बिहार में बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को लेकर चर्चा तेज हो चली है। इसकी एक सबसे बड़ी वजह हैं जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर, जो यहीं से अपना पहला चुनाव लड़ने जा रहे हैं। इसे लेकर आधिकारिक ऐलान रविवार को कर दिया गया। पिछले साल बिहार चुनाव में नहीं उतरे प्रशांत किशोर के अब मैदान में उतरने के ऐलान ने बांकीपुर उपचुनाव को रोचक बना दिया है।
30 जुलाई को बांकीपुर में वोट डाले जाएंगे। वोटों की गिनती 3 अगस्त को होनी है। हालांकि, अब यह मुकाबला सिर्फ एक विधानसभा सीट का नहीं रह गया है, बल्कि भाजपा की प्रतिष्ठा, महागठबंधन की रणनीति और खुद प्रशांत किशोर की राजनीतिक विश्वसनीयता की परीक्षा बनता दिख रहा है।
बांकीपुर का जातीय और सामाजिक समीकरण क्या है?
पटना का बांकीपुर शहरी विधानसभा क्षेत्र है और इसे पारंपरिक रूप से कायस्थ बहुल सीट माना जाता है। इसके अलावा यहां भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत भी बड़ी तादाद में हैं। इसके अलावा यादव, मुस्लिम, कुर्मी, कुशवाहा, दलित और अति पिछड़े वर्ग के मतदाता भी प्रभावी संख्या में हैं। वैसे, बांकीपुर में जातीय समीकरण किस पक्ष में रहता है, उसका एक उदाहरण 2025 के चुनाव के उम्मीदवारों की लिस्ट से भी मिलता है। पिछले साल इस सीट पर कुल 10 उम्मीदवार खड़े थे और ये सभी सामान्य वर्ग से थे।
इस चुनाव में भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने 51 हजार से अधिक वोटों से जीत दर्ज की थी। कुल मिलाकर दूसरे शब्दों में कहें तो इस सीट पर शहरी मध्यम वर्ग, व्यापारी समुदाय और उच्च जातियों का रुझान लंबे समय से भाजपा के पक्ष में रहा है। यही वजह है कि विपक्ष यहां लगातार बड़े अंतर से हारता रहा है। बीते 30 सालों से भाजपा का दबदबा यहां रहा है। ऐसे में प्रशांत किशोर को सिर्फ जातीय समीकरण नहीं, बल्कि भाजपा के मजबूत संगठन और उसके परंपरागत वोट बैंक से भी मुकाबला करना होगा।
भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल
बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की रही है, जिन्होंने लगातार यहां जीत दर्ज की। उनके राज्यसभा जाने के बाद सीट खाली हुई है और अब यहां उपचुनाव हो रहा है। ऐसे में भाजपा किसी भी कीमत पर इस सीट को गंवाना नहीं चाहेगी। यदि प्रशांत किशोर भाजपा को कड़ी टक्कर देते हैं या चुनाव जीत जाते हैं, तो इसे सिर्फ एक सीट की हार नहीं बल्कि भाजपा नेतृत्व की प्रतिष्ठा पर चोट के रूप में पेश किया जाएगा।
महागठबंधन की बढ़ी उलझन
प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी ने महागठबंधन के सामने भी नई चुनौती खड़ी कर दी है। कांग्रेस के कुछ नेताओं की ओर से यह राय सामने आई है कि भाजपा को चुनौती देने के लिए विपक्ष को प्रशांत किशोर का समर्थन करने पर विचार करना चाहिए। दूसरी ओर राजद अपनी दावेदारी छोड़ने के मूड में नहीं दिख रही है और वह अपना उम्मीदवार उतारना चाहती है। इसने महागठबंधन के भीतर रणनीतिक मतभेद की चर्चा तेज कर दी है।
दिलचस्प बात यह भी है कि यदि विपक्ष प्रशांत किशोर का समर्थन करता है या प्रशांत किशोर विपक्ष के समर्थन पर निर्भर होते हैं, तब भी यह उनके लिए आसान स्थिति नहीं होगी।
इसकी सबसे बड़ी वजह उनका अपना राजनीतिक नैरेटिव है। पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर ने सबसे ज्यादा हमले राष्ट्रीय जनता दल, लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव पर किए थे। उन्होंने लगातार दावा किया था कि बिहार की बदहाली के लिए भाजपा और राजद दोनों समान रूप से जिम्मेदार हैं और जन सुराज दोनों का विकल्प है।
पीके की भी अपनी परीक्षा…हार या जीत?
