नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2020 में और अपने पहले कार्यकाल में पहली बार अब्राहम समझौते (Abraham Accords/अब्राहम अकॉर्ड्स) पेश किया था। उस समय इसे पश्चिम एशिया की राजनीति बदल देने वाली एक बड़ी कूटनीतिक पहल बताया गया था। मूल विचार यही था कि दशकों पुराने टकरावों को पीछे छोड़कर इजराइल और अरब देशों के बीच सीधे रिश्ते बनाए जाएं।
अब ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में यह समझौता फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार इसका दायरा और बड़ा दिखाई दे रहा है। ईरान से जुड़े संभावित समझौतों, खाड़ी देशों और यहां तक कि पाकिस्तान को भी इसमें जोड़ने की बात सामने आई है। हालांकि पाकिस्तान ने इससे दूर रहने की बात कह दी है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि अब्राहम अकॉर्ड मंजूर नहीं है और इजराइल के साथ जाना बुनियाद से हटने जैसा होगा। वैसे यही पाकिस्तान की आधिकारिक लाइन है, ये कह पाना भी अभी जल्दबाजी है।
तो सवाल है कि आखिर अब्राहम अकॉर्ड्स या समझौता आखिर क्या है? क्यों कुछ बड़े मुस्लिम देश इसके पक्ष में हैं तो कुछ इससे दूरी बना रहे हैं। इन सबके बीच सवाल ये भी कि अमेरिका से दबाव के बावजूद और ट्रंप को लगातार खुश करने की कोशिश में लगा पाकिस्तान आखिर क्यों इसके खिलाफ खड़ा है?
Abraham Accords क्या है
अब्राहम समझौता दरअसल अमेरिका की मध्यस्थता में हुए ऐसे समझौते हैं जिनके तहत इजराइल और कुछ अरब या मुस्लिम-बहुल देशों ने आपसी रिश्तों को सामान्य बनाने पर सहमति दी। इसकी शुरुआत 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान हुई थी। इसके तहत शामिल देशों ने इजराइल को औपचारिक मान्यता देने, राजनयिक संबंध स्थापित करने, दूतावास खोलने और व्यापार, तकनीक, पर्यटन, सुरक्षा तथा निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। इसका नाम ‘अब्राहम’ इसलिए रखा गया क्योंकि यहूदी, ईसाई और इस्लाम- तीनों ही धर्म अपनी आध्यात्मिक जड़ों को पैगंबर इब्राहिम (अब्राहम) से जोड़ते हैं।
इस समझौते पर शुरुआती सहमति जताने और हस्ताक्षर करने वालों में संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान शामिल थे। वहीं मिस्र और जॉर्डन पहले ही अलग शांति समझौतों के जरिए दशकों पहले इजराइल को मान्यता दे चुके थे। ट्रंप के लिए यह उनके पहले कार्यकाल की प्रमुख विदेश नीति उपलब्धियों में गिना गया। ऐसा इसलिए कि इसने उस लंबे समय से चली आ रही अरब नीति को बदलने की कोशिश की जिसमें कहा जाता था कि फिलिस्तीन स्टेट बनने से पहले इजराइल को मान्यता नहीं दी जाएगी।
ये 2020 की बात थी। अब हालांकि ट्रंप की कोशिश सिर्फ कुछ देशों तक समझौते को सीमित रखने की नहीं दिखती। वह चाहते हैं कि भविष्य में यदि ईरान के साथ कोई शांति या परमाणु समझौता होता है, तो उसके साथ अब्राहम अकॉर्ड्स का दायरा भी बढ़े। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह विचार रखा है कि सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और जॉर्डन जैसे देश भी इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करें। इस सोच के पीछे यह भी माना जा रहा है कि इससे इजराइल और प्रमुख मुस्लिम देश आर्थिक और रणनीतिक सहयोग बढ़ाएंगे और साथ मिलकर ईरान के प्रभाव को संतुलित करेंगे।
पाकिस्तान ने अब्राहम अकॉर्ड्स को क्यों ठुकराया?
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि अब्राहम समझौते में शामिल होना पाकिस्तान के लिए स्वीकार नहीं है। उन्होंने कहा कि यह उसकी ‘मूल वैचारिक प्रतिबद्धताओं’ से मेल नहीं खाता। उन्होंने इस बात का भी जिक्र एक इंटरव्यू में किया कि पाकिस्तानी पासपोर्ट इजराइल को मान्यता नहीं देते। जाहिर तौर पर अमेरिको को ‘न’ कहने की जड़ें फिलीस्तीन को लेकर उसकी शुरू से चले आ रही नीति में है।
1947 में गठन के बाद से पाकिस्तान का आधिकारिक रुख यह रहा है कि जब तक एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश की स्थापना नहीं होती, तब तक इजराइल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं बनाए जाएंगे। इस नीति को पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्तर पर भी व्यापक समर्थन मिला हुआ है।
ऐसे में इजराइल को मान्यता देना किसी भी पाकिस्तानी सरकार के लिए घरेलू स्तर पर बड़ा राजनीतिक जोखिम बन सकता है।
इस मुद्दे पर मुस्लिम देशों में मतभेद क्यों है?
इस सवाल का सबसे बड़ा जवाब फिलिस्तीन और हाल के वर्षों में गाजा युद्ध से जुड़ा है। लंबे समय तक अरब और मुस्लिम देशों के एक बड़े हिस्से का मानना रहा कि जब तक फिलिस्तीन को आजाद देश का दर्जा और राजनीतिक अधिकार नहीं मिलते, तब तक इजराइल को पूरी कूटनीतिक वैधता नहीं मिलनी चाहिए।
कई सरकारों को यह आशंका भी रहती है कि बिना फिलिस्तीनी मुद्दे पर प्रगति के अब्राहम समझौते में शामिल होना फिलिस्तीनी समर्थन छोड़ने जैसा दिख सकता है। गाजा की हाल की जंग के बाद ऐसी चर्चा और बढ़ी है। इसी वजह से कुछ देशों में इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने को लेकर सार्वजनिक समर्थन कमजोर हुआ है।
सऊदी अरब का उदाहरण इसी संदर्भ में अहम माना जाता है। माना जाता है कि उसने पहले इजराइल के साथ संभावित रिश्तों पर बातचीत की थी, लेकिन अब भी फिलिस्तीनी स्टेट की दिशा में ठोस प्रगति को वह महत्वपूर्ण शर्त मानता है।
पाकिस्तान के लिए दुविधा क्या है?
पाकिस्तान की स्थिति अधिक जटिल है। एक तरफ वह अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ रिश्ते बनाए रखना चाहता है। साथ ही कुछ मौकों पर ईरान से जुड़ी बातचीत में भी भूमिका निभाता दिखा है। दूसरी तरफ इजराइल को मान्यता देना उसकी दशकों पुरानी विदेश नीति और घरेलू राजनीति पर असर डाल सकता है।
यही वजह है कि ट्रंप की नई पहल पाकिस्तान के सामने एक कठिन सवाल बन गई है। उसने अभी फिलहाल भले ही अब्राहम अकॉर्ड्स से अलग रहने की बात कही है लेकिन इस पर अभी और मंथन जाहिर तौर पर इस्लामाबाद में होगा। पाकिस्तान को फैसला करना होगा कि क्या रणनीतिक साझेदारियों को प्राथमिकता दी जाए या लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक और वैचारिक रुख को?
यह भी पढ़ें- डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान, सऊदी समेत पांच देशों से मांगा समर्थन, अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर की अपील की



