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खीरे भी रंगे जा रहे है! भारत में कितनी गंभीर है खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या

भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट की कहानी खीरे तक सीमित नहीं है। मिलावट के नुकसान के सैकड़ों-हजारों उदाहरण भरे पड़े हैं। कुछ तो बेहद ही दर्दनाक और हिला कर रख देने वाले हैं।

Viral Video Katihar Cucumber
फोटोृ X

बिहार से आया एक वीडिया सोशल मीडिया पर वायरल है। खाद्य पदार्थों में मिलावट की ये हाल के दिनों में संभवत: सबसे डरावनी तस्वीर है। इसमें एक महिला रेलवे स्टेशन पर खीरे को हरे रंग के किसी द्रव्य में डालकर उसे हरा और ताजा दिखने जैसा बनाने में जुटी नजर आ रही है। इसमें भी हैरान करने वाली बात ये कि इसे खुलेआम स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर बैठकर किया जा रहा है। बाद में ये बात सामने आई कि वीडियो बिहार के कटिहार रेलवे स्टेशन का है। वीडियो वायरल हुआ तो पुलिस कार्रवाई हुई रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (आरपीएफ) ने इस तरह खीरा बेचने वाली 9 महिलाओं को पकड़ा। इसमें वो महिलाएं भी शामिल है, जो वायरल वीडियो में नजर आ रही हैं।

आमतौर पर खीरे को ताजा माना जाता है। गर्मियों के दिनों में तो इसे और भी चाव से खाया जाता है। खासकर रेलवे यात्राओं के दौरान तो यात्री यही सोचकर इसे खरीदते हैं कि ये ताजा, मिलावट रहित है और इसे खाने से नुकसान नहीं होने वाला है। लेकिन कटिहार के वीडियो को देखने के बाद जाहिर है कई लोग स्टेशनों से मसाले और नमक में लिपटे चटपटे खीरे को खाने के बारे में सौ बार सोचेंगे।

दुर्भाग्य ये है कि भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट की कहानी खीरे तक सीमित नहीं है। ताजे फल से लेकर दूध, पनीर, हल्दी, मसाले कुछ भी अछूता नहीं रह गया है। फल को पकाने में कार्बाइड का खूब इस्तेमाल होता है। ये फल बड़े से लेकर छोटे शहरों में बिकते हैं जबकि कार्बाइड पर बैन है। भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट के नुकसान के सैकड़ों-हजारों उदाहरण भरे पड़े हैं। कुछ तो बेहद ही दर्दनाक और हिला कर रख देने वाले हैं। कुछ पुरानी घटनाओं को याद कराते हैं जो हैं हाल-फिलहाल के ही और फिर ये भी जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर चांद पर कदम रख चुके भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या इतनी गंभीर क्यों है और आखिर इससे निपटने का कोई रास्ता है भी या नहीं।

भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या गंभीर

  • इसी साल फरवरी (2026) में आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में लोगों को अचानक उल्टी होने लगी। पेट दर्द, पेशाब पर नियंत्रण न होना और अन्य समस्याएं आने लगी। कई मरीजों में किडनी की खराबी के गंभीर लक्षण दिखने के बाद स्वास्थ्य अधिकारियों ने जांच शुरू की। एक महीने में 20 लोगों को इन लक्षणों के साथ अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इनमें से 16 को बचाया नहीं जा सका। 22 मार्च को जारी एक आधिकारिक प्रेस रिलीज में लेबोरेट्री टेस्ट के रिजल्ट साझा किए गए। इससे पता चला कि 16 मरीजों की मौत एथिलीन ग्लाइकॉल नाम के विषैले पदार्थ से युक्त मिलावटी दूध के सेवन से हुई। इस दूध के सेवन से गुर्दे को गंभीर क्षति पहुंची और अंततः कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया।
  • ऐसे ही 14 मार्च को राजस्थान की राजधानी जयपुर में अधिकारियों ने 150,000 किलोग्राम एक्सपायर्ड पैकेटबंद खाद्य पदार्थों को जब्त किया। जब्त किए गए सामानों में नूडल्स, सॉस और मेयोनेज शामिल थे। जांच में ऐसे उपकरण भी बरामद हुए जिनका इस्तेमाल पैकेटों पर एक्सपायरी डेट बदलने के लिए किया जाता था ताकि पुराने उत्पादों को भी बाजार में बेचा जा सके।
  • इसके अलावा इसी साल में मार्च की शुरुआत में हैदराबाद कमिश्नर के टास्क फोर्स द्वारा की गई छापेमारी में एक टन से अधिक मिलावटी अदरक-लहसुन पेस्ट के साथ-साथ सैकड़ों किलोग्राम सड़े हुए बकरी और भेड़ के अपशिष्ट पदार्थ जब्त किए गए।
  • फरवरी में ही झारखंड के पलामू जिले में एक मेले में मिलावटी भोजन का सेवन करने के बाद कम से कम 175 लोग, जिनमें ज्यादातर बच्चे थे, बीमार पड़ गए।