यह चुनाव सबसे ज्यादा अहम खुद प्रशांत किशोर के लिए भी है। चुनावी रणनीतिकार के रूप में उन्होंने कई नेताओं को सत्ता तक पहुंचाया, लेकिन बतौर नेता उनकी पार्टी जन सुराज पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में कोई सीट नहीं जीत सकी थी। ऐसे में अब पहली बार प्रशांत किशोर खुद जनता के बीच वोट मांग रहे हैं।
यदि वे जीतते हैं तो यह जन सुराज को नई राजनीतिक पहचान देगा और बिहार की राजनीति में तीसरे विकल्प की उनकी दावेदारी मजबूत होगी। लेकिन यदि वे हारते हैं तो विरोधी यह सवाल उठाएंगे कि जो रणनीतिकार दूसरों को चुनाव जिताने की सलाह देता था, वह खुद जनता का भरोसा क्यों नहीं जीत पाया।
वैसे एक बात ये भी है कि प्रशांत किशोर के बांकीपुर चुनाव लड़ने का फैसला रातों-रात नहीं हुई। इसके लिए लंबे समय से तैयारी चल रही थी। पिछले करीब डेढ़ महीने से ऐसी अटकलें लगाई जा रही थी। प्रशांत किशोर खुद इस बीच बांकीपुर का दौरा कई बार कर चुके हैं। उनकी टीम लगातार जमीन पर आंकड़े जुटाने में लगी थी, जिस काम में किशोर की महारत मानी भी जाती है। जाहिर है पूरी तैयारी, डेटा और समीकरणों को ध्यान में रखते हुए ही प्रशांत किशोर ने कदम आगे बढ़ाया है।
प्रशांत किशोर ने बांकीपुर ही क्यों चुना?
वैसे सवाल ये भी है कि प्रशांत किशोर ने आखिर चुनावी मैदान में उतरने के लिए बांकीपुर की सीट ही क्यों चुनी, जबकि यहां भाजपा हमेशा से मजबूत रही है। इसका एक जवाब ये हो सकता है कि संभव है कि किशोर एंड टीम को लगता होगा कि भाजपा के पास इस सीट के लिए अब कोई बड़ा चेहरा नहीं है और वे (प्रशांत किशोर) इसका फायदा उठा सकते हैं।
इसके अलावा उनका एक दिलचस्प बयान भी रविवार को आया। इसमें सम्राट चौधरी का नाम लेकर प्रशांत किशोर ने भाजपा को घेरने की कोशिश की। उन्होंने बांकीपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘मोदी जी तो आपसे बात करने नहीं आएंगे। आज भी नहीं आएंगे, पांच साल बाद भी नहीं आएंगे। मोदी जी को कैसे पता चलेगा कि सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने से आपलोग खुश नहीं हैं। भाजपा को बांकीपुर से हराइए। उन तक खबर अपने आप पहुंच जाएगी कि उन्होंने जिसका चुनाव किया है, उससे आप सहमत नहीं हैं।’
प्रशांत किशोर अपने इस बयान के जरिए जातीय समीकरण को साधने की कोशिश कर रहे थे या फिर बात कुछ और, फिलहाल इसके लेकर केवल अटकलबाजी ही की जा सकती है। अहम ये है कि बांकीपुर का उपचुनाव इसलिए खास है क्योंकि यहां तीन अलग-अलग राजनीतिक परीक्षाएं एक साथ हो रही हैं।
भाजपा के लिए यह अपने गढ़ और राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट बचाने की चुनौती है। महागठबंधन के लिए यह विपक्षी एकजुटता की परीक्षा है। वहीं प्रशांत किशोर के लिए यह उनके राजनीतिक भविष्य, विश्वसनीयता और जन सुराज की स्वीकार्यता का सबसे बड़ा टेस्ट है। ऐसे में ऊंट किस करवट बैठेगा, ये समय तय करेगा। फिलहाल इंतजार इसका भी है कि भाजपा यहां से किसे मैदान में उतारती है और महागठबंधन का कदम क्या रहेगा।
यही वजह है कि बांकीपुर का परिणाम सिर्फ एक विधायक नहीं चुनेगा, बल्कि बिहार की राजनीति में आगे बनने वाले राजनीतिक समीकरणों की दिशा भी काफी हद तक तय कर सकता है।
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