नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजे के बाद जिन विवादों की आशंका थी, उन सभी की झलक दिख चुकी है। फिर चाहे राज्य में कुछ जगहों से आई हिंसा की खबरें हो या फिर चुनाव आयोग और प्रशासन की मशीनरी पर विपक्षी पार्टियों का हो हल्ला। हालांकि, इन सबके बीच एक विवाद चौंकाने वाला है। ममता बनर्जी ने दावा किया कि उनके साथ बदसलूकी, धक्का-मुक्की और यहां तक कि मारपीट की घटना हुई।
पद पर बैठे या दूसरे शब्दों में कहें तो सीटिंग सीएम के साथ ऐसी घटना का उदाहरण भारत में शायद ही मिले। वैसे, यह भी जांच का विषय है कि ममता जो दावे कर रही हैं, उसमें कितनी सच्चाई है। चुनाव आयोग की ओर से आए बयानों में ममता के ऐसे आरोपों को खारिज किया गया। लेकिन फिर भी कुछ सवाल और संशय हैं। चुनाव आयोग के लिए क्या जरूरी नहीं कि किसी भी अटकलबाजी को पूरी तरह खत्म किया जाए। पर्दे के पीछे का जो सच है, वो बाहर आ जाए।
ममता के आरोप कितने विश्वसनीय?
चुनाव आयोग की बात करें, इससे पहले यही सवाल अहम है कि आखिर ममता के अपने साथ मारपीट, धक्का-मुक्की जैसे आरोप कितने भरोसे लायक है। ममता की छवि आक्रामक और जूझने वाले नेता की रही है। 1993 में जब राइटर्स बिल्डिंग में ममता के बालों को पकड़ कर खींचने की घटना सामने आई थी, उसके बाद से कई मौकों पर ममता ने अपनी फाइटर छवि को दिखाया है।
2021 की ही बात करें तो चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी के बाएं पैर और कंध में उस समय चोट लग गई, जब वे अपनी गाड़ी से लोगों का अभिवादन कर रही थीं। तृणमूल ने आरोप लगाया कि ये साजिश थी। हालांकि, चुनाव आयोग ने कहा कि मुख्यमंत्री पर हमले कोई सबूत नहीं मिले हैं। कुछ दिन अस्पताल में रहने के बाद ममता प्रचार के लिए दोबारा उतरीं। व्हीलचेयर पर रोड शो किया और कहा कि ‘घायल शेरनी ज्यादा खतरनाक होती है।’
इसके अलावा भी कई ऐसी घटनाएं हैं, जहां ममता पर या तो हमले हुए या फिर वे भिड़ जाने वाली स्थिति में नजर आईं। राजनीतिक तौर पर ममता को इस छवि का खूब फायदा भी मिलता रहा है। इसलिए ममता के मौजूदा दावे कितने सच है, इस पर भी सवाल जायज है।
ममता ने वोटों की गिनती वाले दिन (4 मई, 2026) बताया कि भवानीपुर के मतगणना केंद्र में बाद में उनके एजेंट को नहीं जाने दिया गया। ममता ने कहा, ‘मुझे लात मारा गया, सीसीटीवी को बंद कर दिया गया। हमारा एक एजेंट को नहीं जाने दिया गया। हमने रिक्वेस्ट किया था। मैं पांच मिनट के लिए घुसी थी। मुझे आश्वासन दिया गया कि इजाजत दी जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैंने सभी जगह शिकायत की।’
इसके बाद ममता ने मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी अपने साथ बदसलूकी और चुनावी धांधली के आरोप लगाते हुए इस्तीफा देने से इनकार किया। ममता की रणनीति आगे क्या होने वाली है, ये आने वाले दिनों में पता चलेगा लेकिन चुनाव आयोग के लिए भी कुछ सवाल हैं। चुनाव आयोग क्या इन आरोपों का जवाब और ठोस तरीके से देकर विवाद को हमेशा के लिए खत्म कर सकती है? यह सवाल इसलिए भी कि यहां बात पद पर मौजूद (अभी के लिए) एक मुख्यमंत्री के आरोपों पर हो रही है।
चुनाव आयोग ने ममता के आरोपों पर क्या कहा है?