ये इस साल खाद्य पदार्थों में मिलावट से जुड़े घटनाक्रमों की एक छोटी सी लिस्ट भर है। ये महज कुछ उदाहरण हैं जो आम आदमी की थाली में परोसे जाने वाले भोजन की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। इसके अलावा इंटरनेट पर नकली पनीर, मिलावटी शहद, घी और गलत लेबल वाले खाद्य उत्पादों की कई और खबरें भरी पड़ी हैं।

इन मामलों में कभी-कभी खाद्य सुरक्षा और मानकों के नियामक निकाय- भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा की गई सीमित कार्रवाई या चेतावनी आदि मीडिया में खबरें बनती हैं। लेकिन सच यही है कि खाद्य उत्पादों में मिलावट का बाजार बेरोकटोक फल-फूल रहा है। यही कारण है कि रलवे स्टेशन पर भी धड़ल्ले से खीरे को हरा करने का काम होता नजर आया।

मिलावट का बाजार खत्म क्यों नहीं होता?

  • बहुत से उपभोक्ता सस्ता सामान देखकर खरीद लेते हैं और गुणवत्ता जांच नहीं कर पाते। नकली घी, हल्दी, मिर्च, दूध और शहद जैसी चीजें आसानी से बिक जाती हैं। FSSAI को 2024-25 में खाद्य मिलावट और सुरक्षा से जुड़ी 7,700 से ज्यादा शिकायतें मिलीं, जिनमें लगभग 6,000 का निपटारा हुआ। यह दिखाता है कि समस्या कितनी व्यापक है।
  • भ्रष्टाचार की भी मिलावटी बाजार के फलने-फूलने में बड़ी भूमिका है। कई मामलों में तो ये भ्रष्टाचार उन तक फैला है, जिन पर मिलावट को खत्म करने की जिम्मेदारी है। जाहिर है बईमान और मुनाफाखोर व्यापारी धड़ल्ले से अपना कारोबार चला रहे हैं।
  • कानून सख्त हैं, लेकिन कई मामलों में सजा मिलने में वर्षों लग जाते हैं। इससे मिलावट करने वालों में भय कम रहता है। FSSAI और राज्य सरकारें लगातार सैंपलिंग करती हैं, लेकिन कई राज्यों में लैब, फूड सेफ्टी ऑफिसर और तकनीकी संसाधनों की कमी है।
  • कई बार खराब या पुराना खाद्य पदार्थ बचाने के लिए उसमें केमिकल मिलाए जाते हैं। फलों और सब्जियों को लंबे समय तक ताजा दिखाने के लिए वैक्स और कृत्रिम कोटिंग का इस्तेमाल भी बढ़ा है। इसकी एक सीधी वजह भंडारण और सप्लाई की खराब व्यवस्था भी है।
  • जागरूकता की कमी भी है। यह विक्रेताओं सहित ग्राहकों के स्तर पर भी है। छोटे दुकानदारों और स्थानीय निर्माताओं को कई बार यह तक पता नहीं होता कि कौन-से पदार्थ प्रतिबंधित हैं और कौन-से मानक जरूरी हैं। इससे नियमों का उल्लंघन बढ़ता है। इसके अलावा भी कई वजहें हैं, मसलन बड़ी आबादी के बीच कमजोर निगरानी व्यवस्था, मांग ज्यादा और माल कम और जानकारी का घोर आभाव।

समस्या से निपटने का क्या है रास्ता?

भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट से निपटना सिर्फ सरकारी कार्रवाई का मामला नहीं है, बल्कि इसमें सरकार, कारोबारियों और आम लोगों- तीनों की भूमिका जरूरी है। सबसे पहले निगरानी और जांच व्यवस्था को मजबूत करना होगा।

FSSAI और राज्य खाद्य विभागों को ज्यादा आधुनिक लैब, मोबाइल टेस्टिंग वैन और प्रशिक्षित फूड सेफ्टी अधिकारियों की जरूरत है। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में नियमित सैंपल जांच बढ़ाने से मिलावटखोरों पर दबाव बनेगा।
दूसरा बड़ा कदम है सख्त और तेज कानूनी कार्रवाई। कई मामलों में जांच और अदालत की प्रक्रिया लंबी चलती है, जिससे अपराधियों में डर कम हो जाता है। फास्ट-ट्रैक अदालतें और भारी जुर्माना मिलावट के कारोबार को रोकने में मदद कर सकते हैं।

त्योहारों और शादी के सीजन में विशेष अभियान चलाना भी जरूरी है, क्योंकि इसी समय मिलावट सबसे ज्यादा बढ़ती है।
इसके अलावा उपभोक्ताओं को जागरूक बनाना बेहद अहम है। लोग अगर बहुत सस्ता घी, दूध, मसाला या मिठाई खरीदने से बचें और पैकिंग, FSSAI लाइसेंस नंबर तथा एक्सपायरी डेट जांचें, तो मिलावटी सामान की मांग कम हो सकती है।

सरकार और स्कूलों को मिलकर जागरूकता अभियान चलाने चाहिए ताकि लोग घर पर भी साधारण टेस्ट से मिलावट पहचान सकें। तकनीक का इस्तेमाल भी बड़ा समाधान बन सकता है। QR कोड ट्रैकिंग, डिजिटल सप्लाई चेन और ऑनलाइन शिकायत प्रणाली से खाद्य उत्पादों की निगरानी आसान होगी।

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विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...

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