अयोध्या: राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए दान और चढ़ावे में कथित गड़बड़ी का मामला इन दिनों सुर्खियों में है। करोड़ों रुपये के चढ़ावे के कथित गबन, मंदिर कर्मचारियों से पूछताछ, नकदी बरामदगी और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन ने इस मामले को मौजूदा समय में सबसे चर्चित मामलों में शामिल कर दिया है। मामला सिर्फ धन के कथित दुरुपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है जिसके जरिए हर दिन लाखों श्रद्धालुओं का चढ़ावा मंदिर तक पहुंचता है और फिर उसका प्रबंधन किया जाता है।
खास बात ये भी है कि जिस विवाद ने अब राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर हलचल पैदा कर दी है, उसकी शुरुआत किसी पुलिस शिकायत या एफआईआर से नहीं हुई थी। अंदरुनी चर्चा धीरे-धीरे बाहर फैलने लगी और अयोध्या की गलियों तक पहुंची, और फिर जैसे-जैसे बात बढ़ती गई, मामला खुलने लगा। अब स्थिति ये है कि नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं। राजनीतिक बयानबाजी भी हो रही है। मामले में अब तक एफआईआर क्यों नहीं हुई, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं। बता दें कि मंदिर संचालन के लिए 15 सदस्यीय ट्रस्ट है।
राम मंदिर में गबन: कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद से ही यह हिंदू धर्म के श्रद्धालुओं के लिए बड़े तीर्थ के तौर पर उभरा है। देश-दुनिया से आने वाले भक्तों ने मंदिर में बड़ी मात्रा में नकद दान, सोना-चांदी और अन्य चढ़ावे अर्पित किए हैं। हालांकि, इनके प्रबंधन में कमी की बातें सामने आ रही है।
मामले ने पिछले हफ्ते तूल पकड़ना शुरू किया जब सपा सरकार में मंत्री रहे पवन पांडेय ने मंदिर के चढ़ावे में 5 करोड़ रुपये की चोरी के आरोप लगाए। इसके बाद अखिलेश यादव ने भी मुद्दे को सोशल मीडिया पर उठाया। तरह-तरह के बयान आने शुरू हुए। इसी बीच 9 जून को राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने ट्रस्ट के सदस्यों के साथ बैठक की।
मामला तब और तेजी से चर्चित हुआ जब भाजपा के वरिष्ठ नेता रजनीश सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर ट्रस्ट के वित्त, संपत्ति, चंदे, खर्च, बैंक खातों और जमीन के लेन-देन का सार्वजनिक खुलासा करने की मांग की। उन्होंने कहा कि मंदिर के निर्माण में योगदान देने वाले भक्तों को यह जानने का अधिकार है कि नकद, गहने और अन्य कीमती सामान सहित चंदे का इस्तेमाल कैसे किया जा रहा था।
इसके अगले दिन प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर मामले पर रिपोर्ट मांग ली गई। ये सारी बातें हो ही रही थीं कि इसी दौरान मंदिर के पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिंह का बयान आया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि मंदिर में ये चोरी 2020-21 के बाद से ही चल रहा है। वहीं, मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने तब सभी आरोप खारिज किए थे। बहरहाल, महिपाल ने ये तक दावा किया कि उन्होंने खुद चोरी पकड़ी थी और चंपत राय सहित व्यवस्थापक गोपाल राव से शिकायत की लेकिन एक्शन नहीं लिया गया।
एसआईटी को 15 दिन में देनी है रिपोर्ट
जैसे-जैसे विवाद बढ़ता गया, उत्तर प्रदेश सरकार ने शनिवार (13 जून) को ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के ही अनुरोध पर आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यों वाली एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन कर दिया। इस एसआईटी में लखनऊ के डिविजनल कमिश्नर और आईएस अधिकारी विजय विश्वास पंत, पुलिस महानिरीक्षक (IG) और IPS अधिकारी किरण एस, सहित वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन शामिल हैं।
SIT को 15 दिनों के अंदर अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी। जांच करने वाले चढ़ावे की गिनती, कैश मैनेजमेंट, प्रॉपर्टी की खरीद, बैंक के लेन-देन और पूरे फाइनेंशियल नेटवर्क की जांच कर रहे हैं। आने वाले दिनों में और भी बड़े खुलासे होने की उम्मीद है।
इस बीच मामले में एक और महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब जांच के दौरान मंदिर से जुड़े एक कर्मचारी के घर से कथित तौर पर लाखों रुपये नकद बरामद होने की खबर सामने आई। रिपोर्टों के अनुसार लवकुश मिश्रा नाम के कर्मचारी के घर से करीब 10 से 12 लाख रुपये नकद मिले। इसके बाद कई अन्य लोगों से भी पूछताछ शुरू कर दी गई है।
इसी दौरान कुछ अन्य नाम भी चर्चा में आए। दैनिक भास्कर की रिपोर्टों के अनुसार टिन्नू यादव नाम के एक शख्स और उससे जुड़े संपत्ति लेनदेन को लेकर भी सवाल उठे हैं। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या मंदिर के चढ़ावे से जुड़े कथित धन का इस्तेमाल संपत्ति खरीदने या अन्य निवेशों में किया गया था।
एसआईटी क्या जांच कर रही है?
