भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में पिछले कुछ महीनों के दौरान कई ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने दोनों देशों के बीच भरोसे और रणनीतिक संतुलन को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अब इस कड़ी में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के चीन दौरे ने एक और अहम मोड़ जोड़ दिया है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की पहली आधिकारिक चीन यात्रा के दौरान बीजिंग और ढाका के बीच तीस्ता समेत अन्य साझा नदियों के प्रबंधन को लेकर सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी।
बांग्लादेश ने नदी प्रबंधन, जल संसाधन विकास, सिंचाई, गाद निकालने और नदी पुनर्जीवन जैसे क्षेत्रों में चीन से तकनीकी सहयोग मांगा। पहली नजर में यह केवल एक विकास परियोजना जैसा मामला लग सकता है, लेकिन भारत के लिए इन घटनाक्रमों का महत्व कहीं अधिक है। इसकी वजह यह है कि जिस तीस्ता नदी पर बांग्लादेश इस समय चीन से सहयोग बढ़ाने की बात कर रहा है, उसी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर नई दिल्ली और ढाका के बीच कई सालों से विवाद चला आ रहा है।
दूसरी ओर, भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हुई गंगा जल संधि की अवधि भी दिसंबर 2026 में पूरी हो रही है। ऐसे में लगने लगा है कि अब जल कूटनीति दोनों देशों के रिश्तों का सबसे संवेदनशील विषय बनती जा रही है।
चीन और बांग्लादेश के बीच क्या सहमति बनी?
बीजिंग में हुई वार्ता के दौरान दोनों देशों ने तीस्ता और अन्य नदियों के समग्र प्रबंधन में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। बांग्लादेश ने चीन से नदी तट संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण, जल संरक्षण, सिंचाई व्यवस्था और नदी पुनर्जीवन के लिए तकनीकी सहयोग की मांग की।
चीन ने इस दिशा में अपने अनुभव साझा करने और बांग्लादेशी अधिकारियों को प्रशिक्षण देने की भी बात कही। लेकिन भारत इस घटनाक्रम को केवल तकनीकी परियोजना के रूप में नहीं देख रहा। इसकी वजह उस परियोजना का भौगोलिक और सामरिक महत्व है।
भारत के लिए चिंता की वजह क्या है?
तीस्ता नदी का अधिकांश ऊपरी हिस्सा भारत में है। 400 किमी से भी ज्यादा लंबी यह नदी सिक्किम के हिमालयी क्षेत्र से निकलती है, पश्चिम बंगाल से गुजरती हुई बांग्लादेश में प्रवेश करती है और आखिरकार ब्रह्मपुत्र का हिस्सा बन जाती है।
भारत की चिंता केवल नदी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस इलाके से जुड़ी है जहां चीन की मौजूदगी बढ़ सकती है। तीस्ता बेसिन का एक बड़ा हिस्सा भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ के बेहद करीब स्थित है।
सिलिगुड़ी कॉरिडोर लगभग 20-22 किलोमीटर चौड़ा संकरा भूभाग है, जो भारत के मुख्य हिस्से को आठ पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। सामरिक दृष्टि से इसे भारत की सबसे संवेदनशील भौगोलिक कड़ियों में गिना जाता है। यदि इस इलाके के आसपास चीन की आर्थिक, तकनीकी या बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भूमिका बढ़ती है तो भारत स्वाभाविक रूप से इसे सुरक्षा के नजरिए से भी देखेगी। यही कारण है कि भारत इस पूरे घटनाक्रम पर करीब से नजर रखे हुए है।

भारत-बांग्लादेश में तीस्ता नदी का विवाद आखिर है क्या?
