वाशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ,सऊदी अरब, पाकिस्तान समेत पांच देशों से अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने की मांग की है। डोनाल्ड ट्रंप ने जिन पांच देशों से समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा है उनमें सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किए, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन (पहले से सदस्य) शामिल हैं। इसके अलावा पहले से सदस्य यूएई से भी समर्थन मांगा है।
डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि मौजूदा देशों को इस समझौते से काफी फायदा हुआ है और भविष्य में इससे होने वाले फायदे पहले से कहीं ज्यादा हो सकते हैं। इस दौरान ट्रंप ने ईरान के साथ समझौते को लेकर चेतावनी भी दी है कि या तो बहुत अच्छी डील होगी या फिर पहले से भी कहीं ज्यादा भीषण युद्ध होगा। ट्रंप ने इस संबंध में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर भी पोस्ट की।
डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर लिखा कि ” ईरान के साथ बातचीत अच्छी चल रही है। यह या तो सबके लिए एक अच्छी डील होगी या फिर कोई डील नहीं होगी वापस पहले से कहीं ज्यादा बड़ी और मजबूत युद्ध शुरू होगा, लेकिन कोई ऐसा नहीं चाहता है। शनिवार को सऊदी अरब के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद, यूएई के मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान, अमीर तमीम बिन हमद बिन खलीफा अल थानी, कतर के प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान बिन जसीम बिन जाबेर अल थानी और मंत्री अली अल-थवाडी, पाकिस्तान के फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर अहमद शाह, तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सिसी, जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला II और बहरीन के किंग हमद बिन ईसा अल खलीफा के साथ अपनी बातचीत के दौरान मैंने कहा कि इस बहुत मुश्किल पहेली को सुलझाने के लिए अमेरिका ने जो भी काम किया है, उसके बाद यह जरूरी होना चाहिए कि ये सभी देश, कम से कम, एक साथ, अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करें।”
उन्होंने कहा, “जिन देशों पर बात हुई है, वे सऊदी अरब, यूएई (पहले से सदस्य!), कतर, पाकिस्तान, तुर्किए, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन (पहले से सदस्य!) हैं। हो सकता है कि एक या दो देशों के पास ऐसा न करने की वजह हो और उसे मान लिया जाए, लेकिन ज्यादातर देश ईरान के साथ इस सेटलमेंट को कहीं ज्यादा ऐतिहासिक इवेंट बनाने के लिए तैयार, इच्छुक और काबिल होने चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा कि अब्राहम समझौते में शामिल देशों यूएई, बहरीन, मोरक्को, सूडान और कजाकिस्तान के लिए यह समझौता आर्थिक, वित्तीय और सामाजिक तौर पर बेहद फायदेमंद साबित हुआ है। यहां तक कि मौजूदा संघर्ष और युद्ध जैसे हालात के बीच भी किसी सदस्य देश ने इससे बाहर निकलने या इसे रोकने तक का सुझाव नहीं दिया।
अब्राहम समझौते से मिले ठोस लाभ
ट्रंप ने कहा कि इसकी वजह यह है कि अब्राहम समझौते से इन देशों को ठोस लाभ मिले हैं और माना जा रहा है कि भविष्य में इससे और भी बड़े फायदे सामने आ सकते हैं। समर्थकों का दावा है कि यह पहल मध्य पूर्व में पहली बार वास्तविक ताकत, स्थिरता और शांति लाने की क्षमता रखती है। उनके मुताबिक, यह ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज बन सकता है जिसे दुनिया में कहीं भी हुए अन्य समझौतों की तरह नहीं, बल्कि उससे भी ज्यादा सम्मान मिलेगा।
अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि ” इसकी शुरुआत सऊदी अरब और कतर को तुरंत साइन करने से करनी चाहिए और बाकी सभी को भी ऐसा ही करना चाहिए। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें इस डील का हिस्सा नहीं होना चाहिए क्योंकि यह गलत इरादा दिखाता है। ऊपर बताए गए कई महान लीडर्स से बात करने पर उन्हें गर्व होगा जैसे ही हमारे डॉक्यूमेंट पर साइन हो जाएंगे, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान को अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनाना। वाह, यह तो कुछ खास होगा। यह सबसे महत्वपूर्ण डील होगी जिस पर ये महान, लेकिन हमेशा विवादों से घिरे रहने वाले देश कभी हस्ताक्षर करेंगे। न तो पहले कभी कोई डील हुई है और न ही भविष्य में, इससे बेहतर कुछ होगा।”
अब्राहम समझौता क्या है?
बताते चलें कि अब्राहम समझौते की शुरुआत ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान की थी। इसकी शुरुआत 2020 में हुई थी। इसके तहत इजरायल और अरब देशों के बीच आधिकारिक तौर पर संबंध की शुरुआत हुई थी। यहूदी, ईसाई और इस्लाम के पैगंबर के नाम पर ही इस समझौते का नाम अब्राहम रखा गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति की पहल पर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने इजरायल के साथ संबंध स्थापित किए। फिलिस्तीन को लेकर इजरायल और अन्य मुस्लिम देशों के बीच काफी तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई थी। हालांकि इस समझौते के तहत अरब और मुस्लिम देशों ने इजरायल के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए।
यूएई के बाद मोरक्को, बहरीन और सूडान भी इसमें शामिल हुए। समझौते से जुड़े देशों ने इजरायल में अपनी एंबेसी खोलने पर सहमति जताई। इसके साथ ही व्यापार और पर्यटन की भी शुरुआत हुई। हालांकि गाजा में इजरायल के युद्ध का इस समझौते पर गहरा असर पड़ा।
बीते कुछ सालों से इस समझौते में कोई प्रगति देखने को नहीं मिली। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने हालांकि हाल ही में जानकारी दी है कि इस समझौते में अब अन्य कई मुस्लिम देश भी शामिल होंगे। इसका ऐलान आधिकारिक तौर पर किया जाएगा।
ध्यान रहे कि पाकिस्तान समेत कई देश हैं जो इजरायल को लेकर सकारात्मक विचार नहीं रखते। खासतौर से फिलिस्तीन के गाजापट्टी में हमास के खिलाफ इजरायल की कार्रवाई के बाद से कई मुस्लिम देशों ने यहूदी देश का पुरजोर विरोध किया है। इसमें पाकिस्तान भी शामिल है। हालांकि इजरायल भी पाकिस्तान को लेकर कुछ खास सकारात्मक सोच नहीं रखता। हाल के समय में इजरायली अधिकारी की तरफ से इस तरह के बयान भी सामने आए थे, जिसमें कहा गया कि इजरायल उन्हीं देशों पर भरोसा करता है, जिनके साथ उसके डिप्लोमेटिक संबंध है। पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अमेरिका के कहने पर पाकिस्तान इजरायल के साथ सुलह करने के लिए राजी होगा या नहीं।
(समाचार एजेंसी आईएएनएस से इनपुट्स के साथ)



