सिंधु जल संधि (IWT) पर, पाकिस्तान ने कुछ दिन पहले हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) के फैसले के बाद एक बयान जारी किया है। बयान में कहा गया है- ‘पाकिस्तान सिंधु जल संधि, उसके विवाद-निपटान प्रक्रियाओं और पानी से जुड़े मतभेदों के शांतिपूर्ण समाधान के प्रति प्रतिबद्ध बना हुआ है। पाकिस्तान सिंदु जल संधि के तहत अपने अधिकारों की रक्षा करना जारी रखेगा और यह सुनिश्चित करने के लिए हर कानूनी और कूटनीतिक माध्यम अपनाएगा कि पश्चिमी नदियों पर बनने वाली जलविद्युत परियोजनाओं का डिज़ाइन और संचालन संधि की सीमाओं के भीतर सख्ती से किया जाए।’
सवाल है कि इस मुद्दे पर PCA के फैसले और पाकिस्तान के बयान पर भारत की प्रतिक्रिया क्या है? अगर सच कहा जाए, तो भारत ने साफ कर दिया है कि IWT 23 अप्रैल 2025 से जिस तरह स्थगन में है, वह आगे भी जारी रहेगा। जैसा कि उम्मीद थी, भारत ने कहा है कि वह PCA के फैसले को मान्यता नहीं देता, क्योंकि उसने उसकी कार्यवाही का बहिष्कार किया था।
तो PCA के फैसले के बाद जमीन पर क्या बदला है, खासकर उन विभिन्न परियोजनाओं के संबंध में जिन्हें भारत पहले ही शुरू कर चुका है, या निकट भविष्य में शुरू करने की योजना बना रहा है? जवाब है- कुछ भी नहीं। जमीन पर कोई बदलाव नहीं है, क्योंकि PCA के पास अपने फैसले को लागू करवाने का कोई तरीका नहीं है।
PCA के फैसले के बाद भी भारत अभी सिंधु प्रणाली की छह नदियों पर स्थित लगभग 280 स्थानों से जुड़े आंकड़े पाकिस्तान के साथ साझा करना शुरू नहीं करेगा।
PCA के फैसले के बाद, भारत चिनाब नदी पर रतले जलविद्युत परियोजना के काम को धीमा नहीं करेगा और न ही इसका असर किशनगंगा परियोजना पर पड़ेगा। ये वही दो परियोजनाएं थीं जो PCA की कार्यवाही के केंद्र में थीं। 330 मेगावाट की किशनगंगा परियोजना को लेकर NHPC ने जो भी योजना बनाई है, वह पाकिस्तान की आपत्तियों की परवाह किए बिना उस पर आगे बढ़ेगा। संयोग से, किशनगंगा परियोजना कई वर्ष पहले पूरी हो चुकी थी और नियमित व्यावसायिक उत्पादन कर रही है।
किशनगंगा परियोजना के सामने एक समस्या गाद (sediment) प्रबंधन को लेकर आई थी, यानी इसकी टर्बाइनों के ठीक तरह से संचालन के लिए गाद की निकासी (flushing of sediments) जरूरी रहती है। हालांकि, पिछले वर्ष संधि को स्थगन में जाने के बाद, परियोजना इंजीनियरों ने 1960 की संधि के प्रावधानों से आगे बढ़कर कदम उठाए हैं। ये कदम इस साल भी, जब-जब जरूरत होगी, उठाए जाएंगे।
PCA की संरचना और भारत का बहिष्कार
हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) में, जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच विवादों को लेकर सुनवाई होनी होती है, तब उसमें सात जज होने चाहिए। दोनों देशों द्वारा दो-दो जज अदालत में नामित किए जाते हैं। अन्य तीन जजों, जिनमें अध्यक्ष भी शामिल होता है, का चयन एक स्पष्ट रूप से निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जाता है।
यही प्रक्रिया तब अपनाई गई थी जब एक दशक से अधिक पहले किशनगंगा परियोजना पर सुनवाई के लिए PCA का गठन किया गया था। उसमें भारत द्वारा नामित जज थे। पाकिस्तान द्वारा नामित जज थे और सुनवाई निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हुई थी। भारतीय पक्ष की दलीलों में लगभग 7,000 पन्नों में दिए गए स्पष्टीकरण शामिल थे।
लेकिन इस बार, जब कुछ वर्ष पहले PCA का गठन किया गया, तब भारत ने कार्यवाही से बाहर निकलने और उसमें शामिल न होने का फैसला किया। भारत ने कहा कि न्यूट्रल एक्सपर्ट और PCA के समक्ष किसी भी मुद्दे पर एक साथ कार्यवाही नहीं हो सकती। भारत का तर्क है कि 1960 की संधि विवादों के समाधान के लिए एक चरणबद्ध व्यवस्था प्रदान करता है, यानी यह तीन चरणों वाली प्रक्रिया है।
पहला चरण यह है कि किसी भी समस्या पर परमानेंट इंडस कमीशन (PIC) के स्तर पर चर्चा की जाए और उसे सुलझाने की कोशिश की जाए। यदि PIC में हुई चर्चाओं से मुद्दे का समाधान नहीं निकलता, तो मामला अगले स्तर पर भेजा जाता है और आपसी सहमति से एक न्यूट्रल एक्सपर्ट नियुक्त किया जाता है। विवाद समाधान के तीसरे चरण में, यदि दोनों पक्ष यह तय करते हैं कि मामला न्यूट्रल एक्सपर्ट के पास नहीं भेजा जाना है, तो एक परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) का गठन किया जाता है। यह भी आपसी सहमति से होता है।
