कथाकार विवेक मिश्र के हालिया कहानी संग्रह-कारा की शीर्षक कहानी ‘कारा’ (यानी कारावास) पढ़ने के बाद मन में पहला सवाल यही उठा कि हिन्दी कहानीकार के लिए कारावास पर कहानी लिखना कैसे सम्भव है, क्या इसके लिए उनके पास कोई ‘फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस’ है, क्या वह कभी कारावास में रहे हैं या उन्होंने इस विषय पर कोई अनुसंधान किया है, या केवल कल्पना का सहारा लेकर ही उन्होंने यह कहानी बुनी है, लिखी है। मुझे याद आया कि विश्वप्रसिद्ध लेखक दोस्तोयेव्स्की को 1849 में जार ने गिरफ्तार किया था। उन्हें मृत्युदंड दिया गया, लेकिन फांसी से ठीक कुछ देर पहले उनकी सजा बदलकर साइबेरिया में कठोर करावास कर दी गई। यहाँ उन्होंने चार साल बिताए। अपराधियों के साथ रहते हुए उनका मनोविज्ञान, सामाजिक आर्थिक कारण और मनःस्थिति को गहराई से जाना। उनके बाद के उपन्यासों और कहानियों में अपराधियों का जो सजीव चित्रण दिखाई पड़ता है, उसका मूल इसी कारावास में है। दोस्तोयेव्स्की ने कारावास भोगा लेकिन चेखव कारावास देखा। इसके लिए उन्होंने रूस के सबसे बड़े द्वीप, जो उत्तर प्रशांत महासागर में, जापान के करीब है सखालिन की यात्रा की। दोस्तोयेव्स्की के कारावास के लगभग चालीस साल बाद चेखव ने 1890 सखालिन की यात्रा की। यह जारकालीन ‘पेनल कॉलोनी’ (दंड कॉलोनी या उपनिवेश, जहाँ सरकार कैदियों को सज़ा के तौर पर निर्वासित कर देती है, उन्हें मुख्य आबादी से अलग रखा जाता है) अंडमान की तरह यहाँ अपराधियों और अवांछितों को भेजकर लगभग भुला दिया जाता था। चेखव ने यहाँ निर्वासितों का नारकीय जीवन, यहाँ की क्रूरता और भ्रष्टाचार का साक्षात अनुभव किया। यह पूरी यात्रा लगभग 11 सप्ताह की थी। चेखव की उम्र उस समय 29 वर्ष थी। चेखव ने वहाँ हजारों लोगों के साक्षात्कार किए और वहाँ की स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति देखी-पुरानी दवाइयाँ, टूटे उपकरण, घावों को गन्दे कपड़ों से बाँधा जाना देखा, कैदियों के परिवारों की असहनीय हालत देखी और देखा कैदियों की पत्नियाँ और बच्चे भी कैदी बने हुए हैं। उन्होंने देखा कि सज़ा पूरी होने के बाद भी वे आधी आज़ादी और आधी कैदी जैसी ज़िन्दगी जी रहे हैं। एक जगह चेखव ने लिखा कि यह स्थान मानव गरिमा के सबसे दुखद पतन के दृश्य दिखाता है। यह अकारण नहीं है कि चेखव को सखालिन यात्रा ने चेखव के लेखन को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने ‘वार्ड नंबर छह’ और ‘दि चैरी ओरकार्ड’ जैसी कई कहानियाँ लिखीं। इन कहानियों में जो मानवीय पीड़ा की गहरी समझ है वह सखालिन अनुभवों की ही देन है। निस्संदेह दोस्तोयेव्स्की ने कारावास के अनुभवों को भोगा और चेखव ने उन्हें देखा। भोगने और देखने का फ़र्क दोनों के लेखन में भी दिखाई पड़ता है। बावज़ूद इसके दोनों ही मानवीय पीड़ा को गहराई से चित्रित करते हैं।
