13 जून 1997 को दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में लगी आग को 29 साल हो चुके हैं। उस हादसे में 59 लोगों की जान चली गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस भयानक त्रासदी को बयां करती 2023 में नेटफ्लिक्स पर एक सीरीज आई थी। ‘ट्रायल बाय फायर’।
आमतौर पर वास्तविक घटनाओं पर आधारित सीरीज और फिल्में अदालतों, आरोपियों, कानूनी दांवपेंचों और न्याय की लड़ाई को केंद्र में रखती हैं। लेकिन ‘ट्रायल बाय फायर’ ने वह रास्ता नहीं चुना। यह सीरीज अदालत के भीतर से ज्यादा उन लोगों के भीतर झांकती है, जिनकी जिंदगी उस एक शाम ने हमेशा के लिए बदल दी थी।
क्या हुआ था उस दिन?
उस दिन शुक्रवार था और सिनेमाघरों में देशभक्ति पर आधारित फिल्म ‘बॉर्डर’ रिलीज हुई थी। फिल्म का क्रेज इतना था कि थिएटर पूरी तरह हाउसफुल था। हादसे वाले दिन सुबह ही सुबह 6:55 बजे थिएटर के ग्राउंड फ्लोर पर मौजूद दिल्ली विद्युत बोर्ड (DVB) के चाबी वाले ट्रांसफार्मर रूम में एक छोटा सा धमाका हुआ था और आग लग गई थी। उसे जैसे-तैसे बुझाया गया और बिना पूरी जांच किए जल्दबाजी में रिपेयर कर दिया गया।
शाम शाम 4:55 बजे फिल्म का शाम का शो चल रहा था। तभी उसी ट्रांसफार्मर में दोबारा बड़ा धमाका हुआ। ट्रांसफार्मर का तेल बहने लगा और नीचे खड़ी गाड़ियों ने आग पकड़ ली। देखते ही देखते पूरे बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर पर काला, जहरीला धुआं फैल गया।
धुआं तेजी से सीढ़ियों के रास्ते ऊपर की ओर बढ़ा, जहां बालकनी और ऑडिटोरियम थे। लोग फिल्म देखने में मशगूल थे और उन्हें तब तक भनक नहीं लगी जब तक धुआं अंदर नहीं आ गया। जब लोगों ने भागने की कोशिश की, तो थिएटर प्रशासन की आपराधिक लापरवाही सामने आई।
ऑडिटोरियम के कई निकास द्वार बाहर से बंद थे। सबसे बड़ी लापरवाही यह थी कि बालकनी से निकलने वाले रास्ते को बंद करके वहां अतिरिक्त सीटें लगा दी गई थीं। आग लगते ही बिजली कट गई, लेकिन थिएटर का इमरजेंसी लाइटिंग सिस्टम काम नहीं कर रहा था। न ही कोई पब्लिक एड्रेस सिस्टम (माइक) चालू किया गया जिससे लोगों को गाइड किया जा सके। जैसे ही आग बढ़ी, सिनेमाघर का स्टाफ दर्शकों को अंदर ही छोड़कर खुद सुरक्षित बाहर भाग निकला। आग से झुलसने के बजाय, ज्यादातर मौतें धुएं में मौजूद कार्बन मोनोऑक्साइड के कारण दम घुटने से हुईं।
इस हादसे ने कई हंसते-खेलते परिवारों को तबाह कर दिया। पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए नीलम कृष्णमूर्ति और उनके पति शेखर कृष्णमूर्ति (जिन्होंने इस हादसे में अपने दो बच्चों, उन्नति और उज्ज्वल को खो दिया था) ने आगे आकर एसोशिएशन ऑफ द विक्टिम उपहार ट्रेजेडी (AVUT) का गठन किया। इस संगठन ने देश के सबसे अमीर और रसूखदार व्यापारिक घरानों में से एक अंसल बंधुओं (सुशील अंसल और गोपाल अंसल), जो इस सिनेमाघर के मालिक थे, के खिलाफ 2 दशक से लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।
उपहार कांड पर बनी सीरीज ‘ट्रायल ऑफ फायर’ रिलीज
2023 में नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई वेब सीरीज ‘ट्रायल बाय फायर’ ने उपहार अग्निकांड की मानवीय त्रासदी को सामने रखने का काम किया। निर्देशक प्रशांत नायर द्वारा निर्मित यह सात एपिसोड की सीरीज नीलम और शेखर कृष्णमूर्ति की किताब Trial By Fire: The Tragic Tale of the Uphaar Fire Tragedy पर आधारित थी। सीरीज में राजश्री देशपांडे ने नीलम कृष्णमूर्ति और अभय देओल ने शेखर कृष्णमूर्ति की भूमिका निभाई थी।
सीरीज में अलावा अनुपम खेर, रत्ना पाठक शाह, आशीष विद्यार्थी, राजेश तैलंग, शार्दुल भारद्वाज और शिल्पा शुक्ला जैसे कलाकार भी अहम भूमिकाओं में नजर आए थे। लेकिन यह सीरीज किसी कोर्टरूम ड्रामा या जांच-पड़ताल वाली कहानी भर नहीं थी। इसकी असली ताकत उस मानवीय दर्द को पर्दे पर उतारने में थी, जिसे उपहार अग्निकांड के पीड़ित परिवारों ने वर्षों तक जिया।
‘ट्रायल बाय फायर’ यह भी दिखाती है कि हादसे के बाद पीड़ित परिवारों को सिर्फ अदालतों में ही नहीं, बल्कि सिस्टम की उदासीनता से भी जूझना पड़ा। नीलम कृष्णमूर्ति ने बाद में कई बार कहा कि उस दिन अस्पतालों में पर्याप्त ऑक्सीजन सिलेंडर और एम्बुलेंस तक उपलब्ध नहीं थीं। यही वजह थी कि उन्होंने बेहतर ट्रॉमा केयर सुविधाओं की मांग को भी अपनी लड़ाई का हिस्सा बनाया।
उपहार अग्निकांड मामले में नवंबर 2007 में तीस हजारी कोर्ट ने अंसल बंधुओं समेत 12 लोगों को दोषी ठहराया था। इसके बाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वर्षों तक कानूनी लड़ाई चली। सजा, जमानत, जुर्माने और पुनर्विचार याचिकाओं के बीच यह मामला भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे लंबे चर्चित मामलों में शामिल हो गया। लेकिन सीरीज यह याद दिलाती है कि अदालतों के फैसलों से परे, इस लड़ाई का असली चेहरा वे परिवार थे, जिनकी जिंदगी उस एक शाम ने हमेशा के लिए बदल दी।
सीरीज को देखने के बाद नीलम कृष्णमूर्ति ने एक भावुक बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि “मैंने पिछले 26 वर्षों में कई लोगों को अपना दर्द समझाने की कोशिश की, लेकिन लोग इसे सिर्फ एक ‘हादसा’ समझते थे। इस सीरीज ने पहली बार दुनिया को दिखाया है कि अपनों को खोने का असली दर्द क्या होता है और एक मां-बाप किस नरक से गुजरते हैं। राजश्री ने मेरे किरदार को इतनी शिद्दत से जिया कि मुझे पर्दे पर खुद का अक्स नजर आया।” बता दें कि ट्रायल बाय फायर को आईएमडीबी पर 6.7 रेटिंग प्राप्त है।

