Homeकला-संस्कृतिपुस्तक समीक्षाः संवेदना और जीवनानुभवों का बहुरंग- उस बहार का इंतजार

पुस्तक समीक्षाः संवेदना और जीवनानुभवों का बहुरंग- उस बहार का इंतजार

साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि अनुभवों का सघन रूपांतरण होता है। जब कोई रचनाकार जीवन के सूक्ष्म स्पर्शों, भीतर के शोर और बाहर के यथार्थ को एक साथ साध लेता है, तब रचना केवल कथा नहीं रह जाती, वह संवेदना का दस्तावेज बन जाती है। वरिष्ठ कथाकार डॉ. उर्मिला शिरीष का कहानी-संग्रह ‘उस बहार का इंतजार’ भिन्न आस्वादों के जीवन-स्पर्शों से निर्मित एक ऐसा संसार रचता है, जहाँ संघर्ष, उम्मीद, संबंध और आत्ममंथन सब एक साथ उपस्थित हैं।

संवेदना, संघर्ष और जीवनानुभवों का सम्मिलित रूप ही सृजन की वास्तविक प्रेरणा बनता है। साहित्य-रचना, चाहे वह कविता हो, कहानी, उपन्यास, यात्रावृत्तांत, नाटक या संस्मरण, केवल कल्पना अथवा शब्दों के जोड़-घटाव से संभव नहीं होती। रचनाकार किसी घटना, पात्र, प्रसंग अथवा विषय के साथ लयबद्ध होता है। यह लय एक क्षणिक नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।

डॉ. उर्मिला शिरीष वरिष्ठ कथाकार हैं, और उनकी रचनाओं में यह लयात्मकता निरंतर दिखाई देती है। वे किसी विषय, पात्र अथवा घटना को अधर में नहीं छोड़तीं, बल्कि उनके साथ तादात्म्य स्थापित करते हुए सूक्ष्म विश्लेषण के माध्यम से उन्हें समाज और जीवन के व्यापक संदर्भों में देखती हैं।

रचनाकार का मन कभी पथरीली जमीन नहीं होता। जिस प्रकार पथरीली भूमि पर वनस्पति नहीं उगती, उसी प्रकार संवेदनाहीन मन में रचना का जन्म संभव नहीं। उर्मिला शिरीष का कहानी-संग्रह ‘उस बहार का इंतजार’ सृजनात्मक अनुभवों के साथ-साथ जीवन के विविध पक्षों की गहन और महीन पड़ताल प्रस्तुत करता है। उनके यहाँ जीवन दूर से देखा हुआ नहीं, बल्कि निकट से जिया गया अनुभव है। एक साक्षी भाव से समन्वित दृष्टि।

उनकी कहानियों में “भीतर का शोर” है। एक ऐसा शोर जिसे वे सुनती हैं, शब्द देती हैं, और शायद उसका इंतजार भी करती हैं। क्योंकि यही शोर उनके भीतर लिखने की बेचैनी को जन्म देता है। यह संग्रह केवल दुख, चिंता और निराशा की कथा नहीं है; इसके समानांतर वह जीवन के उन सुंदर पक्षों को भी सामने लाता है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। यही सुंदरता उनके यहाँ “बहार” के रूप में अभिव्यक्त होती है। एक ऐसी बहार, जिसका इंतजार एक सर्जनशील मन निरंतर करता रहता है।

संग्रह में कुल ग्यारह कहानियाँ हैं—चीटियों की रेस, बिंजो माई फ्रेंड, नाच कठपुतली, हरा पत्ता, मंदिर और कुआँ, पराजय के समीकरण, पीपल का पेड़, विदा होती बेटियों की माँ, लड़कियों की हँसी, ऑनस्क्रीन तथा उस बहार का इंतजार। सभी कहानियाँ विषय-वस्तु के स्तर पर भिन्न होते हुए भी जीवनानुभवों की एक साझा बुनावट से जुड़ी हुई हैं।