विश्व बैंक न्यूट्रल एक्सपर्ट और PCA की नियुक्ति में भूमिका निभाता है। हालांकि, छह दशकों से संधि के संचालन की पुरानी व्यवस्था से हटते हुए, उसने रतले और किशनगंगा परियोजनाओं पर सुनवाई के लिए एक साथ न्यूट्रल एक्सपर्ट और PCA- दोनों ही नियुक्त कर दिए।
एक साथ दोनों प्रक्रियाएं और उपजे सवाल
न्यूट्रल एक्सपर्ट की नियुक्ति और PCA का गठन एक साथ होना पहले कभी नहीं हुआ था। भारत ने तर्क दिया कि ऐसी स्थिति में दोनों मंच अलग-अलग और एक-दूसरे से भिन्न फैसलों पर पहुंच सकते हैं। उस स्थिति में किसका फैसला प्रभावी माना जाएगा? यहां यह भी जानना जरूरी है कि किसी भी मामले की सुनवाई कर रहा न्यूट्रल एक्सपर्ट असल में PCA के अधीनस्थ नहीं होता।
न्यूट्रल एक्सपर्ट के पास वह सारी शक्तियां होती हैं, जिनकी जरूरत उसके निर्णय को दोनों पक्षों पर बाध्यकारी बनाने के लिए होती है।
न्यूट्रल एक्सपर्ट और PCA की एक साथ नियुक्ति ने एक विचित्र स्थिति पैदा कर दी थी। इसके बाद भारत ने आर्बिट्रेशन कार्यवाही का बहिष्कार किया। वहीं, भारत ने न्यूट्रल एक्सपर्ट द्वारा शुरू की गई कार्यवाही में खुद को शामिल किया और उसे पाकिस्तानी डेलिगेशन के साथ किशनगंगा और रतले परियोजनाओं का दौरा करने की अनुमति भी दी।
अनुच्छेद XII (3) के तहत पाकिस्तान को नोटिस
1960 की सिंधु जल संधि के तहत कुल 12 अनुच्छेद हैं, जिनमें आखिरी अनुच्छेद XII है, जिसे “फाइनल प्रोविज़न्स” कहा जाता है। इसमें चार उपखंड हैं। इसकी धारा (iii) कहती है कि संधि में समय-समय पर आपसी विचार-विमर्श से संशोधन किया जा सकता है। इसकी धारा (iv) कहती है कि जब तक कोई नई संधि लागू नहीं होती, तब तक यह संधि प्रभावी रहेगी।
25 जनवरी 2023 को भारत ने अनुच्छेद XII (iii) के तहत पाकिस्तान को एक नोटिस दिया, जिसमें संधि में संशोधन या बदलाव की मांग की गई। पाकिस्तान ने सहयोग करने और नई संधि पर बातचीत के लिए भारत के साथ चर्चा में शामिल होने से इनकार कर दिया। लगभग 18 महीने बाद, 30 अगस्त 2024 को भारत ने संधि में संशोधन के लिए अनुच्छेद XII (iii) के तहत पाकिस्तान को दूसरा नोटिस भेजा।
पाकिस्तान ने इन दोनों नोटिसों को नजरअंदाज करना चुना और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया। इसके बजाय, वह परमानेंट इंडस कमीशन (PIC) की बैठक बुलाने और वहीं मुद्दों पर चर्चा करने की मांग करता रहा। ऐसा भारत द्वारा दिए गए दोनों नोटिसों को निष्प्रभावी बनाने की कोशिश में किया गया।
अनुच्छेद XII (iii) के तहत भारत के साथ चर्चा में शामिल होने से इनकार करके, पाकिस्तान IWT की ऐसी व्याख्या करने की कोशिश करता रहा कि मानो यह हमेशा के लिए लागू रहने वाली संधि हो। वह उस प्रावधान को दरकिनार कर रहा है, जो स्पष्ट रूप से इसमें संशोधन की व्यवस्था देता है। यह स्पष्ट रूप से पाकिस्तान की एकतरफा कार्रवाई है, जिसका उद्देश्य संधि में दिए गए एक प्रावधान को निष्प्रभावी करना है।
सिंधु जल संधि: अब आगे क्या?
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि आगे की कार्रवाई क्या रूप ले सकती है। इसकी वजह यह है कि संधि इस समय स्थगन (abeyance) में है, यानी भारत ने इसे फिलहाल रोक रखा है। साथ ही, भारत पश्चिमी नदियों के संबंध में जिन कदमों को उठाना चाहता था, उन्हें आगे बढ़ा रहा है। उसने पिछले साल 13 मई को भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) के माध्यम से कुछ परियोजनाएं शुरू की थीं।
इन परियोजनाओं में झेलम और चिनाब नदियों पर जलमार्ग विकसित करने की योजना शामिल थी। पिछले एक साल से ये परियोजनाएं बिना किसी रुकावट के चल रही हैं। उम्मीद की जा रही है कि अगले लगभग दो महीनों में ये दोनों जलमार्ग वास्तविकता बन जाएंगे।
वहीं, PCA के पास ऐसा कोई प्रवर्तन तंत्र उपलब्ध नहीं है, जिसके जरिए वह भारत को अपने फैसले का पालन करने के लिए बाध्य कर सके। इसलिए, कह सकते हैं कि फैसले के बाद भारत के लिए कुछ भी नहीं बदला।



