अर्जुन सिंह जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब वहां जनसंपर्क विभाग के निदेशक और सचिव की सीधी पहुँच मुख्यमंत्री तक होती थी। एक बार जनसंपर्क के निदेशक, जो बाद में केंद्र सरकार में स्वास्थ्य सचिव पद से सेवानिवृत्त हुए, श्यामला हिल्स स्थित मुख्यमंत्री आवास गए। उन्होंने एक ड्राफ्ट पेपर मुख्यमंत्री को दिया। अर्जुन सिंह ने उसे पढ़ते ही तुरंत फाड़कर कूड़ेदान में डाल दिया और उन्हें डांटते हुए कहा, “आज उनकी बेटी भाग गई है और आप इसकी पब्लिसिटी करवाना चाहते हैं क्योंकि वह विपक्षी नेता की बेटी है? याद रखिए, कल आपकी भी बेटी भाग सकती है और मेरी भी।”
राज्य विभाजन के बाद जब छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र की भाजपा सरकार उन पर जासूसी करवा रही है। इस विषय में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को दो पन्नों का एक रोषपूर्ण पत्र लिखा गया। वाजपेयी जी ने बड़ी नाराजगी के साथ इन आरोपों को नकारा। कहा जाता है कि यह पत्र जोगी के विश्वासपात्र एक आईएएस अधिकारी ने लिखा था।
ओडिशा में बीजू पटनायक के प्रिय आईएएस अधिकारी प्यारी मोहन महापात्र रहे, जिन्होंने बाद में विद्रोह किया और राज्यसभा के सदस्य भी बने। एक समय तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने अमृतसर में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान चेतावनी दी थी कि बीजू पटनायक देश से राज्य को अलग करने (Secession) की बात कर रहे हैं और उन पर कठोर कार्रवाई की जाएगी। इसके जवाब में मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को दो पन्नों की एक चिट्ठी लिखी, जिसे पत्रकारों को भी जारी किया गया। उसमें लिखा था— “प्रिय चंद्रशेखर, मुझे देशभक्ति का पाठ मत पढ़ाओ। मैं तब से राजनीति में हूँ जब तुम्हारा जन्म भी नहीं हुआ था।”
बिहार में यह ‘रोग’ काफी पुराना है। जब कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री थे, तब उनके प्रिय आईएएस अधिकारी अशोक कुमार चौधरी थे, जो अति पिछड़ा वर्ग से आते थे। उस समय समाजवादी नेता रामानंद तिवारी गृह मंत्री थे और भोजपुर से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए थे; चौधरी उसी जिले में समाहर्ता (डीएम) थे। कर्पूरी जी के घोर राजनीतिक विरोधी राजपूतों के नेता सत्येंद्र नारायण सिंह थे।
भोजपुर के डीएम ने राज्य के मुख्यमंत्री को कई चिट्ठियां लिखीं, जिनमें से एक अत्यंत विवादास्पद रही। उन्होंने एक पत्र मुख्यमंत्री के तत्कालीन प्रधान सचिव यशवंत सिन्हा (जो बाद में केंद्र में वित्त मंत्री बने) को लिखा। इसमें आरोप लगाया गया कि जिले के सभी विभागों पर राजपूत अधिकारियों का कब्जा है; सिविल सर्जन से लेकर पुलिस अधिकारी तक सभी राजपूत हैं। उन्होंने जिले के न्यायालयों में पदस्थापित जजों का नाम लेकर आरोप लगाया कि वे भ्रष्ट हैं और उच्च जाति के अपराधियों को तुरंत जमानत दे रहे हैं। चौधरी ने सिन्हा को लिखा कि जिले में पचास प्रतिशत से ज्यादा पुलिस अधिकारी राजपूत हैं।
प्रसिद्ध हिंदी पत्रकार श्रीकांत ने अपनी किताब में लिखा है— “चौधरी ने आरोप लगाया कि न्यायिक अधिकारियों के पक्षपातपूर्ण रवैये और उनकी साठगांठ के कारण हरिजनों पर अत्याचार होते हैं।” पत्र के अनुसार, आरा सदर अस्पताल के एक राजपूत डॉक्टर अपनी ही जाति के अपराधियों की मदद करते थे। डीएम ने प्रधान सचिव को यहाँ तक लिखा कि “भोजपुर में केवल एक ही जाति के लोग सरकार का विरोध करते हैं और वे राजपूत हैं।” ऐसे में मसूरी स्थित प्रशासन अकादमी में न्यूट्रल रहने का पाठ किताबों में ही रह गया।
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