लेकिन एक और लेखक हैं जिसने कारावास को ‘फैंटेसाइज़’ किया। बीसवीं सदी के फ्रांज़ काफ़्का ने ऐसी कहानियाँ लिखीं जो मनुष्य की चेतना को जकड़े रहती हैं लेकिन दिखाई नहीं देतीं। उन्होंने एक ऐसे ‘दंडद्वीप’ की कल्पना की जहाँ लोगों को अकारण मृत्युदंड की सज़ा दे दी जाती है, ना सज़ा देने वाला जानता है कि वह क्यों सज़ा दे रहा है और न पाने वाला कि उसे सज़ा क्यों दी गई। ‘दंडद्वीप में’ काफ़्का गत होती व्यवस्था की जड़ता पर कुठाराघात करते हैं-‘पुराने वक्त में मृत्युदंड को हमारे द्वीप में एक उत्सव पर्व की तरह मनाया जाता था। दिन भर घाटी में दर्शकों को तांता लगा रहता था…ये कुर्सियों का ढेर उसी युग की दुखद यादगार है। यंत्र चुस्त दुरुस्त और चमचमाता हुआ होता था। मुझे हर मृत्युदंड से पहले नए पुर्जे उपलब्ध कराए जाते थे। पंजों पर खड़े सैकड़ों दर्शकों के बीच कमांडेंट स्वयं अपराधी को अपने हाथों से सुइयों के नीचे लिटाता था, जो आज एक मामूली सिपाही का काम रह गया है, उस वक्त मेरे लिए होता था, यानी एक दंडाधिकारी का काम, जो मेरे लिए सम्मान की बात होती थी।‘ अपराध बोध और यातना के कथ्य पर आधारित यह कहानी पूरी व्यवस्था को ही एक दंडद्वीप में बदल देती है, जहाँ किसी को भी, कभी भी यातना दी जा सकती है। यह एक अलग तरह का कारावास है।
…तो दोस्तोव्स्की ने कारावास बाकायदा भोगा, चेखव ने उसे करीब से देखा और काफ़्का ने व्यवस्था के क्रूरतम रूप को ‘फैंटेसाइज़’ करके एक दंडद्वीप बना दिया।
अब आते हैं विवेक मिश्र की कहानी ‘कारा’ पर। कहानी में तपन है जो जानकारियाँ जुटाने वाला पत्रकार है, प्रशांत जानकारियों से किस्से गढ़ने वाला लेखक है। दोनों की शानदार जोड़ी है। अपनी खोज के चलते तपन एक दिन अचानक दक्षिण अफ्रीका के गुमनाम टापू पर बनी जेल में पहुँच जाता है। उसे दुनियाभर के कारीग़रों, कलाकारों, लेखकों, कवियों के उस दर्द का पता चलता है, पता चलता है उनकी घुटन और कुण्ठा से पैदा हुई भयावह बीमारी के विषय में। दूसरा विश्वयुद्ध देख चुकी कुछ बूढ़ी आँखों में उसे एक डर दिखाई देता है। टापू के आसपास बहुत सी दफ्न कहानियाँ भी तपन को मिलती हैं। उसे लगता है यह पूंजी और बाज़ार की ताक़तों का खेल है। तभी दुनिया के हुनरमंद लोग जो अपनी अलग सोच समझ रखते थे, कुछ नया बना सकते थे, कुछ नया खड़ा कर सकते थे। उन्हें अपहृत करके उनके हुनर से महरूम कर दिया गया। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से पकड़कर उन्हें जेल में लाया गया था। उनसे अपेक्षा की जा रही थी कि वे जो कुछ भी जानते हैं, सब अपने बयानों में दर्ज़ कराकर, उसे सदा के लिए अपनी स्मृति से मिटा दें। क्या ये कहानी किसी ऐसी तकनालॉजी (भविष्य की) ओर इशारा कर रही है जो मनुष्य के दिमाग़ों से तमाम ज़रूरी और अनोखे विचारों को जबरन निकालकर भविष्य की किसी अज्ञात शक्ति के लिए विचारों का बैंक बना रही है? पूरी कहानी तपन द्वारा दक्षिण अफ्रीका से प्रशांत को भेजी गई डायरी के ज़रिए आगे बढ़ती है। तपन ने यह डायरी दक्षिण अफ्रीका में एक्सीडेंट में मरने से पहले ही प्रशांत को भेज दी थी। डायरी पढ़ते हुए प्रशांत को लगता है कि वह स्वयं बहुत से क़ैदियों से साक्षात्कार कर रहा है। उसे एक बूढ़े की काँपती हुई आवाज़ सुनाई पड़ती है, युद्ध की हार जीत, इससे हुए हजारों मौतें सब पहले से ही तय था, पूँजी की ताकत केवल तमाशे-प्रतियोगिताएँ ही प्रायोजित नहीं करतीं, अपने लाभ के लिए उन्हें विकराल बनाती है और तब तक चलाए रखती है, जब तक उपना लक्ष्य नहीं पा लेती। डायरी में जेलों की बहुत सी यातना कथाएँ दर्ज हैं, जो यह संकेत करती हैं कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूँजी और बाज़ार की ताक़त एक अलग रूप में सामने आएगी। यहाँ सब कुछ बाज़ार तय करेगा। क्या विवेक मिश्र