एसआईटी की जांच का केंद्र बिंदु केवल यह पता लगाना नहीं है कि पैसा गायब हुआ या नहीं, बल्कि यह भी है कि यदि कोई गड़बड़ी हुई तो वह किस स्तर पर हुई। जांचकर्ता यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि दान पेटियों से निकलने वाली नकदी की गिनती, रिकॉर्डिंग, बैंक में जमा कराने और लेखांकन की प्रक्रिया में कहीं कोई कमजोर कड़ी तो नहीं थी।
साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि कथित रूप से गायब धन कहीं संपत्तियों, नकद लेन-देन या अन्य माध्यमों में तो नहीं लगाया गया। रिपोर्टों के मुताबिक एसआईटी वित्तीय दस्तावेज, बैंक रिकॉर्ड, संपत्ति से जुड़े कागजात और संबंधित व्यक्तियों के बयानों का मिलान कर रही है।
आरोपियों के करोड़पति होने की कहानी क्या है
भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार रामलला के गर्भगृह और दर्शन पथ के पास रखे दानपात्रों से जो भी नकदी निकाली जाती है, उसे राम जन्मभूमि परिसर के अंदर ही बने एक ‘गोपनीय कक्ष’ में लाय जाता है। इस कमरे में बाहरी लोगों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित होता है। चढावे की गिनती के लिए 50 कर्मचारी इस कमरे में होते हैं।
गबन की कहानी को और बल उस समय मिलने लगा जब इन्हीं कर्मचारियों में शामिल कुछ आरोपियों के महज कुछ साल में लाइफस्टाइल बदलने लगी। मामूली सैलरी के बावजूद पिछले तीन से चार साल और पांच साल में ये करोड़पति हो गए। कुछ ने महंगी गाड़ियां और जमीनें भी खरीदी हैं। इसमें आरोपी में टिन्नू यादव का भी नाम आ रहा है। टिन्नू यादव के बारे में कहा जा रहा है कि ये चंपत राय के साथ लंबे समय से काम कर रहे हैं। इनके पास करोड़ों की अब संपत्ति हैं। पहले टिन्नू अयोध्या में ऑटो चलाते थे। टिन्नू यादव के भतीजे मनीष यादव पर भी ऐसे आरोप लगे रहे हैं। ऐसे ही केडी तिवारी, राजेश पाठक, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश नाम के शख्स भी संदेह के घेरे में हैं।
राम मंदिर में गबन…आगे क्या?
फिलहाल पूरा मामला जांच के चरण में है। एसआईटी की रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि क्या यह मामला लेखांकन की गड़बड़ी का है, प्रशासनिक लापरवाही का है या फिर वास्तव में संगठित तरीके से चढ़ावे के धन का गबन किया गया।
देश के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक से जुड़े इस विवाद ने दान प्रबंधन, वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में एसआईटी की जांच और उससे निकलने वाले निष्कर्ष ही तय करेंगे कि यह मामला आखिर कितना बड़ा है और इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं।
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