नई दिल्ली: स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राजधानी दिल्ली के लाल किले पर ‘वंदे मातरम’ बजाया जाएगा। यह पहली बार होगा जब स्वतंत्रता दिवस के औपचारिक कार्यक्रम में राष्ट्रीय गीत को एक तय कार्यक्रम के तौर पर शामिल किया जाएगा। इसे प्रधानमंत्री के भाषण के समापन पर राष्ट्रगान से ठीक पहले गाया या बजाया जाएगा।
यह कदम संसद द्वारा ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित किए जाने के एक हफ्ते से कुछ ज्यादा समय बाद उठाया गया है। इस विधेयक के जरिए ‘वंदे मातरम’ को भी वही सुरक्षा दी गई है जो 1971 के कानून के तहत राष्ट्रगान को मिलती है।
15 अगस्त को लाल किले से होगा वंदे मातरम का गायन
24 जुलाई को राज्यसभा में पेश किए गए इस बिल के तहत राष्ट्रीय गीत गाने से जानबूझकर रोकना या इसे गाते समय किसी सभा में बाधा डालना दंडनीय अपराध होगा। इसके लिए तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। दूसरी बार दोषी पाए जाने पर कम से कम एक साल की जेल की सजा का प्रावधान है। अब इस बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार है।
15 अगस्त के लिए लाल किले के कार्यक्रम का पूरा विवरण अभी जारी नहीं किया गया है। हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद NCC कैडेट्स द्वारा ‘जन गण मन’ गाकर यह समारोह संपन्न होता रहा है, जबकि उनके आने से पहले सुबह के समय NCC का गायक-दल देशभक्ति गीत प्रस्तुत करता है।
सरकार ने इस गाने के लिए पहले ही स्वतंत्रता दिवस की एक मिसाल का जिक्र किया है।
संसदीय बहस के दौरान जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि 15 अगस्त 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने पंडित ओंकारनाथ ठाकुर से कहा था कि वे भारत के पहले स्वतंत्रता दिवस की शुरुआत के मौके पर सुबह 6:30 बजे ऑल इंडिया रेडियो पर पूरा ‘वंदे मातरम’ गाएं।
उनके ‘पूरे’ गायन का जिक्र इसलिए अहम है क्योंकि सरकार ने यह नहीं बताया है कि लाल किले के समारोह में सिर्फ वे दो पद गाए जाएंगे जो आम तौर पर इस्तेमाल होते हैं या फिर इसका कोई लंबा वर्शन गाया जाएगा।
150वीं सालगिरह के दौरान शुरू हुई बहस
यह फर्क उस राजनीतिक बहस के केंद्र में है जो इस गाने की 150वीं सालगिरह के दौरान फिर से शुरू हुई। पिछले साल नवंबर में इस मौके पर कार्यक्रमों की शुरुआत करते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 1937 में ‘वंदे मातरम’ के अहम हिस्सों को हटा दिया गया था, गाने को “टुकड़ों में बांट दिया गया” था और इस बंटवारे ने ही “देश के विभाजन की नींव रखी।”
कांग्रेस ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि खुद रवींद्रनाथ टैगोर ने ही सिर्फ शुरुआती दो पद रखने की सलाह दी थी और नोबेल पुरस्कार विजेता पर बांटने वाली विचारधारा का आरोप लगाना गलत है।
जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 26 अक्टूबर से 1 नवंबर 1937 तक कलकत्ता में हुई बैठक में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने अक्टूबर 1937 में एक प्रस्ताव पास किया। इस प्रस्ताव में राष्ट्रीय इस्तेमाल के लिए सिर्फ शुरुआती दो पद (स्टैंजा) रखे गए और दुर्गा और लक्ष्मी जैसे हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र करने वाले बाद के पदों को हटा दिया गया।
26 अक्टूबर 1937 को नेहरू को लिखे एक पत्र में टैगोर ने कहा कि हालांकि पूरी कविता को संदर्भ के साथ पढ़ने पर मुस्लिम भावनाएं आहत हो सकती हैं लेकिन अकेले शुरुआती दो पदों से ऐसा होने की जरूरत नहीं है। CWC ने आसान हिंदुस्तानी भाषा में अन्य देशभक्तिपूर्ण गीतों की पहचान करने के लिए नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद और आचार्य नरेंद्र देव की एक अलग समिति भी बनाई।
यह विवाद इस साल की शुरुआत में संसद तक भी पहुंचा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में कहा कि बंटवारे की प्रक्रिया तुष्टिकरण की राजनीति की शुरुआत थी, जिसके कारण आखिरकार देश का विभाजन हुआ।
कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने जवाब में कहा कि सितंबर 1937 में राजेंद्र प्रसाद ने वल्लभभाई पटेल को पत्र लिखकर कांग्रेस वर्किंग कमेटी से इस मामले पर सोच-समझकर कोई रुख अपनाने का आग्रह किया था। उन्होंने पूछा कि क्या शाह, प्रसाद और पटेल पर भी तुष्टिकरण का आरोप लगा रहे हैं।
बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट ने 1986 में ‘बिजो इमैनुएल’ मामले में फैसला सुनाया था कि किसी भी व्यक्ति को राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और सम्मानपूर्वक चुपचाप खड़े रहने को अनादर नहीं माना जा सकता।
यह भी पढ़ें – दिल्ली हाई कोर्ट से डाबर को मिली राहत, FSSAI ने प्रोडक्ट्स पर ‘100 प्रतिशत’ दावा करने पर लगाई थी रोक