आने वाले या आ चुके उस समय की कहानी कह रहे हैं, जहाँ मनुष्य कुछ भी सोचने के लिए स्वतंत्र नहीं होगा…सब कुछ बाज़ार ही तय कर रहा होगा। और मनुष्य को इस बात का इलहाम भी नहीं होगा। कहानी में माया भी है जो तपन की प्रेमिका थी लेकिन बाद में वह प्रशांत के करीब आ गई। कहानी के अंत में प्रशांत माया के साथ दक्षिण अफ्रीका की उसी जेल के लिए रवाना हो जाता है-जहाँ से तपन नहीं उसकी भेजी डायरी आई थी। ऐसा लगता है कि यह कहानी फिर लिखी जाएगी…लिखी जानी चाहिए। कहानी यहीँ से शुरू होती दिखाई पड़ती है।
विवेक मिश्र के पास कहानियों की व्यापक रेंज है। वह नक्सलवाद (काली पहाड़ी) पर लिखते हैं तो गर्ल चाइल्ड हत्या (घड़ा) पर भी लिखते हैं, वह दलित विमर्श की बात करते हैं (ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ) तो पुलिस, राजनेता और भ्रष्टारियों के नक्सेस पर भी संजीदा नज़र रखते हैं। उनके नये संग्रह-कारा- में भी यह रेंज दिखाई देती है। इस संग्रह में उनकी दो कहानियाँ-एक घाट की दो कहानियाँ और डोंगी-एक ही मिज़ाज की है। पहली कहानी के एक छोर पर विसम्भर की नाव सवारियों से भरती है तो दूसरी तरफ़ विशालकाय मशीन किनारे से रेता उठाकर, उसकी पहली खेप ट्रक में लोड करती है। धीरे-धीरे घाट का परिवेश खुलता जाता है। घाट पर निषाद बाबा हैं, धरती और नदी के रिश्ते की देवी है, अपनी कुलदेवी की पूजा है और नाव को दूसरे छोर पर ले जाने से पहले के सभी रिचुअल्स हैं। सवारियों को इस छोर से उस छोर तक छोड़ना और मछलियाँ पकड़ना यहाँ रहने वालों का काम है। लेकिन यह कहानी मछुआरों की नहीं है, बल्कि उस माफिया की है जो नदी से रेत निकालकर उसका गला घोंट रहे हैं। रामसजीवन और विसम्भर नदी में साथ-साथ काम करते हैं। रामसजीवन की बेटी-लता और विसम्भर का बेटा बांके के भीतर एक दूसरे के प्रति वैसा ही आकर्षण है, जैसा मछुआरे का नदी से होता है। बड़ी सहजता से विवेक ने कहानी में रेत खनन और घाट पर रहने वालों पर उसके बढ़ते कुप्रभाव को दिखाया है। वहाँ ‘डोंगी’ का बोर्ड उतारकर मौर्या कंस्ट्रक्शन का बोर्ड लग गया है। यह एक वाक्य पूरी कहानी बता देता है। विवेक मिश्र फिल्म लेखन से भी जुड़े हैं। शायद तभी कहानी का अंत कलात्मक ढंग से होता है। अन्तिम वाक्य देखिएः …एक खाली डोंगी बिना किसी खिवैये के पानी पर दिशाहीन तैरती जा रही थी। जिसके एक सिरे पर लिखा था ‘बांके’।
दूसरी कहानी ‘डोंगी’ का अन्तिम वाक्य भी यही हैः…एक टूटी डोंगी, बिना किसी खिवैया के पानी पर दिशाहीन बहती चली जा रही है। यह कहानी बुद्धन काका की है, दो सौ साल बूढ़े कछुए की है, केशो की है, सदियों से बहती आ रही एक नदी की है, उसके किनारों पर दूर तक फैली रेत और उसके आसपास बसी ज़िन्दगियों की है, रेत और पानी के रिश्ते के टूटने, बर्बाद होते देखने के लिए अभिशप्त लोगों की है, जो कहती है कि इन लोगों की डोंगी, बिना किसी खिवैया के दिशाहीन बहती रहेगा…लेकिन कब तक ! दोनों ही कहानियों में अवैध रेत खनन, विस्थापन और विकास के नाम पर भ्रष्टाचार के ज़रिए ज़मीन की लूट और वहां रह रहे लोगों का जीवन दिखाई देता है। विवेक की कहानियों में दर्शन या राजनीतिक टिप्पणी भी नारों की शक्ल में नहीं आती, वह मनुष्य के जीवन से जन्म लेती है।
