
आज (20 जुलाई) भारतीय सिनेमा के सबसे मंजे हुए, बेबाक और सर्वकालिक महान अभिनेताओं में शुमार नसीरुद्दीन शाह अपना 76वां जन्मदिन मना रहे हैं। पांच दशकों से अधिक लंबे अपने करियर में 150 से ज्यादा फिल्मों और अनगिनत नाटकों के जरिए उन्होंने अभिनय का एक ऐसा पैमाना तय किया है, जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।
चाहे ‘स्पर्श’, ‘आक्रोश’ और ‘मंथन’ जैसी कलात्मक फिल्में हों, या फिर ‘त्रिदेव’, ‘मोहरा’, ‘सरफरोश’ और ‘ए वेडनेसडे’ जैसी व्यावसायिक ब्लॉकबस्टर फिल्में- नसीर ने हर दौर में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया है। उनके जन्मदिन के इस खास मौके पर हम आपके साथ साझा करने जा रहे हैं उनकी जिंदगी का वही अनसुना किस्सा जब उनके ही एक करीबी साथी की जलन कातिलाना हमले में बदल गई थी और ओम पुरी ने अपनी जान पर खेलकर नसीरुद्दीन की जान बचाई थीं।
1970 के दशक के उत्तरार्ध में जब श्याम बेनेगल की फिल्म ‘भूमिका’ और ‘मंथन’ का दौर चल रहा था, तब नसीरुद्दीन शाह को एक के बाद एक बड़ी कलात्मक फिल्मों के ऑफर मिल रहे थे। एनएसडी दिल्ली और एफटीआईआई पुणे में उनके सहपाठी रहे राजेंद्र जसपाल, जिन्होंने ‘मंथन’ में स्मिता पाटिल के पति की भूमिका निभाई थी, उस समय काम के लिए संघर्ष कर रहे थे। 1947 में लुधियाना के जस्पाल बांगर गांव में जन्मे राजेंद्र जसपाल एक खूबसूरत, सुडौल शरीर वाले, शास्त्रीय संगीत में पारंगत और एक बेहतरीन पंजाबी जीवंत कलाकार थे।
21 अक्टूबर 1947 को पंजाब के लुधियाना जिले के जस्पाल बांगर गांव में जन्मे राजेंद्र जसपाल को उस दौर का बेहद प्रतिभाशाली अभिनेता माना जाता था। वे एक खूबसूरत, सुडौल शरीर वाले, शास्त्रीय संगीत में पारंगत और एक बेहतरीन पंजाबी जीवंत कलाकार थे। नसीरुद्दीन शाह ने अपनी आत्मकथा ‘एंड देन वन डे: ए मेमॉयर’ में भी स्वीकार किया है कि “कई मायनों में जसपाल मुझसे बेहतर अभिनेता थे। वह आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे, गा सकते थे, नाच सकते थे और बेहतरीन कलाकार थे।”
हालांकि, नसीरुद्दीन शाह का करियर तेजी से आगे बढ़ रहा था। जबकि जसपाल को वैसी सफलता नहीं मिल रही थी। बताया जाता है कि नसीर को लगातार मिल रही फिल्मों और उनकी बढ़ती लोकप्रियता ने जसपाल के मन में गहरी ईर्ष्या और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी। हालांकि, नसीरुद्दीन शाह का करियर तेजी से आगे बढ़ रहा था, जबकि जसपाल को वैसी सफलता नहीं मिल रही थी। बताया जाता है कि नसीर को लगातार मिल रही फिल्मों और उनकी बढ़ती लोकप्रियता ने जसपाल के मन में गहरी ईर्ष्या और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी।
रेस्तरां में नसीरुद्दीन पर चाकू से कर दिया हमला
एक शाम मुंबई के जुहू स्थित एक रेस्तरां/ढाबे में जब नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी और राजेंद्र जसपाल एक साथ बैठे थे, तभी जसपाल के भीतर दबा ईर्ष्या का गुबार बाहर आ गया। जैसे ही नसीर खाने की मेज पर अपनी पीठ जसपाल की तरफ करके बात करने लगे, जसपाल ने अचानक धारदार चाकू निकाला और पूरी ताकत से नसीर की पीठ में घोंप दिया।
रेस्तरां में अचानक चाकूबाजी से चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। नसीर पीठ पर एक तीखे दर्द के साथ फर्श पर गिर पड़े। जसपाल जब दोबारा वार करने ही वाला था, तभी उनके दूसरे करीबी दोस्त ओम पुरी ने गजब की बहादुरी और फुर्ती दिखाते हुए जसपाल को दबोच लिया और आगे हमला करने से रोक दिया।
