Home मनोरंजन जब तीजन बाई तंबूरा उठाती थीं, महाभारत मंच पर उतर आता था…

जब तीजन बाई तंबूरा उठाती थीं, महाभारत मंच पर उतर आता था…

तीजन बाई अक्सर कहा करती थीं कि शिक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं होती। उनका मानना था कि सीखने की शुरुआत घर से होती है और हर व्यक्ति को जीवन भर सीखते रहना चाहिए।

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तीजन बाई। फोटोः IANS

रायपुर: शनिवार पंडवानी की बुलंद आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। तीजन बाई नहीं रहीं। छत्तीसगढ़ की वह लोकगायिका जिसने महाभारत की कथाओं को गांव की चौपाल से निकालकर दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक मंचों तक पहुंचाया।

24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में एक साधारण परिवार में जन्मी तीजन बाई का बचपन अभावों में बीता। बेटी के जन्म पर परिवार खुश नहीं था और आर्थिक तंगी के कारण उन्हें कभी स्कूल जाने का मौका भी नहीं मिला। वे पढ़ना-लिखना नहीं सीख सकीं और जीवन भर केवल अपने हस्ताक्षर ही कर पाईं।

लेकिन शिक्षा की कमी उनके ज्ञान के रास्ते में कभी बाधा नहीं बनी। बचपन में उन्होंने अपने नाना के भाई बृजलाल पारधी से महाभारत की कथाएं सुनीं। यही कथाएं आगे चलकर उनके जीवन का आधार बनीं। वे कहा करती थीं कि उन्होंने स्कूल नहीं देखा, लेकिन बचपन में जो सीखा, उसी ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई।

जब महिलाओं को मंच पर खड़े होकर गाने की इजाजत नहीं थी

जिस दौर में तीजन बाई ने पंडवानी सीखनी शुरू की, उस समय यह कला लगभग पूरी तरह पुरुषों के वर्चस्व वाली मानी जाती थी। महिलाएं केवल बैठकर वेदमती शैली में पंडवानी गा सकती थीं। अभिनय, संवाद और भाव-भंगिमाओं के साथ खड़े होकर प्रस्तुति देने वाली कपालिक शैली पुरुषों तक सीमित थी। तीजन बाई ने इस परंपरा को तोड़ दिया।

महज 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने दुर्ग जिले के चंद्रखुरी गांव में पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। बाद में उन्होंने कपालिक शैली अपनाई और अपनी दमदार आवाज, अभिनय और संवादों से पंडवानी को नया रूप दिया। लाल साड़ी पहनकर हाथ में तंबूरा लिए जब वे मंच पर उतरती थीं तो दर्शकों को लगता था कि महाभारत के पात्र उनके सामने जीवंत हो उठे हैं।

एक तंबूरा, जो कभी गदा बनता था तो कभी गांडीव

तीजन बाई की प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता उनका तंबूरा था। यह केवल एक वाद्य यंत्र नहीं रहता था। उनके हाथों में वही तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी श्रीकृष्ण की बांसुरी, कभी अर्जुन का धनुष और कभी हाथी की सूंड।

उनकी प्रसिद्ध प्रस्तुतियों में द्रौपदी चीरहरण, दुःशासन वध और भीष्म-अर्जुन युद्ध जैसे प्रसंग शामिल रहे। गायन, अभिनय, संवाद और भावों का ऐसा संगम शायद ही किसी अन्य लोक कलाकार ने प्रस्तुत किया हो।

तीजन बाई का जीवन आसान नहीं था। कम उम्र में उनका विवाह कर दिया गया। समाज को उनका गाना पसंद नहीं था। पंडवानी गाने के कारण उन्हें सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने दम पर जीवन शुरू किया और दूसरे गांव में रहकर पंडवानी गाकर आजीविका कमाई। यही संघर्ष आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।

Female Indian classical singer in a red sari and gold jewelry sings into a microphone on a decorated stage, with two seated musicians in yellow shirts behind her.
तीजन बाई फोटोः IANS

प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें बड़े मंचों तक पहुंचाया। इसके बाद तीजन बाई ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने देश के साथ-साथ इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, तुर्किये, मॉरीशस, जापान सहित 17 से अधिक देशों में पंडवानी की प्रस्तुतियां दीं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी समेत अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हस्तियों के सामने उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया। उनकी वजह से छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को वैश्विक पहचान मिली।

तीजन बाई अक्सर कहा करती थीं कि शिक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं होती। उनका मानना था कि सीखने की शुरुआत घर से होती है और हर व्यक्ति को जीवन भर सीखते रहना चाहिए। वे नई पीढ़ी को अपनी कला सिखाने पर विशेष जोर देती थीं। उनका विश्वास था कि जैसे माता-पिता बच्चों को संस्कार देते हैं, वैसे ही कलाकारों और शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वे समाज की संस्कृति और परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं।

‘सम्मानों’ से भरा रहा सफर

तीजन बाई को उनके योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें 1988 में पद्मश्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 में पद्म भूषण, 2018 में जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार और 2019 में देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण प्रदान किया गया। इसके अलावा बिलासपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट. की उपाधि से भी सम्मानित किया।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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