब मनुष्य यह पहचानना ही खो दे कि उसके भीतर जो बचा है, वह अनुभूति है या केवल भूमिका। यही वहीदा रहमान के पात्र की त्रासदी है। वह प्रेम को निभाते-निभाते वहाँ पहुँच जाती है, जहाँ अभिनय और सच्चाई एक-दूसरे में ऐसे घुल जाते हैं कि उनके बीच फर्क कर पाना संभव नहीं रह जाता कि यह प्रेम हैं या दरअसल प्रेम का सुन्दर अभिनय हैं। इसी कश्मकश के उस धुंधले प्रदेश का सबसे सुंदर गीत है ‘ वो शाम कुछ अजीब थी। जिसमे प्यार और प्यार के अभिनय के बीच के असमंजस का उरूज पर हैं। क्योंकि प्रेम बदल सकता है, समय बदल सकता है, संबंधों के तरीके बदल सकते हैं, लेकिन मनुष्य के भीतर का वह धु़ंधलका नहीं बदलता जहाँ प्रेम और उसके अभिनय की सीमाएँ एक-दूसरे में घुलने लगती हैं।
इस पूरे गीत में एक पात्र है जो नहीं होकर भी हर फ्रेम में है। धर्मेंद्र नहीं हो कर भी इस पूरी गीत में हैं। नायिका की यादों में, आशंकाओं में, डर में, प्यार में, सब में, सबकुछ में… इससे ज्यादा भला कोई क्या हो सकता है?
फिल्म का एक अन्य गीत है ‘तुम पुकार लो, तुम्हार इंतज़ार है।‘ इस गाने में एक पीठ नजर आती है, आराम- कुर्सी में धंसी हुई। दरअसल पीठ किसी जाते हुये या चले गये इंसान का रूपक है। जो आपको तो दिख रहा पर जो आपको नहीं देख रहा। वहीदा रहमान वहीं अदेखा-उपेक्षित चरित्र हैं यहां।
इस गीत का एक बेहद सुंदर पक्ष है, इसका छायांकन, यह कमल बोस की उत्कृष्ट ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमैटोग्राफी का ही कमाल है कि अंधेरे-उजाले की छवियां यह़ा एक कविता रचती दीखती हैं-
वो शाम कुछ अजीब थी, ये शाम भी अजीब है…
वो कल भी पास-पास थी, वो आज भी करीब हैं’..
या-
‘मैं सोचता था मेरा नाम गुनगुना रही है वो’ से ‘मैं जानता हूँ मेरा नाम गुनगुना रही है वो’ के विरोधाभासी रुप में जैसे ये गीत भी अंधेरे-उजाले की एक सुदर कविता है। नायक के असमंजस से यकीन के तरफ बढते कदम की पुरसुकून कविता।
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हीरोइन वहीदा रहमान ने डायरेक्टर असित सेन को सलाह दी थी कि इस फिल्म की कहानी के मुताबिक जिस तरह के शेड्स और लाइट्स चाहिए, उस हिसाब से तो इसे ब्लैक एंड व्हाइट में फिल्माया जाना चाहिए।असित सेन को भी वहीदा रहमान का ये आईडिया पसंद आया। कलर फिल्में शूट करने की टैक्नोलोजी आ चुकने के बावजूद यह फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट में इसीलिए बनी और उजाले और अंधेरे ने जैसे जीवन का आख्यान रच दिया। ये रंग भर नहीं होकर जैसे इसगीत, इस फिल्म और इस कहानी का जीवित पात्र हो गये।

