12 जून 1975 को गुजरात विधान सभा का चुनाव नव निर्माण आंदोलन के बीच हुआ था। इस चुनाव में तब कांग्रेस की हार हुई। चिमन भाई पटेल सत्ता में वापसी नहीं कर सके। इसके बाद बाबूभाई पटेल मुख्यमंत्री बने।
बतौर मुख्यमंत्री बाबूभाई पटेल एक बार बिहार आए थे। अहमदाबाद से साबरमती एक्सप्रेस से उन्हें मुजफ्फरपुर आना था। स्लीपर क्लास में वे अपने व्यक्तिगत सुरक्षाकर्मी के साथ यात्रा कर रहे थे। रेलगाड़ी सुबह सोनपुर स्टेशन पहुंची। मुख्यमंत्री जी और उनके सुरक्षा कर्मी चाय पीने के लिए प्लेटफार्म पर उतरे। वे जब फिर अपने बर्थ पर आये तो देखा, कुछ लोग उनके बर्थ पर गमछा बिछा कर सो रहे हैं।
उनके सुरक्षा कर्मी ने अनुरोध किया कि बर्थ खाली कर दे, तब यात्रियों का जवाब था, ‘आपलोग तो बहुत सो चुके, अब हमलोग को भी आराम से यात्रा करने दीजिए।’ तब लाचार हो कर सुरक्षा कर्मी को बाबू भाई पटेल का परिचय देना पड़ा। इस तरह उन्हें अपनी जगह बैठने को मिली।
बाबूभाई पटेल ऐसे मुख्यमंत्री थे जो गुजरात में भी स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से यात्रा करते थे। उनके एक सहयोगी रह चुके एक मित्र ने बताया था, ‘एक बार वे अहमदाबाद से राजकोट रात्रि सेवा सरकारी बस से गए, उनके पास एक झोला था, जिसमें उनका धोती और कुर्ता ही था। बस से उतर कर मुख्यमंत्री जी पास ही स्थित राष्ट्रीय शाला गए जहां फ्रेश होकर नाश्ता पानी किया। राष्ट्रीय शाला महात्मा गांधी द्वारा स्थापित एक संस्था है।
बाबू भाई पटेल को कलेक्टर ने सरकारी गाड़ी भेजी जिस पर सवार हो वे सर्किट हाउस गए, जहां अधिकारियों के साथ बैठक की। इसके बाद फिर राष्ट्रीय शाला वापिस आए और फिर वहां से दूसरी सरकारी बस पकड़ वे भुज के लिए निकल गए।
मौजूदा राज्यपाल देवव्रत भी अपना रहे वही राह!
अभी यह परंपरा गुजरात के राज्यपाल देवव्रत ने फिर बनाई है। वे भी स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से ही यात्रा करने लगे हैं। किसी आश्रम में ही विश्राम करते हैं। कार की जगह इलेक्ट्रिक रिक्शा पर चलते हैं। प्रधानमंत्री रह चुके मोरारजी भाई देसाई भी गुजरात में अपने यात्रा के दौरान गुजरात विद्या पीठ तथा राष्ट्रीय शाला में ही रूकते थे।
एक बार वे राजकोट आए थे और मुम्बई जाने के लिए एयरपोर्ट जा रहे थे। कोई एस्कॉर्ट या पायलट गाड़ी नहीं थी। एक अम्बेसडर में वे जा रहे थे, उनकी नजर ड्राइवर के बगल में बैठे सज्जन पर पड़ी। उन्होंने उसका परिचय पूछा, जब पता चला वह राजकोट पुलिस का अधिकारी है,उसे उतार दिया। वे एयरपोर्ट पर अन्य यात्रियों की तरह लाइन में सुरक्षा जांच के लिए खड़े हुए, एयरपोर्ट के मैनेजर ने उनसे अनुरोध किया आप सीधे जा सकते हैं। उन्होंने नकार दिया।
गुजरात में पहले राज्यपाल भी लंबी दूरी की यात्रा सड़क मार्ग से ही करते थे। शारदा मुखर्जी भी गांधी नगर से राजकोट जा रही थी। उन्हें सिगरेट की तलब हुई। ऐसे में उनकी गाड़ी को लिंबडी उच्च मार्ग पर रुकवाया गया। वहां लोक निर्माण विभाग का दो कमरे का गेस्ट हाउस था। राज्यपाल के परिसहाय ने उन्हें सिगरेट पैकेट दिया। महामहिम दस मिनट के बाद यात्रा के अगले पड़ाव पर निकली।