तीस्ता नदी भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए कृषि और सिंचाई का महत्वपूर्ण स्रोत है। खासकर शुष्क मौसम में (दिसंबर से मार्च-अप्रैल) नदी में पानी का प्रवाह काफी कम हो जाता है। इसी सीमित पानी के बंटवारे को लेकर दोनों देशों के बीच कई दशकों से मतभेद बने हुए हैं।
बांग्लादेश का कहना रहा है कि सूखे मौसम में उसे खेती के लिए अधिक पानी की जरूरत होती है। दूसरी ओर भारत, खासकर पश्चिम बंगाल, का तर्क है कि उत्तर बंगाल के लाखों किसानों की सिंचाई भी इसी नदी पर निर्भर है। यही वजह है कि पानी के बंटवारे का लंबे समय तक जारी रहने वाला कोई स्थायी फार्मूला अब तक स्वीकार नहीं किया जा सका।
तीस्ता विवाद की टाइमलाइन
भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता पानी बंटवारे और विवाद की शुरुआत स्वतंत्र बांग्लादेश बनने के तुरंत बाद हुई। वर्ष 1972 में दोनों देशों ने ज्वाइंट रिवर्स कमिशन का गठन किया, ताकि साझा नदियों के जल बंटवारे पर बातचीत हो सके।
इसके बाद 1983 में दोनों देशों ने एक अंतरिम व्यवस्था पर सहमति बनाई। प्रस्ताव के अनुसार भारत को तीस्ता का लगभग 39 प्रतिशत और बांग्लादेश को 36 प्रतिशत पानी देने की बात कही गई थी, जबकि शेष पानी के उपयोग पर आगे चर्चा होनी थी। हालांकि यह व्यवस्था स्थायी समझौते में नहीं बदल सकी।
1984 में जल उपलब्धता के नए आंकड़ों के आधार पर हिस्सेदारी में संशोधन का सुझाव दिया गया, लेकिन कोई अंतिम समझौता नहीं हो पाया। करीब तीन दशक बाद 2011 में विवाद के समाधान की सबसे बड़ी कोशिश हुई। तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की बांग्लादेश यात्रा के दौरान तीस्ता समझौते का मसौदा तैयार हुआ। प्रस्ताव के अनुसार भारत को 42.5 प्रतिशत और बांग्लादेश को 37.5 प्रतिशत पानी देने की रूपरेखा बनाई गई थी।
पश्चिम बंगाल सरकार ने हालांकि इस मसौदे का विरोध किया। राज्य सरकार का कहना था कि इससे उत्तर बंगाल के किसानों और सिंचाई परियोजनाओं पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। सिक्किम से भी कुछ विरोध आया। नतीजतन समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हो सके। इसके बाद कई बार कोशिशें हुई, लेकिन आज तक दोनों देशों के बीच तीस्ता पर कोई स्थायी जल बंटवारा समझौता नहीं हो पाया है।
बांग्लादेश के साथ गंगा संधि का मामला क्या है?
तीस्ता विवाद के बीच एक दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा भी है। भारत और बांग्लादेश के बीच वर्ष 1996 में गंगा नदी के पानी के बंटवारे को लेकर 30 वर्ष की संधि हुई थी। यह समझौता फरक्का बैराज पर सूखे मौसम में गंगा के पानी के वितरण की व्यवस्था तय करता है।
इस संधि को भारत-बांग्लादेश संबंधों की सबसे सफल जल संधियों में गिना जाता है क्योंकि इसने लंबे समय तक दोनों देशों के बीच जल विवाद को नियंत्रित रखा। लेकिन इस समझौते की अवधि 2026 में समाप्त हो रही है। यानी अब दोनों देशों को नए सिरे से बातचीत करनी होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गंगा संधि के नवीनीकरण पर बातचीत ऐसे समय में होती है, जब तीस्ता विवाद अब भी अनसुलझा है और बांग्लादेश चीन के साथ नदी प्रबंधन में सहयोग बढ़ा रहा है, तो वार्ता पहले की तुलना में अधिक जटिल हो सकती है।
भारत-बांग्लादेश रिश्तों में जल बंटवारे पर विवाद का क्या मतलब है?
जल कूटनीति भारत और बांग्लादेश के संबंधों का हमेशा से एक महत्वपूर्ण आधार रही है। दोनों देशों के बीच 54 साझा नदियां हैं और इनका प्रबंधन आपसी सहयोग के बिना संभव नहीं है। ऐसे में किसी एक नदी को लेकर बढ़ता अविश्वास केवल जल संसाधन का मामला नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर व्यापक द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ सकता है।
तीस्ता पर चीन की बढ़ती सक्रियता ऐसे समय सामने आई है, जब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते पहले से कई संवेदनशील मुद्दों से गुजर रहे हैं। यदि तीस्ता जल बंटवारे पर लंबे समय तक कोई समाधान नहीं निकलता और इसी दौरान गंगा जल संधि के नवीनीकरण पर भी कठिन बातचीत होती है, तो दोनों देशों के बीच रिश्ते पहले से कहीं अधिक बुरे भी होने की आशंका है।
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