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1 करोड़ इनामी नक्सली भूपति ने 60 कैडरों के साथ किया आत्मसमर्पण, एक हफ्ते पहले ही छोड़ी थी पार्टी

अधिकारियों ने बताया कि इन सभी नक्सलियों ने सोमवार देर रात पुलिस के समक्ष हथियार डाले। आत्मसमर्पण करने वालों में प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) का एक केंद्रीय समिति सदस्य और 10 प्रभागीय समिति सदस्य शामिल हैं।

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Senior Naxalite Mallojula Venugopal alias Bhupathi surrendered before police in Maharashtra

नक्सली संगठन भाकपा (माओवादी) को एक बड़ा झटका लगा है। इसके केंद्रीय समिति के वरिष्ठ सदस्य मल्लोजुला वेणुगोपाल उर्फ भूपति सहित 61 कैडरों ने मंगलवार को महाराष्ट्र के गड़चिरौली जिले में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। भूपति पर 1 करोड़ का इनाम था।

अधिकारियों ने बताया कि इन सभी नक्सलियों ने सोमवार देर रात पुलिस के समक्ष हथियार डाले। आत्मसमर्पण करने वालों में प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) का एक केंद्रीय समिति सदस्य और 10 प्रभागीय समिति सदस्य शामिल हैं।

एक हफ्ते पहले ही मल्लोजुला वेणुगोपाल ने पार्टी से इस्तीफा दिया था। भूपति दिवंगत शीर्ष नक्सली नेता किशनजी के भाई हैं, जिनकी 2011 में मुठभेड़ में मौत हुई थी। हाल के महीनों में उनके परिवार और करीबी सहयोगियों ने भी आत्मसमर्पण कर दिया था। इनमें उनकी पत्नी तारा और किशनजी की पत्नी सुजाता (पोतुला कल्पना, जो स्वयं केंद्रीय समिति की सदस्य थीं) का नाम शामिल है।

‘बेमतलब की कुर्बानियों से बचने का समय आ गया है’

भूपति को सोनू के नाम से भी जाना जाता था। एक नाम अभय भी है। उन्हें माओवादी संगठन के सबसे प्रभावशाली रणनीतिकारों में से एक माना जाता था। सूत्रों के अनुसार, वह लंबे समय से महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ सीमा पर बटालियन अभियानों की देखरेख कर रहे थे।

हाल के महीनों में भूपति और शीर्ष नक्सली नेतृत्व के बीच विचारधारात्मक मतभेद बढ़ गए थे जिससे संगठन में आंतरिक संघर्ष पैदा हो गया था। उन्होंने एक हफ्ते पहले ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।

करीब चार दशक तक सशस्त्र आंदोलन का नेतृत्व करने वाले भूपति ने एक पत्र जारी कर लिखा था कि अब बेमतलब की कुर्बानियों से बचने और आत्मरक्षा का समय आ गया है। भूपति ने कहा था कि संगठन जिस रास्ते पर चल रहा है, वह पूरी तरह गलत है और कई नेतृत्व-स्तरीय भूलों ने आंदोलन को कमजोर कर दिया है।

पत्र में भूपति ने लिखा था, “वर्तमान हालात में सशस्त्र संघर्ष जारी रखना संभव नहीं। हमें आत्ममंथन कर यह समझना होगा कि बेवजह जान गंवाने से कुछ हासिल नहीं होगा। पार्टी लगातार गलत दिशा में जा रही है और मैं इसके पतन को रोक नहीं सका, इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं।”

उन्होंने राज्य कमेटियों के कुछ नेताओं पर आरोप लगाते हुए कहा था कि वे पार्टी लाइन से हटकर एकतरफा फैसले ले रहे हैं और केंद्रीय समिति की मंजूरी के बिना संवेदनशील मामलों में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

हथियार छोड़ने की संगठन में कब से थी चर्चा?

भूपति ने कहा था कि हथियार छोड़ने और मुख्यधारा में लौटने पर चर्चा पूर्व महासचिव नंबाला केशव राव के समय से ही शुरू हो गई थी, जिनकी बाद में मुठभेड़ में मौत हो गई थी। भूपति ने मौजूदा प्रवक्ता जगन पर भी अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधते हुए कहा था कि हथियारबंदी से जुड़ा कोई भी फैसला सामूहिक रूप से, आंतरिक विमर्श के बाद ही होना चाहिए।

भूपति ने दावा किया था कि सशस्त्र संघर्ष विफल हो गया है और उन्होंने शांति और बातचीत की ओर बढ़ने का आह्वान किया था। उन्होंने इसके पीछे जनता का घटता समर्थन और सैकड़ों कैडरों के नुकसान का हवाला दिया था।

उनका यह रुख अन्य वरिष्ठ कैडरों को पसंद नहीं आया, जिन्होंने एक अन्य नेता के नेतृत्व में लड़ाई जारी रखने का फैसला किया था। केंद्रीय नक्सली नेतृत्व के दबाव में भूपति ने आखिरकार हथियार डालने पर सहमति जताई, संगठन से बाहर निकलने की घोषणा की और अपने अनुयायियों के साथ गड़चिरौली पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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