मुंबईः बॉम्बे हाई कोर्ट ने 7 मई (गुरुवार) को सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की फर्जी मुठभेड़ में हत्या के मामले में 21 पुलिसकर्मियों सहित सभी 22 आरोपियों की बरी होने के फैसले को चुनौती देने वाली अपीलें खारिज कर दीं। हाई कोर्ट ने सीबीआई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।
मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम अंखड़ की खंडपीठ ने बरी होने के फैसले को बरकरार रखते हुए शेख के भाइयों रुबाबुद्दीन और नायबुद्दीन द्वारा दायर अपीलें खारिज कर दीं।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा?
शेख के भाइयों द्वारा दायर अपीलों में निचली अदालत के फैसले को रद्द करने की मांग की गई थी। या वैकल्पिक रूप से दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 386(ए) के तहत पुनर्विचार के लिए निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
ये अपीलें 2019 से अदालत के समक्ष लंबित थीं और इन पर 2025 में फैसला सुनाया जाना था। दोनों भाइयों ने ‘परिवार के सदस्यों को खोने वाले पीड़ितों’ के रूप में अपील दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि मुकदमा मूल रूप से त्रुटिपूर्ण था और न्याय के उद्देश्यों को विफल करने वाले तरीके से चलाया गया था।
उन्होंने कहा कि विशेष न्यायाधीश ने अपना निर्णय निराधार मान्यताओं और साक्ष्यों के स्पष्ट रूप से गलत मूल्यांकन पर आधारित किया। अपील में एक प्रमुख शिकायत अभियोजन पक्ष द्वारा उन मजिस्ट्रेटों को तलब न करने की थी जिनके समक्ष प्रमुख विरोधी गवाहों ने पहले अपने बयान दर्ज कराए थे।

हाई कोर्ट में याचिका दायर करने से पहले रुबाबुद्दीन ने गृह मंत्रालय, सीबीआई निदेशक और कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर सरकार से फैसले को आधिकारिक रूप से चुनौती देने का आग्रह किया था।
सीबीआई ने इस बीच हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान कहा कि उसने फैसले को स्वीकार कर लिया है और अपील में इसे चुनौती देने का कोई निर्णय नहीं लिया है।
2005 का है सोहराबुद्दीन मामला
यह मामला 23 नवंबर, 2005 की एक घटना से जुड़ा है जब वांछित अपराधी सोहराबुद्दीन शेख को कथित तौर पर कौसर बी और प्रजापति के साथ हैदराबाद से सांगली जा रही एक लग्जरी बस से अगवा कर लिया गया था। सीबीआई ने दावा किया कि शेख और प्रजापति को बाद में पुलिस द्वारा फर्जी मुठभेड़ों में मार दिया गया, जबकि कौसर बी की हत्या कर दी गई और उनके शव को गुप्त रूप से ठिकाने लगा दिया गया।
वर्तमान केंद्रीय मंत्री अमित शाह भी इस मामले में आरोपी थे। यह मामला गुजरात में दर्ज किया गया था। 2012 में हालांकि सीबीआई के अनुरोध पर इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया था।
इस मुकदमे की अध्यक्षता कई जजों ने की। इनमें जस्टिस बीएच लोया भी शामिल थे जिनकी 2014 में मुकदमे के बीच में ही मृत्यु हो गई थी और जस्टिस एमबी गोसावी, जिन्होंने दिसंबर 2014 में शाह को मामले से बरी कर दिया था।
अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलता रहा। 21 दिसंबर 2018 को सीबीआई के विशेष न्यायाधीश एस.जे. शर्मा ने गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के सेवारत और सेवानिवृत्त पुलिसकर्मियों सहित सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया।
ट्रॉयल के दौरान, 210 गवाहों से पूछताछ की गई लेकिन उनमें से 92 के मुकर जाने के बाद अभियोजन पक्ष का मामला धराशायी हो गया। अपने 358 पृष्ठों के फैसले में परीक्षण न्यायाधीश ने मृतक के परिवार के प्रति सहानुभूति व्यक्त की लेकिन निर्णायक साक्ष्यों की गंभीर कमी का हवाला दिया।
जस्टिस ने आगे कहा कि आरोपियों को केवल नैतिक या संदेह के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
