कुछ साल पहले जम्मू क्षेत्र में एक आंदोलन शुरू हुआ था, जिसमें महाराजा हरि सिंह के जन्मदिन पर अवकाश घोषित करने की मांग की गई। महाराजा हरि सिंह वही शासक थे जिन्होंने 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय कराया। शुरू में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व वाला प्रशासन इस मांग को लेकर जहां-तहां हो रहे प्रदर्शनों से बेपरवाह रहा और इस मांग को खारिज करता रहा। हालांकि, युवा राजपूत सभा (YRS) लगातार डटी रही और आखिर 23 सितंबर (महाराजा हरि सिंह का जन्मदिन) को जम्मू-कश्मीर में अवकाश घोषित किया गया।
बहुत से लोग नहीं जानते कि महाराजा हरि सिंह को 1949 में जम्मू-कश्मीर से निर्वासित कर दिया गया था। इसके बाद वे फिर कभी अपने प्रिय राज्य में वापस नहीं आ सके। केवल उनकी अस्थियाँ अप्रैल 1961 में जम्मू लौटीं, अनुचित निर्वासन के लगभग 12 वर्ष बाद। ऐसा क्यों हुआ? पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने मित्र शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के प्रति नरम रुख रखते थे और उन्हें जम्मू-कश्मीर का शासक बनाना चाहते थे। महाराजा हरि सिंह की राज्य में मौजूदगी शेख अब्दुल्ला को पसंद नहीं थी, और उनका निर्वासन उसी की कीमत था।
अपने समय से कहीं आगे थे हरि सिंह
महाराजा हरि सिंह अपने राज्य में विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न सुधार के मामले में अपने समय से बहुत आगे थे। जब उन्होंने अनुसूचित जातियों को सभी मंदिरों में प्रवेश की अनुमति दी, तो उनके परिवार के परंपरागत पंडितों ने विद्रोह कर दिया था और कहा कि वे ऐसा नहीं होने देंगे। हालांकि, महाराजा अपने आदेश से पीछे नहीं हटे और मंदिरों में अनुष्ठान कराने के लिए नया पंडित परिवार नियुक्त कर दिया।
उन्होंने सभी के लिए अनिवार्य शिक्षा लागू की, जिसमें मुस्लिम भी शामिल थे, और इसके लिए मौलवियों को वेतन पर नियुक्त किया गया। विधवा पुनर्विवाह, कृषि पद्धतियों और अन्य क्षेत्रों में उनके सुधार भी उल्लेखनीय थे।
भारत सरकार ने सैकड़ों रियासतों को ‘प्रिवी पर्स’ (राजाओं/महाराजाओं को वार्षिक भत्ता) दिया, लेकिन जम्मू-कश्मीर को नहीं। इसके पीछे पाकिस्तान के हमले के दौरान विलय, उस समय की परिस्थितियां और नेहरू का महाराजा हरि सिंह के प्रति विरोध प्रमुख कारण बताए जाते हैं। उस दौर के बहुत कम लोग आज जीवित हैं, जब 1947 में कबायली और पाकिस्तानी बलों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला किया था। इनमें से एक हैं सेवानिवृत्त मेजर जनरल गोवर्धन सिंह जम्वाल।
अपने जीवन के 100 साल पूरे करने से महज दो वर्ष दूर जनरल जमवाल ने सबकुछ देखा है। डोगरा वंश का स्वर्णिम युग, जब महाराजा हरि सिंह स्वतंत्रता-पूर्व भारत के सबसे बड़े राज्यों में से एक पर शासन करते थे। उन्हें 1946 के उत्तरार्ध के वे दिन भी स्पष्ट रूप से याद हैं, जो अत्यधिक अनिश्चितता से भरे थे। 1947 के शुरुआती कुछ महीने, जुलाई 1947 की शुरुआत में जम्मू के कुछ हिस्सों पर पाकिस्तानियों के हमले और अक्टूबर 1947 में कबाइलियों और पाकिस्तानी सेना के द्वारा जम्मू-कश्मीर के बड़े हिस्से पर किए गए भयावह हमले भी उन्हें याद हैं।
