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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को POCSO मामले में दी अग्रिम जमानत

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को इलाहाबाद हाई कोर्ट की तरफ से राहत मिली है। POCSO मामले में उन्हें अग्रमि जमानत मिली है।

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फोटोः आईएएनएस

प्रयागराजः इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुधवार (25 मार्च) को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अग्रिम जमानत दे दी है। बीते दिनों धार्मिक गुरु के खिलाफ POCSO अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था।

गौरतलब है कि बीते महीने पॉक्सो की एक विशेष अदालत ने अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ यौन उत्पीड़न की जांच करने के लिए पुलिस को मामला दर्ज करने का आदेश दिया था। आरोप था कि अविमुक्तेश्वरानंद ने कैंप में दो नाबालिग लड़कों का यौन शोषण किया था।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को मिली राहत

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाई कोर्ट द्वारा यह आदेश आशुतोष महाराज द्वारा की गई शिकायत पर पारित किया गया। महाराज कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह में वादी हैं।

प्रयागराज पुलिस द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकी (FIR) के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने हाई कोर्ट का रुख किया था।

मामले की सुनवाई के कर रहे जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा ने मामले के पंजीकरण में देरी पर सवाल उठाया। अदालत ने आगे कहा कि पीड़ित लगातार मुखबिर के साथ थे और उन्हें 25 फरवरी से पहले उनके माता-पिता या अधिकारियों को नहीं सौंपा गया था।

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ज्ञात हो कि अविमुक्तेश्वरानंद हालिया माघ मेले के दौरान यौन शोषण के आरोप में पॉक्सो अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं का सामना कर रहे हैं। अदालत ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि ” पीड़ितों ने बताया है कि उन्होंने 18.01.2026 को अपराध होने की सूचना पहले सूचनादाता को दी थी, इसलिए पुलिस को पहली बार सूचना देने में 6 दिन की देरी हुई है और इसके लिए पहले सूचनादाता ने यह कारण बताया है कि वह “पूजा/यज्ञ” में व्यस्त था। “

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या टिप्पणी की?

इसके साथ ही अदालत ने एफआईआर दर्ज होने के बाद पीड़ितों द्वारा न्यूज चैनलों को इंटरव्यू देने पर भी सवाल उठाया। अदालत ने टिप्पणी की कि ” पीड़ितों को प्रमुख हिंदी समाचार चैनलों को साक्षात्कार देते हुए पाया गया, जो मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए अत्यंत निंदनीय और अस्वीकार्य है तथा पीओसीएसओ मामलों से संबंधित कानून और प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। “

इसके अलावा कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ मेडिकल एविडेंस पर भी सवाल उठाया। पीठ ने कहा ” डॉक्टर द्वारा तैयार की गई मेडिकल रिपोर्ट में पीड़ितों के शरीर पर किसी भी प्रकार की बाहरी चोट नहीं पाई गई है और यह राय दी गई है कि यौन उत्पीड़न की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। एफएसएल रिपोर्ट मांगी गई है, जिससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि डॉक्टर ने पीड़ितों के साथ यौन उत्पीड़न होने के संबंध में कोई निर्णायक निष्कर्ष नहीं दिया है। याचिकाकर्ताओं की चिकित्सा जांच नहीं की गई है, जो यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों में आवश्यक है। “

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इस दौरान पीठ ने आरोपों की गहन जांच की बात कही क्योंकि इस शिकायत से पहले राज्य के अधिकारियों और आरोपी के बीच विवाद हुआ था।

इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता दिलीप कुमार के साथ अधिवक्ता राजश्री गुप्ता, सुधांशु कुमार और वर्ध नाथ ने अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष रखा। वहीं राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल, सरकारी अधिवक्ता पतंजलि मिश्रा और अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता रूपक चौबे उपस्थित हुए। शिकायतकर्ता का पक्ष अधिवक्ता रीना एन सिंह ने रखा।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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