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43 साल जेल में रहे भारतीय मूल के ‘बेगुनाह’ शख्स को अमेरिकी कोर्ट से राहत, निर्वासन पर लगाई रोक

अमेरिका की दो अदालतों ने 43 साल से जेल में बंद भारतीय मूल के व्यक्ति के निर्वासन पर रोक लगाई है। वह 1982 से जेल में बंद थे।

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प्रतीकात्मक फोटोः ग्रोक

वाशिंगटनः अमेरिका की दो अदालतों ने आव्रजन विभाग को भारतीय मूल के सुब्रमण्यम वेदम के निर्वासन को रोकने का निर्देश दिया है। व्यक्ति ने हत्या के आरोप में चार दशक से ज्यादा समय जेल में बिताया था। इसे हाल ही पलट दिया गया था।

समाचार एजेंसी एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, 64 वर्षीय सुब्रमण्यम को उनके परिवार के लोग ‘सुबू’ कहते हैं। इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक, उन्हें लुइसियाना की हिरासत केंद्र में रखा गया है जहां निर्वासन के लिए एक हवाई पट्टी भी है।

इमिग्रेशन जज ने निर्वासन पर लगाई थी रोक

बीते हफ्ते एक इमिग्रेशन जज ने उनके निर्वासन पर तब रोक लगा दी थी जब तक कि इमिग्रेशन अपील ब्यूरो यह तय नहीं कर लेता कि उनके मामले की समीक्षा की जाए या नहीं – एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें महीनों लग सकते हैं। उसी दिन पेंसिल्वेनिया की एक अदालत ने भी उनके निर्वासन पर रोक लगा दी।

सुब्रमण्यम नौ महीने की उम्र में ही अमेरिका गए थे। उन्हें 1980 में अपने दोस्त की हत्या के आरोप में 1982 में गिरफ्तार किया गया था। सुब्रमण्यम के दोस्त थॉमस किन्सर 19 वर्ष की आयु में 1980 में लापता हुए थे। लापता होने के नौ महीने बाद उसका शव मिला था। सुब्रमण्यम को किन्सर के साथ आखिरी बार देखा गया था।

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इस दौरान अमेरिका के कानूनी स्थायी निवासी सुब्रमण्यम को मादक पदार्थों के आरोपों में भी कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया था। उन्हें 1983 में दोषी ठहराया गया था और बिना पैरोल के आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। वहीं, मादक पदार्थों से जुडे अपराध के लिए उन्हें ढाई से पांच साल की अतिरिक्त सजा भी मिली।

सुब्रमण्यम के वकीलों ने दावा किया कि उनकी सजा परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित थी, बिना किसी गवाह, मकसद या सबूत के। वर्षों तक, उनके परिवार ने उनकी बेगुनाही साबित करने के लिए अथक प्रयास किए।

जेल में रहते हुए तीन डिग्रियां की हासिल

उन्होंने पेन्सिल्वेनिया की जेल में तीन डिग्रियाँ हासिल कीं, शिक्षक बने और कई कैदियों को प्रशिक्षित किया। उनके पिता का देहांत 2009 में हुआ। वहीं उनकी माँ का देहांत 2016 में हुआ।

इसी साल अगस्त में उन्हें जीवन जीने का एक और मौका मिला। पेंसिल्वेनिया की एक अदालत ने उनके वकीलों द्वारा बैलिस्टिक्स के ऐसे सबूत उजागर करने के बाद उनकी सजा को पलट दिया जिन्हें अभियोजकों ने दशकों से दबा रखा था।

43 साल से भी अधिक समय तक जेल में रहने के बाद 3 अक्टूबर को उनकी रिहाई हुई थी। इसके तुरंत बाद ही उन्हें आव्रजन एवं सीमा शुल्क प्रवर्तन ने हिरासत में ले लिया था।

आईसीई अब उसे उस मामूली ड्रग अपराध के लिए निर्वासित करना चाहता है जिसके लिए उसे दोषी ठहराया गया था। होमलैंड सुरक्षा विभाग का कहना है कि हत्या के मामले में फैसला पलटने से ड्रग से जुड़ी सजा रद्द नहीं होती।

हालांकि उनकी बहन और वकीलों ने तर्क दिया है चार दशकों से अधिक समय तक गलत तरीके से कैद में रखने का मामला मादक पदार्थ के आरोप से अधिक महत्वपूर्ण होना चाहिए।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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