सितंबर 1928 में जन्मे जनरल जमवाल, डॉ. कर्ण सिंह के समकालीन और उस दौर से जुड़े सबसे प्रसिद्ध जीवित व्यक्ति भी हैं। वे कभी-कभी डॉ. सिंह के परिवार और करीबी दोस्तों द्वारा आयोजित कुछ कार्यक्रमों में भी शामिल होते हैं, लेकिन ज्यादातर समय घर पर ही रहते हैं। किताबें पढ़ते हैं, सेवारत सेना अधिकारियों और राजनेताओं से मिलते हैं। जब भी उनसे डोगरा शासनकाल के बारे में कुछ बताने को कहा जाता है, तो वे भावुक हो जाते हैं। इस रविवार (26 अप्रैल) को भी ऐसा ही हुआ, जब उन्होंने महाराजा हरि सिंह की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
दूर मुंबई में घटी उस घटना का वर्णन करते हुए जनरल जमवाल कहते हैं: ‘मुझे वह दिन याद है जब उनका (महाराजा हरि सिंह का) बंबई में निधन हुआ और उनकी अस्थियां जम्मू लाई गईं। पूरा जम्मू शोक में डूबा हुआ था। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार, उनकी अस्थियों को विमान से राज्य में विभिन्न स्थानों पर बिखेर दिया गया और साथ ही जम्मू की नदियों में विसर्जित किया गया।’
1949 के आखिर में अपने प्रिय जम्मू-कश्मीर से जबरन निकाले जाने के बाद महाराजा हरि सिंह की अस्थियां ही वापस लौटीं। जनरल जमवाल ने आगे कहा, ‘उनका निर्वासन उस दिन समाप्त हुआ, 12 साल बाद। हमने उनके लिए कुछ नहीं किया। मुझे हमेशा दुख होता है कि डोगरों ने वर्षों तक उन्हें याद करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किया। वे कश्मीर, बल्कि पूरे जम्मू-कश्मीर के वास्तविक रक्षक थे, निश्चित ही ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह और उनके 100 वीर डोगरा सैनिकों की मदद से, जो ग्रीस के थर्मोपाइले के युद्धों से कम नहीं थे।’
कुछ वर्ष पहले महाराजा के जन्मदिन पर केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन ने अवकाश घोषित किया गया। इस पर जनरल जमवाल ने कहा, ‘भगवान का शुक्र है कि युवा राजपूत सभा (YRS) ने हमें उनके जन्मदिन पर अवकाश दिलाया, ताकि हम उन्हें याद कर सकें और यह भी याद रखें कि उन्होंने 1947 में ब्रिटिश-प्रेरित साजिश से अपने राज्य को बचाया तथा चर्चिल के खेले गए ‘ग्रेट गेम’ के बावजूद जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बनने से रोका। ओम सद्गति।’
नहीं मिला पर्याप्ता सम्मान…
एक डोगरा विद्वान ने कहा, ‘महाराजा हरि सिंह जी का बंबई में निधन और उनकी अस्थियों का जम्मू लौटना सिर्फ एक घटना नहीं थी, बल्कि डोगरों की सामूहिक चेतना में अंकित एक अत्यंत भावनात्मक क्षण था।’
उन्होंने आगे कहा, ‘जब उनकी अस्थियाँ उस भूमि पर लौटीं जिस पर उन्होंने शासन किया, ऐसा लगा मानो 12 वर्षों का उनका दर्दनाक निर्वासन समाप्त हो गया। जम्मू में जो शोक की लहर थी, वह गहरी और वास्तविक थी। लोगों ने सिर्फ एक शासक को खोने का नहीं, बल्कि गरिमा, सुरक्षा और पहचान के प्रतीक को गंवाने का शोक मनाया था। अपनी भूमि और उसकी पवित्र नदियों के साथ एकात्म होने की उनकी अंतिम इच्छा एक ऐसे बंधन का प्रतीक थी जिसे निर्वासन कभी तोड़ नहीं सकता था।’
दशकों तक महाराजा हरि सिंह के विभिन्न क्षेत्रों में दिए गए विशाल योगदान को पर्याप्त मान्यता नहीं मिली। कम से कम जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के दस्तावेज पर हम गौर करें जिस पर उन्होंने हस्ताक्षर किया था। महाराजा हरि सिंह के बारे में और अधिक पढ़ना चाहिए ताकि हम उनकी दूरदृष्टि और उन विचारों को व्यवहार में लाने के लिए उनके द्वारा उठाए गए कदमों को समझ सकें।
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