रेस्तरां के बाहर उस वक्त पुलिस की गाड़ी मौजूद थी। ओम पुरी ने बिना एक पल गंवाए नसीर को संभाला, पुलिस अफसरों पर चिल्लाकर लगभग जबरन नसीर को पुलिस जीप में लिटाया और खुद उनके जख्म को हाथों से कसकर दबाए रखा। अस्पताल पहुँचने तक ओम पुरी लगातार नसीर से बातें करते रहे ताकि वे खून बहने की वजह से होश न खो बैठें। डॉक्टरों ने साफ कहा कि अगर ओम पुरी ने तत्परता न दिखाई होती, तो नसीरुद्दीन शाह की जान बचा पाना असंभव था। हमले के बाद पुलिस ने जसपाल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
नसीर अस्पताल में भर्ती रहे और करीब दो दिन जेल में बिताने के बाद जसपाल को जमानत मिल गई। इस घटना में सबसे हैरान करने वाला मोड़ तब आया जब जेल से छूटने के एक दिन बाद जसपाल अचानक सीधे नसीरुद्दीन शाह के घर पहुंच गये। लेकिन अजीब बात यह थी कि उसके चेहरे पर न तो कोई माफी का भाव था और न ही अपने दोस्त पर कातिलाना हमला करने का कोई अफसोस।
जब यह मामला अदालत पहुंचा, तो नसीरुद्दीन शाह ने अपने उस भटके हुए साथी की दिमागी हालत को समझते हुए उसके खिलाफ केस को आगे न बढ़ाने का फैसला किया। नसीरुद्दीन शाह की दरियादिली के कारण अदालत ने केस बंद कर दिया, लेकिन इस एक घटना ने जसपाल के लिए बॉलीवुड के दरवाजे हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दिए। वे मुंबई से बाहर हो गए। इस आपराधिक और मानसिक आघात से वे कभी उबर नहीं पाए और गहरे अवसाद में चले गए। अवसाद के कारण उन्होंने कभी शादी भी नहीं की।
राजेंद्र जसपाल के जीवन की इसी त्रासदी पर बाद (साल 2020) में ‘ये यार मेरे अरमानों की’ नाम से एक डॉक्यूमेंट्री बनाई गई। इसमें दिखाया गया कि कैसे एक प्रतिभाशाली अभिनेता, जो कभी नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी का सहपाठी था, एक घटना के बाद गुमनामी और संघर्ष की जिंदगी जीने को मजबूर हो गया। दूसरी ओर, उसी दौर में नसीरुद्दीन शाह का करियर लगातार नई ऊंचाइयों पर पहुंचता गया। संघर्ष से शुरुआत करने वाले नसीर ने हर चुनौती को पीछे छोड़ते हुए भारतीय सिनेमा के सबसे सम्मानित अभिनेताओं में अपनी जगह बनाई।
1967 में ‘अमन’ से शुरू हुआ था सिनेमाई सफर
बहुत कम लोग जानते हैं कि नसीरुद्दीन शाह का फिल्मी सफर 1975 की ‘निशांत’ से नहीं, बल्कि 1967 की फिल्म ‘अमन’ से शुरू हुआ था। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 16 साल थी। फिल्म में एक्स्ट्रा कलाकार की छोटी-सी भूमिका के लिए उन्हें सिर्फ 7.50 रुपये मिले थे। इसके बाद उन्होंने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में प्रशिक्षण लिया और अभिनय की बारीकियां सीखीं। आगे चलकर श्याम बेनेगल की ‘निशांत’ ने उन्हें नई पहचान दिलाई। फिर ‘मंथन’, ‘आक्रोश’, ‘स्पर्श’, ‘अर्ध सत्य’, ‘मिर्च मसाला’, ‘जाने भी दो यारों’, ‘कर्मा’, ‘मोहरा’, ‘सरफरोश’, ‘इकबाल’ और ‘ए वेडनेसडे’ जैसी फिल्मों ने उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे भरोसेमंद अभिनेताओं में शामिल कर दिया।
नसीरुद्दीन शाह उन चुनिंदा कलाकारों में हैं जिन्होंने समानांतर और व्यावसायिक, दोनों तरह के सिनेमा में बराबर सफलता हासिल की। ‘स्पर्श’, ‘आक्रोश’, ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ और ‘अर्ध सत्य’ जैसी फिल्मों में उन्होंने यथार्थवादी अभिनय की नई मिसाल पेश की, तो ‘कर्मा’, ‘त्रिदेव’, ‘मोहरा’ और ‘सरफरोश’ जैसी मुख्यधारा की फिल्मों में भी अपनी अलग पहचान बनाई।
थिएटर से उनका रिश्ता भी कभी नहीं टूटा। पत्नी रत्ना पाठक शाह के साथ उन्होंने ‘मोटली’ थिएटर समूह की स्थापना की और भारतीय रंगमंच को नई ऊंचाइयां दीं। ‘मिर्जा गालिब’ और ‘भारत एक खोज’ जैसे टीवी धारावाहिकों में उनके अभिनय को आज भी याद किया जाता है। नसीरुद्दीन शाह को फिल्म ‘स्पर्श’ और ‘पार’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता तथा ‘इकबाल’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। उन्हें 1987 में पद्मश्री और 2003 में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया।


