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‘द इंडिया स्टोरी’ फिल्म के बहाने: क्या हमारी थाली में धीरे-धीरे घुल रहा है जहर?

भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है। भारत दुनिया के बड़े कृषि उत्पादक देशों में शामिल है। बढ़ती आबादी की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए खेती में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल लगातार बढ़ा है।

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Poster for The India Story: a man holding a child amid crops, with a hazardous canister and fresh produce in the foreground, and a woman in a suit holding documents nearby; text asks about poison in food.
भारत में खेती में कीटनाशकों के इस्तेमाल की क्या है स्थिति?

सुबह की शुरुआत चाय से होती है। नाश्ते में फल या सब्जियां, दोपहर में दाल, चावल और रोटी, रात में फिर वही थाली। हम हर दिन यही मानकर खाना खाते हैं कि जो हमारी प्लेट में है, वह हमें पोषण देगा। लेकिन अगर यही भोजन धीरे-धीरे हमारे शरीर में ऐसे रसायन पहुंचा रहा हो, जो वर्षों बाद गंभीर बीमारियों की वजह बन जाएं, तो? यह सवाल सुनने में भले अतिरंजित लगे, लेकिन निर्देशक चेतन डीके की फिल्म ‘द इंडिया स्टोरी’ इसी संवेदनशील मुद्दे को बड़े पर्दे पर लेकर आ रही है। फिल्म 24 जुलाई को सिनेमाघरों में रिलीज होगी जिसमें श्रेयस तलपड़े और काजल अग्रवाल मुख्य भूमिका में दिखेंगे। फिल्म में खाद्य पदार्थों में मिलावट, रासायनिक कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के संभावित संबंध पर सवाल उठाए गए हैं। फिल्म के टीजर में यह दिखाया गया है कि कैसे एक बच्ची कैंसर का शिकार हो जाती है। डॉक्टर की रिपोर्ट में खुलासा होता है कि ‘बच्ची को कैंसर, फल सब्जियां, दूध के जरिए हुआ। यह सब चीजें किसानों से खरीदी जाती है। किसान पेस्टिसाइड इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें बनाने वाली कंपनी और कंपनी को परमिशन देने वाली सरकार भी दोषी है।’ इसके बाद शुरू होता है कानूनी लड़ाई।

फिल्म अपनी जगह है, लेकिन इसके बहाने उठे सवाल बिल्कुल वास्तविक हैं। वैज्ञानिक शोध, सरकारी आंकड़े और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टें भी संकेत देती हैं कि खेती में रसायनों के बढ़ते उपयोग, खाद्य पदार्थों में कीटनाशकों के अवशेष और उनकी निगरानी आज भारत सहित पूरी दुनिया के सामने बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुके हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हमारी थाली वास्तव में उतनी सुरक्षित है, जितना हम मानते हैं?

The India Story | Official Film Teaser Hindi| Kajal A Kitchlu | Shreyas Talpade |Chettan DK | 24July

खेतों में बढ़ते रसायन और बदलती खेती

भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है। भारत दुनिया के बड़े कृषि उत्पादक देशों में शामिल है। बढ़ती आबादी की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए खेती में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल लगातार बढ़ा है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, देश में हर वर्ष 61 हजार टन से अधिक कीटनाशकों का उपयोग होता है।

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बॉटनी स्टडीज (2025) में प्रकाशित एक समीक्षा अध्ययन के मुताबिक, भारत में रासायनिक और जैविक दोनों प्रकार के कीटनाशकों की मांग बढ़ रही है। हालांकि प्रति हेक्टेयर कीटनाशक उपयोग ब्राजील, चीन और अमेरिका जैसे देशों की तुलना में कम है, लेकिन खाद्य पदार्थों में इनके अवशेष और स्वास्थ्य पर इनके प्रभाव गंभीर चिंता का विषय हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, 2023-24 में देश में लगभग 54,123 मीट्रिक टन रासायनिक कीटनाशकों की खपत दर्ज की गई। अध्ययन के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक खपत 2021-22 में रही, जब देश में 58,652.56 मीट्रिक टन रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग हुआ। इसके बाद 2022-23 में इसमें उल्लेखनीय गिरावट आई और खपत घटकर 52,616.64 मीट्रिक टन रह गई। वहीं 2023-24 में इसमें फिर हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

पिछले पांच वर्षों में रासायनिक कीटनाशकों की खपत (मीट्रिक टन)
वर्षखपत
2019-2058,613.02
2020-2158,336.21
2021-2258,652.56
2022-2352,616.64
2023-2454,122.77

राज्यवार आंकड़ों से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश देश में रासायनिक कीटनाशकों का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। वर्ष 2023-24 में प्रदेश में करीब 11,828 मीट्रिक टन कीटनाशकों की खपत हुई। इसके बाद महाराष्ट्र में लगभग 8,718 मीट्रिक टन, बिहार में 5,257 मीट्रिक टन, गुजरात में 4,920 मीट्रिक टन और हरियाणा में 4,064 मीट्रिक टन की खपत दर्ज की गई।

शोध के मुताबिक भारत में वर्ष 2021 तक 293 पंजीकृत कीटनाशकों के उपयोग की अनुमति थी। इनमें से 130 ऐसे रसायन हैं जिन्हें दुनिया के कई देशों ने प्रतिबंधित कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, 2019-20 के दौरान देश में 61,703 मीट्रिक टन तकनीकी ग्रेड रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल हुआ। इनमें करीब 80 प्रतिशत अत्यधिक या उच्च विषाक्तता वाले वर्ग में आते हैं।

क्या सिर्फ किसान ही जोखिम में हैं?

