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ऑस्ट्रेलिया और स्विट्जरलैंड ने भी रोकी अमेरिका के लिए डाक सेवाएं, भारत समेत कई देश पहले ही कर चुके हैं घोषणा

इससे पहले भारत, ब्रिटेन, फ्रांस, स्वीडन, जर्मनी, इटली और डेनमार्क जैसे कई देश पहले ही इसी तरह का कदम उठा चुके हैं। इन देशों का कहना है कि नई नीति ने उनके डाक तंत्र को अचानक अस्त-व्यस्त कर दिया है और ग्राहकों के लिए भारी असुविधा पैदा की है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा अचानक लागू किए गए नए शुल्क और कस्टम नियमों के चलते ऑस्ट्रेलिया और स्विट्जरलैंड ने भी अमेरिका को डाक और पार्सल भेजने पर रोक लगाने की घोषणा कर दी है। यह कदम 29 अगस्त से लागू होने वाले नए शुल्कों के ठीक पहले उठाया गया है, जिसने वैश्विक ई-कॉमर्स और व्यापारिक संबंधों को अनिश्चितता में डाल दिया है।

इससे पहले भारत, ब्रिटेन, फ्रांस, स्वीडन, जर्मनी, इटली और डेनमार्क जैसे कई देश पहले ही इसी तरह का कदम उठा चुके हैं। इन देशों का कहना है कि नई नीति ने उनके डाक तंत्र को अचानक अस्त-व्यस्त कर दिया है और ग्राहकों के लिए भारी असुविधा पैदा की है।

ऑस्ट्रेलिया पोस्ट ने मंगलवार को कहा कि वह 26 अगस्त 2025 से अमेरिका और प्यूर्टो रिको के लिए पार्सल सेवाएं “आंशिक रूप से अस्थायी तौर पर निलंबित” कर रहा है। संस्था ने कहा कि यह कदम “अमेरिकी सरकार द्वारा हाल में किए गए बड़े बदलावों” के कारण उठाना पड़ा है।

क्या है अमेरिका का नया टैरिफ नियम?

दरअसल, ट्रंप प्रशासन ने 30 जुलाई को हस्ताक्षरित एक कार्यकारी आदेश के तहत डी मिनिमिस छूट को निलंबित कर दिया। यह छूट 800 डॉलर तक मूल्य के पार्सलों को बिना किसी कर या शुल्क के अमेरिका में प्रवेश की अनुमति देती थी। अब 29 अगस्त से लागू होने वाले नए नियमों के तहत अमेरिका में आने वाले हर पार्सल पर या तो उसके मूल देश के टैरिफ के अनुसार शुल्क लगेगा या फिर 80 से 200 डॉलर तक का तय शुल्क देना होगा।

इस बदलाव से सबसे अधिक असर छोटे और मध्यम कारोबारियों पर पड़ा है, जो अमेरिका में सीधे ग्राहकों को सामान भेजते थे। ऑस्ट्रेलियाई मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, स्थानीय उद्यमी लंबे समय से इस छूट पर निर्भर थे, खासकर कपड़े, गिफ्ट, कॉस्मेटिक्स और वाइन जैसे उत्पादों के निर्यात में। अब ये सामान 10% तक के बेसलाइन शुल्क के दायरे में आएंगे।

ये भी पढ़ेंः ट्रंप की टैरिफ नीति का अमेरिका में ही विरोध, भारत-अमेरिकी संबंधों को कितना होगा नुकसान?

स्विट्जरलैंड की स्विस पोस्ट ने भी रोकी सेवाएं

स्विस पोस्ट ने भी सोमवार को घोषणा की कि वह अमेरिका के लिए नियमित पार्सल स्वीकार नहीं करेगा। केवल अत्यावश्यक एक्सप्रेस मेल जैसे आधिकारिक दस्तावेज और प्रमाण पत्र भेजे जा सकेंगे। स्विस पोस्ट ने कहा कि अमेरिकी सरकार के अचानक उठाए गए कदम ने वैश्विक शिपमेंट नेटवर्क में असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। संस्था अब यह विचार कर रही है कि निजी व्यक्तियों के बीच 100 डॉलर तक के गिफ्ट जैसी सीमित श्रेणियों को कैसे बहाल किया जा सकता है।

भारत समेत इन देशों ने भी रोकी शिपमेंट

अमेरिका के इस फैसले से प्रभावित होने वाले देशों की सूची में ऑस्ट्रेलिया और स्विट्जरलैंड अकेले नहीं हैं। इससे पहले, भारत, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, स्वीडन, जर्मनी, इटली और डेनमार्क जैसे कई देशों ने भी अमेरिका को शिपमेंट रोकने की घोषणा की थी।

भारत ने 25 अगस्त से ही अमेरिका के लिए अधिकांश पार्सल शिपमेंट को निलंबित कर दिया था, जिसमें केवल पत्र और छोटे उपहारों को छूट दी गई थी।

फ्रांस की ला पोस्टे ने शिकायत की कि अचानक नीति बदलने से उन्हें नए सीमा शुल्क आवश्यकताओं को संभालने के लिए अपने डिजिटल सिस्टम को पुनर्गठित करने का समय नहीं मिला।

यूनाइटेड किंगडम की रॉयल मेल ने भी मंगलवार से शिपमेंट निलंबित कर दी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी डिलीवरी नए शुल्क लागू होने से पहले पूरी हो जाएं।

जापान पोस्ट और कोरिया पोस्ट ने भी कुछ वस्तुओं की शिपमेंट रोक दी है, हालांकि कोरिया पोस्ट ने ग्राहकों को यूपीएस के साथ अपनी साझेदारी सेवा का उपयोग करने की सलाह दी है।

हालांकि, एक्सप्रेस कूरियर कंपनियां जैसे FedEx और UPS अभी भी अमेरिका के लिए पार्सल स्वीकार कर रही हैं, क्योंकि ये सेवाएं परंपरागत डाक तंत्र से अलग हैं और उन पर नए नियमों का सीधा असर नहीं पड़ा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन का यह कदम अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों को और मजबूत करता है, जिसका खामियाजा छोटे देशों और उनके कारोबारी वर्ग को भुगतना पड़ रहा है।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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