संग्रह में ‘जोकर’ कहानी उस व्यक्ति के दुख दर्द की कथा है, जो अपनी उदासी छिपाने के लिए चेहरे पर रंग लगाना, तरह–तरह से मुस्कराना, बच्चों को खिलौने बाँटना, बच्चों के रोने पर रोना, हँसने पर हँसना जैसी हरक़तें करनी पड़ती हैं। कहानी में एक वाक्य आता है-किसी को हँसाने के लिए जोकर बनना पड़ता है। कहानी से बाहर निकलकर देखें तो आज क्या यही स्थितियाँ नहीं है कि हम दूसरों को खुश रखने के लिए स्वयं हंसने का अभिनय करते हैं और स्वयं ही जोकर में बदलते जा रहे हैं! कहानी का त्रासद अँत इस वाक्य से होता है-जोकर नहीं मर सकता। ‘एलबम’ कहानी में विवेक भरे पूरे परिवार के होने के बावज़ूद अकेलापन झेल रहे दिव्य प्रकाश माथुर के अकेलेपन को दर्ज़ करते हैं। दिव्य प्रकाश एलबम देखते हुए ही तस्वीर में बदल जाते हैं। संग्रह की ही एक अन्य कहानी है ‘गुड़हल’। दस वर्ष के विवाहित जीवन के विषय में माधवी ने कभी किसी से कुछ नहीं कहा था। लेकिन उससे दो वर्ष बड़े रचित ने माधवी और सुनय के बीच के निर्वात को देख लिया और एक दिन माधवी के भीतर रोपे गए नैतिकता के बीज, सम्बंधों की सीमाएँ, समाज द्वारा पढ़ाए गए सही-ग़लत के पाठ के ऊँचे दरवाजे मिलकर भी भीतर की लहक को रोक नहीं पाए। छोटी सी प्यारी कहानी है जिसमें बिना कुछ कहे सब कुछ कह दिया है।
तो इस संग्रह में अलग-अलग आस्वाद और रेंज की कहानियाँ हैं। ऐसी ही एक कहानी है-हर सूरज डूबता है/ हेमिंग्वे/ लेकिन। कहानी का शीर्षक दरअसल हेमिंग्वे द्वारा 1961 में की गई आत्महत्या से पहले लिखी गई लाइनें हैं-EVERY SUN SETS…BUT… आशय यह है कि हर व्यक्ति की मृत्यु होनी है तो क्यों ना अपनी विदाई का समय वह ख़ुद तय करे। हेमिंग्वे कहते थे कि व्यक्ति आते जाते रहेंगे लेकिन अपनी जगह पर ही घूमती रहेगी। विवेक मिश्रा ने हेमिंग्वे के इसी विचार को कहानी की धुरी बनाया। इसमें वह पृथ्वी को बचाने के लिए सामूहिक आत्महत्या की पक्षधरता करते दिखाई देते हैं। जापान जैसे देश में सामूहिक आत्महत्या (हाराकीरी) एक परम्परा है। जापान में माना जाता है कि जब आपको लगे कि पृथ्वी पर आपका काम पूरा हो गया है तब आपको आत्महत्या कर लेनी चाहिए। कहानी नाटकीय ढंग से शुरू होती है। सिम को रूमा का एक मेल मिलता है जिसमें वह बताती है कि वह आत्महत्या करना चाहती है। सिम उसे खोजते हुए एक सुसाइड क्लब तक पहुँच जाती हैं, जहाँ लोगों को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया जाता है और लोग खुशी खुशी इसके लिए तैयार भी हो रहे हैं। कहानी दिल्ली और गोवा के बीच आवाजाही करती रहती है। सिम भी इस क्लब में पहुँचती है। उसे एक मेल मिलती है जिसमें लिखा है-मैं अपनी मृत्यु के बहुत करीब हूँ, पर मैं बिल्कुल दुखी नहीं हूँ। मैं स्वेच्छा से जीवन त्यागने और मृत्यु को चुनने के आनन्द को समझ चुकी हूँ। मौत के इस कारोबार में सिम, रूमा और उनके कॉलेज के प्रोफेसर दयाल मुखिया के रूप में दिखाई पड़ते हैं…क्या ये सब डूब जाते हैं या….। विवेक मिश्रा का मकसद आत्महत्या करना नहीं बल्कि पृथ्वी को बचाने का प्रयास करना है।
विवेक मिश्र का यह कहानी संग्रह बताता है कि कहानियाँ, अपने रियल अनुभवों से, रिसर्च से और वैचारिकता से भी लिखी जा सकती हैं और लिखी जा रही हैं। मुख्य बात यह है कि वह मनुष्य से कनेक्ट करे। निस्संदेह ‘कारा’ मनुष्य से कनेक्ट करता है।
संग्रहः कारा
लेखकः विवेक मिश्र
प्रकाशकः सेतु प्रकाशन
मूल्यः 250
पृष्ठः 144