पहली कहानी चीटियों की रेस पारिवारिक संबंधों की जटिलताओं और अंतर्द्वंद्व को उद्घाटित करती है। सुजाता, उसके माता-पिता और अंशिका के बीच संबंधों में संवाद भी है और अनकहा तनाव भी। शब्दों के विषैले तीर एक-दूसरे को आहत करते रहते हैं। इस कहानी में लेखिका का चिंतन पारिवारिक सीमाओं से निकलकर वैश्विक स्तर तक पहुँच जाता है। सत्ता की आकांक्षा किस प्रकार संबंधों और समाज को प्रभावित करती है, इसका संकेत अत्यंत सूक्ष्म ढंग से मिलता है।

नाच कठपुतली में अदिति के माध्यम से युवा मन की स्वतंत्रता की आकांक्षा और पारंपरिक बंधनों के बीच का द्वंद्व उभरता है। वहीं हरा पत्ता कहानी वैश्वीकरण, प्रवास और अपनी जड़ों से कटने की पीड़ा को सामने लाती है। विदेश जाने की इच्छा और उससे जुड़ी पारिवारिक जटिलताएँ इसमें मार्मिक रूप से व्यक्त हुई हैं।

मंदिर और कुआँ कहानी ग्रामीण जीवन और जल-संकट जैसे गंभीर विषय को उठाती है। इसमें परंपरा, आस्था और पर्यावरणीय संकट एक साथ उपस्थित होते हैं। जल के प्रति सामुदायिक दृष्टिकोण और उसके क्षरण की चिंता आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक बन जाती है।

पराजय के समीकरण कहानी यह स्थापित करती है कि जीवन में केवल विजय के ही नहीं, पराजय के भी अपने समीकरण होते हैं। यह कहानी समकालीन राजनीतिक और सामाजिक यथार्थ का सूक्ष्म विश्लेषण करती है।

पीपल का पेड़ सरकारी तंत्र की विसंगतियों, भ्रष्टाचार और स्वास्थ्य-व्यवस्था की बदहाली को उजागर करते हुए मानवीय संबंधों की कोमलता को भी सामने लाती है। वहीं विदा होती बेटियों की माँ बदलते पारिवारिक ढाँचे और उससे उपजे भावनात्मक खालीपन को अत्यंत संवेदनशील ढंग से व्यक्त करती है।

लड़कियों की हँसी लैंगिक असमानता और सामाजिक मानसिकता पर तीखा प्रश्न उठाती है। यह कहानी दिखाती है कि कैसे स्त्रियों की सहज अभिव्यक्ति तक पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की जाती है।

ऑनस्क्रीन कहानी आधुनिक तकनीकी जीवन और उससे उपजी एकाकीपन तथा मानसिक दूरी को रेखांकित करती है। डिजिटल दुनिया में संबंधों के बदलते स्वरूप को यह कहानी सहज ढंग से सामने लाती है।

संग्रह की शीर्षक कहानी उस बहार का इंतजार इस पूरे संग्रह का भाव-केन्द्र है। इसमें यात्रा, सांस्कृतिक संवाद और जीवन-दर्शन के विविध आयाम खुलते हैं। लेखिका भारतीयता, आध्यात्मिकता और मानवीय मूल्यों को वैश्विक संदर्भ में रखकर देखती हैं। युद्ध, हिंसा और आतंक के विरुद्ध उनका स्वर स्पष्ट और मानवीय है।

इस संग्रह को पढ़ते हुए यह स्पष्ट होता है कि लेखिका ने जीवन के सूक्ष्म और विस्तृत अनुभवों को क्रमबद्ध और संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा सरल, प्रवाहमयी और विषयानुकूल है, मानो नदी का जल अपने स्वाभाविक वेग में बहता हुआ।

अंततः, ‘उस बहार का इंतजार’ केवल एक कहानी-संग्रह नहीं, बल्कि जीवन के विविध रंगों का संवेदनात्मक दस्तावेज है। यह पाठक के भीतर एक ऐसा स्पंदन उत्पन्न करता है, जो उसे लंबे समय तक सोचने और महसूस करने के लिए प्रेरित करता है। यही किसी भी सशक्त साहित्य की पहचान है।

कहानी-संग्रहः उस बहार का इंतजार 
प्रकाशकः वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
प्रकाशन वर्षः 2026
मूल्यः 400

डॉ. वेदप्रकाश
डॉ. वेदप्रकाश असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
डॉ. वेदप्रकाश
डॉ. वेदप्रकाश असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

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