पूरे चुनाव में बहुत अलग अंदाज में मुखर नजर आने वाली और यहां तक कि तृणमूल कांग्रेस को भी सीधे-सीधे आड़े हाथ लेने वाले निर्वाचन आयोग ने फिलहाल ममता बनर्जी के आरोपों को बहुत प्रमुखता नहीं देने के अंदाज में प्रतिक्रिया दी है।
पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा, ‘सीसीटीवी कैमरा बंद नहीं था। मैंने जिला निर्वाचन अधिकारी से भी बात की थी। किसी के साथ मारपीट या धक्का-मुक्की नहीं हुई। अगर ऐसा होता तो शिकायत दर्ज होती और FIR होती। न ही कोई शिकायत मिली न एफआईआर दर्ज हुई। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।’
इसके साथ ही चुनाव आयोग पर ममता बनर्जी के आरोपों पर उन्होंने कहा, ‘वोटों की गिनती में मुख्य निर्वाचन अधिकारी की कोई भूमिका नहीं होती है। यह काम रिटर्निंग ऑफिसर डीईओ (जिला निर्वाचन अधिकारी) के मार्गदर्शन में करता है।’
दक्षिण कोलकाता के जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा जारी एक बयान में स्पष्ट किया गया कि संपूर्ण मतगणना प्रक्रिया आयोग के नियमों के अनुसार ही संपन्न हुई। जिला निर्वाचन अधिकारी की रिपोर्ट के अनुसार, प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र थी, और प्रत्येक चरण कानून के पूर्ण अनुपालन में पूरा किया गया। मतगणना के दौरान सीसीटीवी कैमरे बंद किए जाने के आरोप का भी अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से खंडन किया और पुष्टि की कि कैमरे पूरी मतगणना के दौरान चालू रहे।
बयान में कहा गया कि सीसीटीवी कभी बंद नहीं किया गया। बयान में, डीईओ कार्यालय ने यह भी दावा किया कि ममता बनर्जी के आग्रह पर सोमवार शाम को कुछ समय के लिए मतगणना रोक दी गई थी। हालांकि, बयान में आगे कहा गया कि दिशानिर्देशों के अनुसार उन्हें सूचना दिए जाने के बाद मतगणना प्रक्रिया शुरू हुई।
सीसीटीवी फुटेज सच सामने ला देगा!
पिछले कुछ सालों में भारत में चुनाव में तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। चुनाव आयोग हर बूथ पर वेब कास्टिंग की व्यवस्था करता है। स्ट्रॉन्ग रूम में सीसीटीवी के जरिए नजर रखी जाती है। मतगणना केंद्र पर पूरी प्रक्रिया के दौरान सीसीटीवी रिकॉर्डिंग होती है। ऐसी व्यवस्थाओं के बावजूद तमाम तरह के धांधली के आरोप लगाए जाते हैं, और इन्हें हवा भी मिलती है।
ममता बनर्जी के ही मामले में वो सच बोल रही हैं या उनके दावे सरासर झूठे हैं, क्या इसका सच आसानी से सामने नहीं आ सकता है? चुनाव आयोग के पास ठोस सबूतों के साथ स्पष्ट जवाब है। क्या ये सही नहीं होगा कि चुनाव आयोग कथित घटनाक्रम के समय के CCTV फुटेज को पब्लिक डोमेन में रखे और तमाम तरह की चर्चाओं पर पर्दा डाला जाए।
लोकतंत्र में विवादों को जिंदा रखने और हवा देने के मौके आखिर दिए ही क्यों जाएं, जब सुरक्षा के पूरे तंत्र काम कर रहे हैं। चुनाव आयोग को इस पर भी विचार करना चाहिए।
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