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पाकिस्तानी पीएम शहबाज का दावा, अमेरिका-ईरान में अगले 24 घंटे में हो सकता है करार

पश्चिम एशिया में महीनों से जारी तनाव और युद्ध के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौता अगले 24 घंटों के भीतर अंतिम रूप ले सकता है। हालांकि ईरान ने इस दावे को पूरी तरह खारिज तो नहीं किया है, लेकिन समझौते पर तत्काल हस्ताक्षर होने की संभावना से इनकार किया है।

शहबाज शरीफ ने एक्स पर लिखा, “हम पहले से कहीं अधिक शांति समझौते के करीब हैं।” उन्होंने बताया कि पाकिस्तान, जिसने वार्ता प्रक्रिया में मध्यस्थ की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, समझौते के इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर (ई-साइनिंग) की तैयारी कर रहा है। उनके अनुसार, समझौते को अंतिम रूप दिए जाने के बाद अगले सप्ताह तकनीकी स्तर की वार्ताएं शुरू हो सकती हैं।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने अमेरिका और ईरान दोनों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि दोनों पक्षों ने बातचीत के दौरान गंभीर प्रतिबद्धता दिखाई है। उन्होंने क्षेत्रीय देशों के सहयोग की भी सराहना की और विश्वास जताया कि यह समझौता क्षेत्र में स्थायी शांति की नींव रख सकता है।

हालांकि, दूसरी ओर ईरान ने संकेत दिया है कि समझौते पर हस्ताक्षर अभी तुरंत नहीं होने वाले हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सरकारी समाचार एजेंसी के हवाले से कहा कि प्रस्तावित समझौते पर रविवार को हस्ताक्षर नहीं होंगे, लेकिन आने वाले दिनों में ऐसा होने की संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता।

Tweet by Shehbaz Sharif about nearing a peace deal, mentioning electronic signing within 24 hours; timestamp shows 4:30 PM, Jun 13, 2026, with like/reply counts visible.
Shehbaz X Post Screenshot

क्या हैं समझौते के प्रमुख बिंदु?

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने संकेत दिया है कि प्रस्तावित समझौते का पहला चरण युद्ध समाप्त करने और तनाव कम करने पर केंद्रित होगा। तस्नीम समाचार एजेंसी को दिए बयान में उन्होंने बताया कि मसौदे में 14 बिंदु शामिल हैं, जिनमें होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलना, अमेरिका और ईरान द्वारा एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का वादा तथा संघर्ष विराम जैसे प्रावधान शामिल हैं।

अराघची के अनुसार, परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन जैसे सबसे विवादित मुद्दों पर बातचीत दूसरे चरण में होगी, जो लगभग 60 दिनों तक चल सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की फ्रीज और जब्त की गई संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से मुक्त करने का प्रावधान भी समझौते का हिस्सा हो सकता है।

संभावित समझौते के बावजूद होर्मुज को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा व्यापार मार्गों में शामिल इस समुद्री रास्ते से खाड़ी देशों का तेल और गैस वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है।

अराघची ने स्पष्ट किया कि होर्मुज का संचालन युद्ध-पूर्व व्यवस्था के अनुसार नहीं होगा। उनके अनुसार, इस जलमार्ग पर ईरान और ओमान का अधिकार है तथा यहां से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नई प्रशासनिक व्यवस्था लागू की जाएगी। उन्होंने संकेत दिया कि भविष्य में इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से सेवाओं के बदले शुल्क भी लिया जा सकता है।

यहीं अमेरिका और ईरान के दावों में सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है। तेहरान जहां होर्मुज पर अपने नियंत्रण और यूरेनियम संवर्धन के अधिकार को बनाए रखने की बात कर रहा है, वहीं वॉशिंगटन लंबे समय से इन मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाए हुए है।

समझौते की उम्मीद के बीच फिर बढ़ा तनाव

शांति समझौते की संभावनाओं के बावजूद शनिवार को होर्मुज क्षेत्र में तनाव एक बार फिर बढ़ गया। अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने दावा किया कि ईरान ने व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाने के उद्देश्य से कई ड्रोन भेजे, जिन्हें अमेरिकी बलों ने मार गिराया।

हालांकि ईरान की ओर से इस दावे पर तत्काल कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन यह घटना बताती है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

दोनों देशों के दावों में अंतर

समझौते के मसौदे को लेकर अमेरिका और ईरान अलग-अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन खबरों को खारिज किया है जिनमें दावा किया गया था कि समझौते की शर्तें ईरान के पक्ष में हैं। ट्रंप ने कहा कि मीडिया में लीक हुई शर्तों का वास्तविक समझौते से कोई संबंध नहीं है।

वहीं, अराघची ने भी सावधानी बरतने की सलाह देते हुए कहा कि जब तक सभी मुद्दों पर अंतिम सहमति नहीं बन जाती, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि समझौता पूरी तरह तय हो गया है।

जहां राजनीतिक नेतृत्व समझौते को लेकर आशावादी दिखाई दे रहा है, वहीं ईरान के भीतर आम नागरिकों में संदेह बना हुआ है। कई लोगों का मानना है कि समझौता हो या न हो, आम जनता की समस्याएं आसानी से खत्म नहीं होने वाली हैं। वहीं कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यदि यह समझौता सफल होता है तो इससे पश्चिम एशिया में लंबे समय से चले आ रहे भू-राजनीतिक और आर्थिक गतिरोध को तोड़ने में मदद जरूर मिल सकती है।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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