श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड SMVDSB त्रिकूट पहाड़ियों स्थित कटरा के पवित्र गुफा मंदिर का संरक्षक है बोर्ड की कमान लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा के पास है जबकि रोजमर्रा का प्रशासन एक आईएएस अधिकारी देखते हैं जिन्हें श्राइन बोर्ड का सीईओ बनाया गया है बोर्ड पिछले पंद्रह दिनों से चर्चा और विवाद में है क्योंकि उसने हाल ही में एक नया मेडिकल कॉलेज शुरू किया है
यहां यह बताना जरूरी है कि वैष्णो देवी की यह गुफा दुनिया भर में पूजनीय है और इसे हिंदू धर्म के सबसे समृद्ध मंदिरों में माना जाता है प्रशासन की दृष्टि से भी यह सबसे बेहतर मंदिरों में गिना जाता है यहां चढ़ावे के रूप में भक्त सिर्फ नकद ही नहीं बल्कि सोना चांदी और कीमती आभूषण भी चढ़ाते हैं मौसम अनुकूल रहे तो यहां 365 दिन 24 घंटे निरंतर यात्रा चलती रहती है
हिंदू भक्तों से मिली दान राशि का उपयोग यहां यात्रियों की सुविधा के लिए बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में किया गया है इसी धन से एक विश्वविद्यालय बड़ा अस्पताल नर्सिंग कॉलेज और कई अन्य संस्थान स्थापित किए गए हैं अस्पताल में सभी धर्मों के लोग इलाज के लिए आते हैं नर्सिंग कॉलेज में हिंदू छात्रों से ज्यादा मुस्लिम छात्र पढ़ रहे हैं
पिछले कुछ वर्षों में मुस्लिम छात्रों का दाखिला बढ़ा है उन्हें न सिर्फ नर्सिंग कॉलेज में प्रवेश मिला बल्कि श्राइन बोर्ड द्वारा संचालित नारायण अस्पताल में नौकरियां भी मिलीं कुल मिलाकर हिंदू भक्तों की दान राशि से तैयार संस्थानों का लाभ गैर हिंदुओं को मिलता दिखा इस कारण अंदर ही अंदर नाराजगी बढ़ती रही और आवाजें उठने लगीं कि इन संस्थानों में केवल हिंदू लोगों को ही रोजगार मिलना चाहिए
नए मेडिकल कॉलेज में कुल 50 में से 42 सीटों पर मुस्लिम छात्रों को एडमिशन देने से मामला अचानक गरमा गया लोग इस बात की कड़ी आलोचना कर रहे हैं कि पूरी तरह हिंदू दान से बना मेडिकल कॉलेज एमबीबीएस की सीटें मुस्लिम छात्रों को दे रहा है इसे उन अनाम हिंदू भक्तों का अपमान बताया जा रहा है जो देवी के प्रति श्रद्धा से अपनी कमाई चढ़ाते हैं
वैष्णो देवी भवन में पूजा विधि में कन्याओं की भूमिका सबसे अहम होती है सुबह हो या शाम आरती के दौरान दर्शन करने आई लड़कियों में से कुछ को यादृच्छिक रूप से कन्याक पूजन के लिए चुना जाता है लेकिन नए मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस कोर्स के लिए चुने गए छात्रों में एक भी हिंदू लड़की का नाम नहीं है इसे एक विडंबना के रूप में देखा जा रहा है
कुछ हिंदू लड़कियों का चयन हुआ था लेकिन जब उनके अभिभावकों को पता चला कि 85 प्रतिशत छात्र मुस्लिम हैं तो उन्होंने अपने बच्चों का नामांकन वापस ले लिया जम्मू क्षेत्र में 43 में से 29 विधायक जीतने वाली बीजेपी भी इस मुद्दे पर शांत दिख रही है कुछ औपचारिक बयान जरूर आए हैं लेकिन अब बदलाव संभव नहीं माना जा रहा पार्टी के बयान सिर्फ जनता की नाराजगी शांत करने के लिए बताए जा रहे हैं
असल समस्या क्या है
असल समस्या यह है कि जम्मू कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश यूटी में 23 प्रतिशत हिंदुओं को बहुसंख्यक माना जाता है जबकि 70 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलता है यह परिभाषा 1992 में तय हुई थी और मोदी सरकार के पिछले 11 सालों में इसे बदला नहीं गया देश के कम से कम आठ राज्यों में हिंदू संख्या के आधार पर अल्पसंख्यक हैं लेकिन इस कानून की वजह से उन्हें माइनॉरिटी का दर्जा नहीं मिलता
मेडिकल कॉलेज में मुस्लिम छात्रों की भारी संख्या के रूप में यह विवाद सामने आया है लेकिन इसकी जड़ें केंद्रीय सरकार की नीतियों में मानी जा रही हैं यह मुद्दा केवल एलजी मनोज सिन्हा के स्तर का नहीं है मेडिकल कॉलेज शुरू करने के फैसले के बाद वे मुश्किल स्थिति में फंस गए हैं और इससे उपजे विवाद का समाधान उनके हाथ में नहीं है
अतीत में कई बार ऐसा देखा गया है कि जब कोई मुद्दा हिंदू समुदाय से जुड़ा माना जाता है तो कुछ समय बाद वह खुद ही शांत हो जाता है इस विवाद का भी यही हश्र हो सकता है संभव है कि अगले साल ऐसे ही हालात हों और यह बात कोई मुद्दा ही न बने भले ही मेडिकल कॉलेज में 50 में से 50 मुस्लिम छात्र दाखिला पाएं