कीटनाशकों का असर केवल खेतों में काम करने वाले किसानों तक सीमित नहीं रहता। जब इनका अत्यधिक या गलत तरीके से इस्तेमाल होता है तो इनके अवशेष फल, सब्जियों, अनाज और अन्य खाद्य पदार्थों तक पहुंच जाते हैं। यही अवशेष धीरे-धीरे हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि कई बार किसान निर्धारित मात्रा से अधिक छिड़काव कर देते हैं या फसल काटने से ठीक पहले कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। इससे रसायनों को प्राकृतिक रूप से टूटने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता और उनके अवशेष सीधे बाजार तक पहुंच जाते हैं।

वैज्ञानिक अध्ययनों में लंबे समय तक कीटनाशकों के संपर्क को कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ा गया है। इनमें प्रतिरक्षा प्रणाली का कमजोर होना, हार्मोनल असंतुलन, प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल असर, बच्चों के मस्तिष्क और बौद्धिक विकास में बाधा तथा कुछ प्रकार के कैंसर का बढ़ा हुआ जोखिम शामिल हैं।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि कैंसर जैसी बीमारियां कई कारणों से होती हैं और केवल कीटनाशकों को अकेला कारण नहीं माना जा सकता। लेकिन लगातार संपर्क को एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक जरूर माना जाता है।

शोध बताता है कि कई रासायनिक कीटनाशक लंबे समय तक मिट्टी में बने रहते हैं। बारिश के साथ वे भूजल और नदियों तक पहुंच जाते हैं। पशुओं के चारे में मौजूद अवशेष उनके शरीर में जमा होते हैं और बाद में दूध, मांस, अंडे तथा समुद्री खाद्य पदार्थों के जरिए इंसानों तक पहुंच सकते हैं। यानी यह समस्या केवल खेती तक सीमित नहीं है बल्कि पूरी खाद्य श्रृंखला (Food Chain) को प्रभावित करती है।

दुनिया में सबसे ज्यादा विवाद किन रसायनों पर?

हाल के वर्षों में ग्लाइफोसेट (Glyphosate) और पैराक्वाट (Paraquat) जैसे रसायनों को लेकर सबसे ज्यादा बहस हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की कैंसर अनुसंधान एजेंसी IARC ने ग्लाइफोसेट को “संभवतः कैंसर पैदा करने वाला” वर्ग में रखा है। वहीं कई अन्य नियामक एजेंसियों की राय इससे अलग है और उनका कहना है कि उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य इसे निश्चित रूप से कैंसरकारी साबित नहीं करते।

इसी तरह पैराक्वाट को उसकी अत्यधिक विषाक्तता के कारण दुनिया के 70 से अधिक देशों में प्रतिबंधित या कड़े नियंत्रण के दायरे में रखा गया है। लेकिन भारत में इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। हाल ही में राजस्थान सरकार ने विधानसभा में बताया कि जनवरी 2024 से जनवरी 2026 के बीच कीटनाशकों के संपर्क और असुरक्षित उपयोग से 535 किसानों और कृषि श्रमिकों की मौत हुई। सरकार ने इसकी प्रमुख वजह सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल न करना, गलत तरीके से छिड़काव और रसायनों का असुरक्षित उपयोग बताया। ये आंकड़े इस बात की ओर भी इशारा करते हैं कि समस्या केवल उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि खेतों में काम करने वाले किसानों के लिए भी गंभीर स्वास्थ्य जोखिम मौजूद हैं।

अध्ययन के अनुसार भारत में जैविक कीटनाशकों की हिस्सेदारी अभी कुल बाजार का केवल 8 प्रतिशत है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि टिकाऊ कृषि और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है तो जैविक कीटनाशकों, सूक्ष्मजीव आधारित उत्पादों और इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM) जैसी तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाना होगा।

क्या हमारी थाली सुरक्षित है?

दरअसल इस सवाल का जवाब ‘हां’ या ‘नहीं’ में नहीं दिया जा सकता। भारत में एफएसएसएआई (FSSAI) और राज्य सरकारें खाद्य पदार्थों में कीटनाशकों के अवशेषों की नियमित जांच करती हैं और इनके लिए अधिकतम अवशेष सीमा (MRL) तय की गई है। अधिकांश खाद्य पदार्थ निर्धारित मानकों के भीतर होते हैं, लेकिन समय-समय पर ऐसे मामले भी सामने आते हैं, जिनमें तय सीमा से अधिक कीटनाशक अवशेष पाए जाते हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ निगरानी, सुरक्षित खेती और जिम्मेदार उपयोग पर लगातार जोर देते हैं।

खीरे भी रंगे जा रहे है! भारत में कितनी गंभीर है खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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