नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने रेसलर विनेश फोगाट को बड़ी राहत देते हुए एशियम गेम्स के ट्रायल में शामिल होने की अनुमति दी है। अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगाने से इंकार कर दिया जिसमें उन्हें प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि स्पष्ट किया कि उसके फैसले को हाई कोर्ट के तर्क का समर्थन नहीं माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश में की गई कई टिप्पणियों पर बार-बार सवाल उठाए तथा फोगाट द्वारा डोपिंग विरोधी नियमों के अनुपालन पर चिंता व्यक्त की।
विनेश फोगाट को मिली अनुमति
जस्टिस पी एस नरसिम्हा और आलोक आराधे की पीठ ने शुक्रवार (29 मई) को इस मामले में सुनवाई की। गौरतलब है कि भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। एशियन गेम्स के लिए ट्रायल 30 और 31 मई को होंगे। ऐसे में अदालत ने अंतिम समय में प्रक्रिया को बाधित न करने का फैसला किया। इससे फोगाट को हिस्सा लेने की अनुमति मिल गई।
बताते चलें कि डब्ल्यूएफआई ने विनेश को ‘कारण बताओ नोटिस’ भेजकर चार सवालों के जवाब मांगे थे। रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया ने उन पर अनुशासनहीनता और डोपिंग रोधी नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया था। डब्ल्यूएफआई ने 26 जून, 2026 तक विनेश के किसी भी घरेलू प्रतियोगिता में हिस्सा लेने पर रोक लगा दी थी।
डब्ल्यूएफआई के इस फैसले के कारण विनेश नेशनल ओपन रैंकिंग टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले सकी थीं। विनेश ट्रायल में हिस्सा लेने की अनुमति मांगने डब्ल्यूएफआई के पास पहुंची थीं, लेकिन उनकी अपील को ठुकरा दिया गया था। डब्ल्यूएफआई का कहना था कि विनेश के खिलाफ वाडा के 5.6.1 नियम के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई जारी है, और इस कारण उन्हें ट्रायल में हिस्सा लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती है।
रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के मुताबिक, इस नियम के तहत संन्यास से वापसी कर रहे खिलाड़ियों को किसी भी टूर्नामेंट में खेलने से पहले कम से कम छह महीने तक का नोटिस पूरा करना आवश्यक होता है। डब्ल्यूएफआई के फैसले के बाद विनेश ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और इस मामले में दखल देने की अपील की थी।
दिल्ली हाई कोर्ट के तरीके पर उठाए सवाल
आज हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा मामले से निपटने के तरीके पर आपत्ति जताई। जजों ने सवाल उठाया कि जब पात्रता मानदंड सभी पहलवानों पर समान रूप से लागू होते हैं तो डब्ल्यूएफआई की नीति को “भेदभावपूर्ण” कैसे कहा जा सकता है।
अदालत ने मातृत्व और लैंगिक भेदभाव से संबंधित कुछ टिप्पणियों पर आपत्ति जताई और कहा कि खेल प्रशासन में न्यायिक हस्तक्षेप का एकमात्र आधार ऐसे मुद्दे नहीं हो सकते। सुनवाई के दौरान “देश सर्वोपरि” का मुद्दा बार-बार उठा। पीठ ने कहा कि भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों को सभी पात्रता और अनुपालन आवश्यकताओं को पूरा करना होगा।
इसके साथ ही अदालत ने भारतीय खेल जगत में फोगाट के कद को स्वीकार किया और कहा कि वह “एक साधारण एथलीट नहीं” हैं। अदालत ने विश्व चैंपियन और ओलंपियन के रूप में उनकी उपलब्धियों को मान्यता दी।
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