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सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम के बेटे की जेल की सजा पर रोक लगाने से किया इंकार, रेप केस में नारायण साई को हुई थी उम्रकैद

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फोटोः समाचार एजेंसी आईएएनएस

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (7 अगस्त) को आसाराम के बेटे नारायण साई की जेल की सजा पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। अदालत ने गुजरात हाई कोर्ट के एक फैसले में दखल देने से इंकार कर दिया जिसके तहत रेप केस में नारायण साई की सजा और उम्रकैद को निलंबित करने से मना कर दिया गया थाथ।

हालांकि जस्टिस एमएम सुंदेश और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वह रेप के मामले में दोषी ठहराए जाने के खिलाफ साई की अपील पर एक तय समय-सीमा के भीतर अपना फैसला सुनाए।

सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम के बेटे की सजा पर रोक संबंधी सुनवाई पर क्या कहा?

कोर्ट ने आदेश दिया कि ” हम हाई कोर्ट से अपील का निपटारा 3 महीने के अंदर करने की कोशिश करने का अनुरोध करते हैं। हम यह स्पष्ट करते हैं कि याचिकाकर्ता और राज्य सहयोग करेंगे। “

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर अपील पर तीन महीने के अंदर फैसला नहीं हुआ तो साई राहत के लिए दोबारा कोर्ट आ सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि ” किसी भी तरह, आप (साई) या वे (राज्य सरकार) 3 महीने बाद हमारे सामने आएंगे। तब हम इस पर विचार करेंगे… भले ही मामला खत्म हो जाए लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होगी। यह हमारे सामने आएगा और तब हम इस पर देखेंगे। “

बताते चलें कि यह मामला आसाराम बापू के बेटे नारायण साई के खिलाफ 2013 में दर्ज रेप केस से जुड़ा है। अप्रैल 2019 में सूरत की सेशंस कोर्ट ने साई को अपनी एक पूर्व शिष्या के साथ रेप का दोषी ठहराया था। उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। सजा के खिलाफ उनकी अपील गुजरात हाई कोर्ट में पेंडिंग है।

गुजरात हाई कोर्ट ने 4 मई, 2026 के एक आदेश के जरिए साईं की पांचवीं अर्जी को खारिज कर दिया। इस अर्जी में उन्होंने अपील पर फैसला होने तक अंतरिम जमानत और जेल की सजा पर रोक लगाने की मांग की थी।

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गुजरात हाई कोर्ट ने क्या कहा?

हाई कोर्ट ने कहा कि वह शुरुआती तौर पर यह नहीं मान सकता कि साई के बरी होने की अच्छी संभावना है। कोर्ट ने कहा कि गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए जाने के बाद निर्दोष होने की धारणा खत्म हो जाती है। कोर्ट ने उसकी इस दलील को भी खारिज कर दिया कि लंबे समय तक जेल में रहने के कारण उसकी सज़ा पर रोक लगाई जानी चाहिए।

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि अपनी अपील की सुनवाई में हुई देरी के लिए साई खुद जिम्मेदार था। कोर्ट ने गौर किया कि अपील पर बहस करने के बजाय उसने बार-बार जमानत की अर्जियां दाखिल कीं। इनमें से कुछ को उसने बाद में वापस ले लिया या उन पर आगे कार्रवाई नहीं की। हाई कोर्ट ने कहा कि उसके इसी व्यवहार की वजह से उसे राहत नहीं दी जा सकती।

इसके बाद इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। आज हुई सुनवाई में सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन ने साई का पक्ष रखा। सीनियर वकील ने बताया कि मामले के जल्द निपटारे के लिए अर्जी देने के बावजूद हाई कोर्ट ने साई की अपील पर सुनवाई नहीं की थी।

हरिहरन ने दलील दी कि ” बारह साल बीत चुके हैं। पहली नजर में तो अपराध भी नहीं बनता। ” इस पर अदालत ने कहा कि साई को हाई कोर्ट में अपने मामले को मेरिट के आधार पर रखना चाहिए।

हरिहरन ने आगे कहा कि भले ही सुप्रीम कोर्ट ने पहले हाई कोर्ट को सजा पर रोक लगाने की साई की अर्जी पर मेरिट के आधार पर विचार करने का निर्देश दिया था, लेकिन इस मामले पर सुनवाई नहीं हुई।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट इन पहलुओं की मेरिट पर जाने के बजाय केवल हाई कोर्ट को साई की अपील पर समय पर सुनवाई करने का निर्देश देने तक ही सीमित रही।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...

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